किसी भी उम्र में हो सकती है मेनिनजाइटिस की बीमारी, बहुत खतरनाक हैं इसके लक्षण
किसी भी उम्र में मेनिनजाइटिस का खतरा
बैक्टीरियल व वायरल मेनिनजाइटिस के कारण
तेज बुखार व गर्दन अकड़ना मुख्य लक्षण
नवजात शिशुओं में मेनिनजाइटिस के संकेत
टीकाकरण और बचाव के सही उपाय
मेनिनजाइटिस इंसानी दिमाग और रीढ़ की हड्डी को सुरक्षित रखने वाली पतली झिल्लियों (मेनिंजेस) में होने वाला एक खतरनाक संक्रमण या सूजन है। यह बीमारी किसी भी उम्र के इंसान को अपनी चपेट में ले सकती है और कई बार देखते ही देखते बेहद गंभीर रूप धारण कर लेती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, बैक्टीरियल मेनिनजाइटिस सबसे ज्यादा चिंता का विषय है क्योंकि यह तेजी से नुकसान पहुंचाता है।
यह बीमारी मुख्य रूप से बैक्टीरिया, वायरस, फंगस और कुछ सूक्ष्म परजीवियों के हमले से होती है। बैक्टीरियल मेनिनजाइटिस के लिए मुख्य रूप से मेनिंगोकोकल, न्यूमोकोकस, हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा और ग्रुप बी स्ट्रेप्टोकोकस जैसे बैक्टीरिया जिम्मेदार होते हैं। व्यक्ति की उम्र और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) के हिसाब से अलग-अलग बैक्टीरिया का खतरा रहता है। जैसे, नवजात शिशुओं में ग्रुप बी स्ट्रेप्टोकोकस का जोखिम ज्यादा होता है, जबकि बच्चों व युवाओं में न्यूमोकोकस और मेनिंगोकोकल का असर अधिक देखा जाता है।
बीमारी के मुख्य लक्षण जिन्हें पहचानना है जरूरी
मेनिनजाइटिस का सही समय पर पता चलना मरीज की जान बचा सकता है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, इसके आम और मुख्य लक्षणों में अचानक तेज बुखार आना, असहनीय सिरदर्द होना, गर्दन का अकड़ जाना, बार-बार उल्टी होना, तेज रोशनी से आंखों में तकलीफ होना और दिमाग में उलझन या भ्रम की स्थिति पैदा होना शामिल है।
कुछ मरीजों में स्थिति बिगड़ने पर मिर्गी जैसे दौरे पड़ना, अचानक बेहोश हो जाना या हाथ-पैरों में भारी कमजोरी महसूस होना जैसे गंभीर लक्षण भी आ सकते हैं। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि हर मरीज में ये सभी लक्षण एक साथ दिखाई दें, इसलिए थोड़े भी संकेत मिलने पर सतर्क हो जाना चाहिए।
छोटे शिशुओं में कैसे पहचानें इसके शुरुआती संकेत?
छोटे नवजात बच्चों या शिशुओं में मेनिनजाइटिस के लक्षण बड़ों की तुलना में थोड़े अलग और अलग-अलग हो सकते हैं। अगर बच्चा सामान्य से बहुत कम एक्टिव लग रहा हो, उसे नींद से जगाने में बहुत ज्यादा दिक्कत हो रही हो या वह लगातार चिड़चिड़ा बना रहे, तो यह खतरे की घंटी हो सकती है।
इसके अलावा, अगर शिशु ठीक से दूध नहीं पी पा रहा है, लगातार धीमी या कमजोर आवाज में रोए जा रहा है, या फिर उसके सिर के ऊपरी हिस्से का मुलायम भाग (फॉन्टानेल) बाहर की तरफ उभरा हुआ दिखता है, तो इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज न करें। ऐसे लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
कैसे फैलता है इसका संक्रमण?
मेनिनजाइटिस का संक्रमण किस तरीके से फैलेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी का असली कारण क्या है। कई तरह के बैक्टीरिया आम तौर पर लोगों की नाक और गले में मौजूद रहते हैं। जब कोई संक्रमित व्यक्ति छींकता या खांसता है, तो सांस की बूंदों और गले की लार के जरिए ये बैक्टीरिया एक इंसान से दूसरे इंसान में चले जाते हैं।
बहुत ज्यादा भीड़भाड़ वाली जगहों पर रहने, हॉस्टल में रहने या लंबे समय तक किसी मरीज के बेहद करीबी संपर्क में रहने से इस संक्रमण के फैलने का खतरा काफी हद तक बढ़ जाता है। इसलिए ऐसे माहौल में ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है।
बचाव के सबसे कारगर उपाय और जरूरी सावधानियां
मेनिनजाइटिस जैसी जानलेवा बीमारी से बचने का सबसे प्रभावी और आसान तरीका सही समय पर टीकाकरण (वैक्सीनेशन) करवाना है। आज के समय में मेनिंगोकोकल, न्यूमोकोकस और हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा जैसे खतरनाक बैक्टीरिया के खिलाफ टीके आसानी से उपलब्ध हैं, जिन्हें सही उम्र में जरूर लगवाना चाहिए।
इसके अलावा, अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। हाथों को साबुन से नियमित धोएं और किसी संक्रमित या बीमार व्यक्ति के ज्यादा करीब जाने से बचें। अपने इस्तेमाल के कप, बर्तन, तौलिया या टूथब्रश जैसी चीजें दूसरों के साथ शेयर न करें। यदि कोई व्यक्ति मेनिंगोकोकल मरीज के संपर्क में आया है, तो डॉक्टर की सलाह पर बचाव के रूप में एंटीबायोटिक दवाएं भी ली जा सकती हैं।
इसे समझें मेडिकल इमरजेंसी, न करें देरी
सबसे जरूरी बात यह है कि मेडिकल साइंस में मेनिनजाइटिस को एक गंभीर आपातकालीन स्थिति (मेडिकल इमरजेंसी) माना जाता है। अगर किसी भी व्यक्ति या बच्चे में तेज बुखार, गर्दन में अकड़न, तेज सिरदर्द, दिमागी उलझन, बार-बार उल्टी या दौरे आने जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत नजदीकी अस्पताल भागें।
खासकर बैक्टीरियल मेनिनजाइटिस में इलाज शुरू करने में की गई थोड़ी सी भी देरी मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है या फिर उसे जिंदगी भर के लिए शारीरिक रूप से अपाहिज बना सकती है। इसलिए सही समय पर सही डॉक्टर की सलाह ही सबसे बड़ा बचाव है।