सच्चा गुरु कौन? अपनी विद्वता से डराने वाले नहीं, करुणा से रास्ता आसान करने वाले बनते हैं महान; पढ़ें डॉ. विनय कुमार वर्मा का खास लेख

 

मनुष्य के भीतर छिपा 'मत्सर' का विकार उसके ज्ञान को अहंकार में बदल देता है। डॉ. विनय कुमार वर्मा का यह विशेष लेख बताता है कि कैसे वास्तविक बड़प्पन दूसरों का उपहास उड़ाने में नहीं, बल्कि उन्हें आगे बढ़ाने में है।

 
 

ज्ञान और बड़प्पन के अहंकार की हकीकत

नवोदित कलाकारों और लेखकों का न उड़ाएं उपहास

कठोर टिप्पणी कभी सच्चा मार्गदर्शन नहीं होती

वास्तविक श्रेष्ठता मनुष्य को हमेशा विनम्र बनाती है

अपने शुरुआती संघर्ष को याद रखना बेहद जरूरी

मनुष्य के भीतर कई तरह की बुराइयां और विकार जन्म लेते हैं, लेकिन कुछ कमियां इतनी बारीक होती हैं कि वे दोष की जगह गुण का रूप ले लेती हैं। 'मत्सर' भी एक ऐसा ही विकार है। आम बोलचाल में हम इसे सिर्फ ईर्ष्या या जलन मान लेते हैं। लेकिन अगर जिंदगी के गहरे अनुभव से देखें, तो मत्सर सिर्फ दूसरों से जलना नहीं है; बल्कि यह अपने ज्ञान, अपनी कला और खुद को सबसे श्रेष्ठ समझने का घमंड भी है।

प्रसिद्ध विचारक डॉ. विनय कुमार वर्मा के अनुसार, इंसान किसी भी क्षेत्र में एक ही दिन में बड़ा या उस्ताद नहीं बन जाता। कोई भी लेखक, कलाकार, वक्ता या शिक्षक अपनी पहली कोशिश में ही पूरी तरह निपुण नहीं होता। हर बड़ी कामयाबी के पीछे एक लंबा अभ्यास, बहुत सी गलतियां, लगातार सुधार और बरसों की कड़ी तपस्या छिपी होती है।

जो आज दूसरों का मार्गदर्शन कर रहा है, वह भी कभी अनाड़ी था
आज जो इंसान अपने काम में पूरी तरह माहिर है, वह भी कभी न कभी नौसिखिया था। जो आज दूसरों को रास्ता दिखा रहा है, वह भी कभी खुद रास्ता तलाश रहा था। अगर यह बात इंसान के दिमाग में हमेशा बनी रहे, तो वह बड़ी कामयाबी पाने के बाद भी जमीन से जुड़ा और विनम्र रहता है। लेकिन जैसे ही इंसान अपने पुराने संघर्ष के दिनों को भूल जाता है, उसके अंदर अहंकार और मत्सर का जन्म हो जाता है।

मत्सर का सबसे खतरनाक रूप तब सामने आता है, जब कोई व्यक्ति किसी ऊंचे मुकाम पर पहुंचकर नए लोगों के शुरुआती प्रयासों का मजाक उड़ाने लगता है। वह भूल जाता है कि जो आज टूटे-फूटे शब्दों से लिख रहा है, वही कल बड़ा साहित्यकार बन सकता है। जो आज सुर से भटक रहा है, कल वही संगीत की दुनिया पर राज कर सकता है। लेकिन घमंडी इंसान नए प्रयासों में संभावनाएं नहीं, बल्कि सिर्फ कमियां ढूंढता है।

किसी का हौसला तोड़ देना असली बड़प्पन नहीं होता
अहंकार में डूबे लोग सोशल मीडिया या सार्वजनिक मंचों पर नए लोगों का उपहास उड़ाते हैं और अपनी इस कड़वी आलोचना को ज्ञान का नाम देते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि किसी का मन तोड़ देना या किसी संघर्ष करने वाले को छोटा महसूस कराना बड़प्पन नहीं होता। सच्चा बड़ा इंसान तो वह है जिसके पास बैठने पर कोई भी छोटा व्यक्ति खुद को हीन न समझे, बल्कि उसका आत्मविश्वास और बढ़ जाए।

यही असली गुरुता है। गुरु वह नहीं होता जो अपनी विद्वता से अपने शिष्यों को डरा दे, बल्कि गुरु वह है जो अपने अनुभवों से शिष्यों की राह को आसान बना दे। इस पूरी सृष्टि में भगवान के अलावा कोई भी पूरा नहीं है। हम सब सीखने के रास्ते पर चल रहे मुसाफिर हैं, जहां कोई थोड़ा आगे है तो कोई थोड़ा पीछे। आगे चलने वाले का काम पीछे वालों पर धूल उड़ाना नहीं, बल्कि उनका रास्ता साफ करना है।

ज्ञान से पुल बनाइए, नफरत और दूरी की दीवारें नहीं
जो इंसान खुद को पूरी तरह परफेक्ट मान लेता है, वह उसी पल नया सीखना बंद कर देता है। वास्तविक श्रेष्ठता हमेशा इंसान को विनम्र बनाती है, जबकि अधूरा ज्ञान उसे अहंकारी बना देता है। कुछ लोग अपनी महानता का ऐसा बोझ लेकर चलते हैं कि वे कभी सहज नहीं रह पाते। वे अपने ज्ञान का इस्तेमाल लोगों को जोड़ने के लिए नहीं, बल्कि उनके बीच दूरियों की दीवार खड़ी करने के लिए करते हैं। ऐसे लोग मशहूर तो हो सकते हैं, पर किसी के प्यारे नहीं होते।

इसके विपरीत, जो लोग सचमुच महान होते हैं, वे नए साधकों को देखकर हमेशा उनकी पीठ थपथपाते हैं। वे जानते हैं कि हर बीज तुरंत पेड़ नहीं बनता, लेकिन हर पेड़ कभी न कभी एक छोटा सा बीज ही था। यदि आपके ज्ञान से किसी का भरोसा टूट जाए, तो वह ज्ञान नहीं बल्कि एक तरह की मानसिक हिंसा है।

मत्सर से मुक्ति का रास्ता: अपने शुरुआती दिनों को हमेशा याद रखें
वरिष्ठों का सबसे बड़ा धर्म नई पीढ़ी को संभालना और उन्हें सही रास्ता दिखाना है। नया इंसान हमेशा गलतियां करके ही सीखता है। इस घमंड से बचने का सबसे पहला तरीका यही है कि जब भी किसी नए व्यक्ति को देखकर मन में उसका मजाक उड़ाने का विचार आए, तो तुरंत अपने पुराने दिनों को याद करें जब आप खुद भी लड़खड़ाते थे।

आज के समाज को ऐसे मार्गदर्शकों की जरूरत है जो नई पीढ़ी को अपना दुश्मन या प्रतिद्वंद्वी न मानकर अपना उत्तराधिकारी समझें। सूर्य कभी छोटे से दीपक से नहीं डरता और न ही सागर कभी नदी से जलता है। इंसान की असली पहचान इस बात से नहीं है कि वह कितने लोगों से आगे निकल गया, बल्कि इस बात से है कि उसने अपने जीवन में कितने लोगों को आगे बढ़ाया। शुरुआत का सम्मान करना सीखें, क्योंकि हर शुरुआत के भीतर एक बड़ी संभावना छिपी होती है।