नेताओं के भाषण नहीं, कार्यकर्ताओं का मौन तय करता है चुनाव का नतीजा: जानिए क्या कहता है इतिहास

 

राजनीति में असली ताकत संसद या चुनावी मंच नहीं, बल्कि वो अनाम कार्यकर्ता होता है जो दिन-रात पार्टी का झंडा उठाए फिरता है। सत्ता मिलते ही अक्सर यही कार्यकर्ता उपेक्षित होकर मौन हो जाता है, जो किसी भी बड़े राजनीतिक दल के पतन की सबसे बड़ी वजह बनती है।

 
 

सत्ता के गलियारों में कार्यकर्ता की उपेक्षा

राजनीति में कार्यकर्ता के मौन का संदेश

चुनाव जीत में जमीनी कार्यकर्ताओं की भूमिका

अवसरवादियों के आने से टूटता पुराना कार्यकर्ता

संगठन की असली ताकत ही उसकी जड़ें हैं

राजनीति सिर्फ संसद की बहसों, चुनावी मंचों या सत्ता के बड़े-बड़े गलियारों में ही नहीं बसती है। इसका असली जीवन वहाँ धड़कता है, जहाँ कोई अनाम कार्यकर्ता तपती दोपहर में गाँव-गाँव घूमकर पार्टी का प्रचार कर रहा होता है। यह वही युवक होता है जो अपनी जेब से किराया खर्च करके पार्टी का झंडा लगाने निकलता है। यह वही बुज़ुर्ग होता है जो बिना किसी पद, सुरक्षा या व्यक्तिगत लाभ की लालच के दशकों से अपने विश्वास को सींचता रहता है।

इतिहास जब भी किसी राजनीतिक दल की सफलता की कहानी लिखता है, तो उसमें अक्सर केवल बड़े नेताओं के नाम ही दर्ज होते हैं। लेकिन सच यह है कि उस सफलता की नींव में जिन अनगिनत गुमनाम लोगों का पसीना मिला होता है, उनका उल्लेख इतिहास के पन्नों से अक्सर छूट जाता है।

संघर्ष से सत्ता तक: कैसे बदलता है संगठन का चरित्र?
यहीं से हर बड़े राजनीतिक संगठन की सबसे बड़ी विडम्बना शुरू होती है। जब कोई दल संघर्ष के दौर से गुज़र रहा होता है, तब उसके पास साधन-संसाधन कम होते हैं, लेकिन समर्पित कार्यकर्ताओं की कोई कमी नहीं होती। उस समय विचार ही सबसे बड़ी पूँजी होता है और समर्पण ही सबसे बड़ी शक्ति। 

संघर्ष के दिनों में नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच दूरी बहुत कम होती है। एक साथ बैठना, एक साथ सड़कों पर चलना, साथ जेल जाना और साथ में संघर्ष करना ही संगठन की मुख्य संस्कृति होती है। लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष सफलता में बदलता है और सफलता सत्ता के रूप में सामने आती है, वैसे-वैसे संगठन का चरित्र भी बदलने लगता है। सत्ता अपने साथ सिर्फ अधिकार ही नहीं लाती, बल्कि वह आकर्षण और अवसर भी लेकर आती है।

नए अवसरवादियों का आगमन और पुराने चेहरों का छिपना
जहाँ रोशनी होती है, वहाँ पतंगे अपने आप पहुँच जाते हैं। सत्ता मिलते ही अवसरवादी लोग भी अचानक करीब दिखाई देने लगते हैं। जिनके लिए विचारधारा कभी प्राथमिकता नहीं थी, वे भी अचानक विचारधारा के बड़े-बड़े व्याख्याता बन जाते हैं। जिनकी यात्रा संघर्ष से नहीं बल्कि अवसर की तलाश से शुरू होती है, वे कई बार संगठन के सबसे प्रभावशाली और बड़े चेहरे बन जाते हैं। यहीं से संगठन की सबसे कठिन परीक्षा शुरू होती है, क्योंकि सत्ता जितनी तेजी से बढ़ती है, संगठन की आत्मा उतनी तेजी से नहीं बढ़ती।

धीरे-धीरे संघर्ष करने वाले पुराने कार्यकर्ता भीड़ में खोने लगते हैं। जो कार्यकर्ता कल तक संगठन की पहचान थे, वे आज कार्यालय के प्रवेश-द्वार पर अपना पहचान पत्र दिखाने को विवश हो जाते हैं। जिनकी आवाज़ कभी संगठन में सुनी जाती थी, उन्हें अब नेताओं से मिलने के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती है।

जब त्याग का उपदेश सिर्फ वफादारों को दिया जाता है
यह बदलाव एक दिन में अचानक नहीं होता, बल्कि बहुत धीरे-धीरे होता है। इतना धीरे कि कई बार शीर्ष नेतृत्व को भी इसका आभास नहीं हो पाता। कार्यकर्ता अपनी पीड़ा कभी खुलकर बोलता नहीं है, वह सब सहता है और प्रतीक्षा करता है। वह खुद को यह कहकर समझाता है कि संगठन बड़ा हो गया है, समय बदल गया है और सबको पद या अवसर नहीं मिल सकता। लेकिन भीतर ही भीतर एक छोटी-सी दरार पैदा हो चुकी होती है।

राजनीति का सबसे समर्पित व्यक्ति कभी बड़ी चीज़ें नहीं माँगता। उसे पद से ज़्यादा सम्मान चाहिए होता है और प्रशंसा से ज़्यादा विश्वास चाहिए होता है। जब उसे बार-बार यह साबित करना पड़े कि वह कितना समर्पित है, तब उसका भरोसा टूटने लगता है। ऐसे मौकों पर कार्यकर्ता से अक्सर कहा जाता है..."त्याग करो", "कोई अपेक्षा मत रखो", "संगठन ही सबसे बड़ा है।" 

ये बातें गलत नहीं हैं, लेकिन जब यह उपदेश सिर्फ उन्हीं लोगों को दिया जाए जिन्होंने जीवनभर संघर्ष किया हो और मलाई किसी नए व्यक्ति को मिले, तो यह दर्शन पीड़ा बन जाता है।

कार्यकर्ता का मौन: पतन का पहला सबसे बड़ा संकेत
यहीं से कार्यकर्ता का मौन शुरू होता है। राजनीति के इतिहास में कार्यकर्ता का मौन किसी भी तीखे भाषण से ज़्यादा गंभीर संकेत होता है। इतिहास गवाह है कि जिस दिन संगठन अपने कार्यकर्ता की धड़कन सुनना बंद कर देता है, उसी दिन से उसकी अपनी धड़कन भी धीमी होने लगती है। किसी भी राजनीतिक दल की असली शक्ति उसके सांसद, विधायक या मंत्री नहीं होते। वे तो केवल संगठन का चेहरा होते हैं, उसकी आत्मा नहीं। आत्मा तो उस कार्यकर्ता में बसती है जो बिना किसी प्रचार के दीवारों पर पोस्टर चिपकाता है और लोगों की कड़वी बातें सुनता है।

ऐसे कार्यकर्ताओं के पास न तो कोई नियुक्ति-पत्र होता है और न ही वे किसी वेतन सूची में दर्ज होते हैं। उनका एकमात्र परिचय होता है—"मैं कार्यकर्ता हूँ।" यही परिचय उनके लिए दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान होता है।

इतिहास के सबक: कांग्रेस और 2004 का उदाहरण
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक समय देश के स्वतंत्रता आंदोलन की पहचान थी। उसके पास विचार, नेतृत्व और करोड़ों समर्पित कार्यकर्ता थे। लेकिन समय के साथ सत्ता मिलने पर संगठन और कार्यकर्ता के बीच दूरी बढ़ती गई और संवाद खत्म होता गया। परिणाम स्वरूप कार्यकर्ता खुद को संगठन का केंद्र मानने के बजाय सिर्फ एक दर्शक समझने लगा। यह स्थिति सिर्फ कांग्रेस की नहीं है, बल्कि यह हर उस दल की कहानी है जो लंबे समय तक सत्ता में बना रहता है। एक और उदाहरण सन् 2004 के आम चुनाव का है। उस समय भारतीय जनता पार्टी के 'इंडिया शाइनिंग' अभियान और विकास के दावों की खूब चर्चा थी। लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि जमीनी कार्यकर्ता और मतदाता की मनःस्थिति को उतनी गहराई से नहीं समझा जा सका।

इन चुनावी परिणामों ने यह साबित किया कि केवल सरकारी उपलब्धियाँ ही काफी नहीं होतीं, बल्कि संगठन की जड़ों यानी कार्यकर्ताओं से लगातार संवाद बनाए रखना भी उतना ही ज़रूरी होता है।

निराश कार्यकर्ता विद्रोह नहीं करता, वह बस शांत हो जाता है
सत्ता की सबसे बड़ी भूल यह मानना है कि जनता केवल बड़े नेताओं को देखकर वोट देती है। सच तो यह है कि जनता तक नेतृत्व का संदेश पहुँचाने वाला दूत कार्यकर्ता ही होता है। अगर वही उत्साहहीन हो जाए, तो बड़े से बड़ा भाषण भी निष्प्रभावी हो जाता है। कार्यकर्ता कभी खुलेआम विद्रोह नहीं करता और न ही पार्टी छोड़ने का ऐलान करता है। वह बस धीरे-धीरे निष्क्रिय होने लगता है। बैठकों में उसकी उपस्थिति कम हो जाती है और एक दिन वह चुपचाप घर बैठ जाता है। नाराज़ कार्यकर्ता से ज़्यादा खतरनाक निराश कार्यकर्ता होता है। नाराज़ व्यक्ति तो फिर भी बात करता है, लेकिन निराश व्यक्ति पूरी तरह मौन हो जाता है। और इस मौन का राजनीति में कोई जवाब नहीं होता।

जड़ों की ओर लौटना ही एकमात्र समाधान है
लोकतंत्र में जनता और कार्यकर्ता का समर्पण हासिल करना पड़ता है, यह किसी को विरासत में नहीं मिलता। सत्ता कभी स्थायी नहीं होती, लेकिन संगठन पर लोगों का विश्वास हमेशा मायने रखता है। हर राजनीतिक दल को समय-समय पर अपने बड़े कार्यालयों से निकलकर उन गाँवों, कस्बों और गलियों तक लौटना होगा जहाँ उसकी पहली नींव रखी गई थी। वहाँ आज भी ऐसे निष्ठावान लोग मिलेंगे जिन्होंने कभी पद या टिकट नहीं माँगा। संगठन बड़े भवनों या सिर्फ बड़े नेताओं से नहीं बनते, वे उन साधारण कार्यकर्ताओं से बनते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के पार्टी को जीवित रखते हैं। जिस दिन कार्यकर्ताओं का मौन नेतृत्व को सुनाई देना बंद हो जाएगा, समझ लेना चाहिए कि संगठन के अंत की शुरुआत हो चुकी है।