दादा-दादी और नाना-नानी ध्यान दें! पोते-पोतियों की देखभाल करने से बुढ़ापे में भी जवान रहता है दिमाग

क्या आप जानते हैं कि पोते-पोतियों के साथ खेलना केवल प्यार नहीं, बल्कि दिमागी कसरत भी है? एक नए वैज्ञानिक शोध के अनुसार, बच्चों की देखभाल करने वाले बुजुर्गों की मेमोरी और भाषा कौशल अन्य की तुलना में काफी बेहतर पाए गए हैं।

 

नाती-पोतों का साथ बढ़ाता है याददाश्त

'साइकोलॉजी एंड एजिंग' जर्नल की रिपोर्ट

मानसिक गिरावट को रोकने में मददगार

सामाजिक संपर्क से ब्रेन रहता है एक्टिव

50 से अधिक उम्र वालों पर रिसर्च

अपने नाती-पोतों या पोते-पोतियों की देखभाल को अक्सर हम केवल एक पारिवारिक जिम्मेदारी या भावनात्मक जुड़ाव के रूप में देखते हैं। लेकिन अब विज्ञान ने इस परंपरा के पीछे एक गहरा स्वास्थ्य लाभ खोज निकाला है। प्रतिष्ठित जर्नल 'साइकोलॉजी एंड एजिंग' में प्रकाशित एक हालिया शोध के अनुसार, जो बुजुर्ग अपने पोते-पोतियों की देखभाल में सक्रिय रहते हैं, उनकी स्मरण शक्ति (Memory) और भाषाई क्षमताएं (Verbal Skills) उन बुजुर्गों की तुलना में काफी बेहतर होती हैं जो इस भूमिका में शामिल नहीं होते।

कैसे हुआ यह शोध?


इस अध्ययन का नेतृत्व शोधकर्ता फ्लाविया चेरेचेश ने किया। रिसर्च के दौरान 50 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 2,887 दादा-दादी और नाना-नानी को शामिल किया गया। अध्ययन में शामिल प्रतिभागियों की औसत आयु 67 वर्ष थी। वर्ष 2016 से 2022 के बीच इन बुजुर्गों के आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया गया, जिसमें विशेष रूप से उनकी याददाश्त, शब्दों के चयन और भाषा के प्रभावी उपयोग जैसी मानसिक क्षमताओं का परीक्षण किया गया।

सक्रिय भागीदारी का सकारात्मक प्रभाव
शोध के नतीजों ने विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया। यह पाया गया कि बच्चों की देखभाल करने वाले बुजुर्गों ने मेमोरी और भाषा से जुड़े टेस्ट में उच्च प्रदर्शन किया। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि यह लाभ इस बात पर निर्भर नहीं था कि देखभाल कितनी बार की जा रही है। चाहे बुजुर्ग कभी-कभार बच्चों को संभालते हों या नियमित रूप से, मानसिक लाभ लगभग एक समान ही पाए गए। इससे यह स्पष्ट होता है कि बच्चों की दुनिया में सक्रिय रूप से शामिल होना ही दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त है।

दिमाग को क्यों मिलता है फायदा?
वैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चों के साथ समय बिताने से बुजुर्गों का सामाजिक दायरा बढ़ता है और उनका दिमाग लगातार नई चुनौतियों का सामना करता है। बच्चों की जरूरतों को समझना, उनके साथ नई-नई बातें करना, उन्हें कहानियां सुनाना या उनके खेलों में शामिल होना दिमाग को लगातार उत्तेजित (Stimulate) करता है। इससे न केवल सोचने-समझने की शक्ति बनी रहती है, बल्कि बुजुर्गों के जीवन में एक 'उद्देश्य' और 'जिम्मेदारी' का भाव भी पैदा होता है, जो डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याओं को दूर रखने में सहायक है।

बुढ़ापे में मानसिक सेहत का मंत्र
यह शोध रेखांकित करता है कि बढ़ती उम्र के साथ होने वाली मानसिक गिरावट को पूरी तरह से रोकना भले ही चुनौतीपूर्ण हो, लेकिन एक सक्रिय जीवनशैली और सामाजिक भूमिका इसमें बड़ा अंतर पैदा कर सकती है। परिवार के भीतर सक्रिय रहना और अगली पीढ़ी को संस्कार व समय देना बुजुर्गों को न सिर्फ भावनात्मक संतोष देता है, बल्कि उनके मस्तिष्क को भी लंबे समय तक युवा और फिट बनाए रखने में मदद करता है।