युद्ध अमेरिका का तो रुपया क्यों गिर रहा है? जानिए डॉलर के मजबूत होने का असली गणित

 

 दुनिया में युद्ध कहीं भी हो, लेकिन इसका सीधा असर आपकी जेब और भारतीय रुपये पर पड़ता है। आखिर क्यों डॉलर संकट के समय और शक्तिशाली हो जाता है और रुपया कमजोर? डॉ. विनय कुमार वर्मा के विश्लेषण से समझें वैश्विक अर्थव्यवस्था का यह जटिल रहस्य।

 
 

वैश्विक युद्ध और डॉलर का मजबूत होना

सुरक्षित निवेश के लिए डॉलर पहली पसंद

कच्चे तेल और सोने पर डॉलर का कब्जा

भारतीय रुपये की गिरावट के मुख्य कारण

युद्ध केवल तोपों से नहीं लड़ा जाता; वह बाजारों की नसों, तेल की धाराओं, बंदरगाहों की साँसों और मुद्राओं की धड़कनों में भी लड़ा जाता है। पहली दृष्टि में प्रश्न बिल्कुल स्वाभाविक लगता है कि यदि युद्ध अमेरिका लड़ रहा है, खर्च अमेरिका का हो रहा है, तो कमजोर डॉलर होना चाहिए, रुपया क्यों गिर रहा है? पर वैश्विक अर्थव्यवस्था का व्याकरण घर की साधारण आय-व्यय पुस्तिका जैसा नहीं होता। उसमें कभी-कभी वही मुद्रा मजबूत हो जाती है जिसके देश पर युद्ध का खर्च बढ़ रहा होता है, क्योंकि दुनिया संकट में ताकत, तरलता और भरोसे की ओर भागती है और आज भी डॉलर उस भरोसे का सबसे बड़ा किला बना हुआ है।

डॉलर केवल अमेरिका की मुद्रा नहीं है; वह दुनिया के व्यापार की चाबी है। तेल डॉलर में बिकता है, सोना डॉलर में खरीदा जाता है, वैश्विक कर्ज का बड़ा हिस्सा डॉलर में है, विदेशी निवेशक अपना जोखिम डॉलर में मापते हैं और संकट आते ही पूँजी वहाँ भागती है जहाँ उसे सबसे सुरक्षित आश्रय दिखता है। इसलिए युद्ध के समय अमेरिका कमजोर दिखे, तब भी डॉलर कई बार मजबूत हो जाता है, क्योंकि दुनिया डरते हुए भी डॉलर को पकड़ती है। यह एक विचित्र विडंबना है- आग कहीं भी लगे, लोग पानी की बाल्टी उसी कुएँ से भरते हैं जिसे वे सबसे गहरा मानते हैं।


     
रुपया इसलिए गिरता है क्योंकि भारत युद्ध लड़ नहीं रहा, पर युद्ध का बिल अप्रत्यक्ष रूप से चुका रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में बाहर से खरीदता है। जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तेल महंगा होता है, जहाजों का बीमा महंगा होता है, आपूर्ति अनिश्चित होती है और भारत को उसी तेल के लिए अधिक डॉलर देने पड़ते हैं। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रिऊटर्स की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और महंगे तेल के कारण रुपया रिकॉर्ड निचले स्तरों तक पहुँचा, और 2026 में वह एशिया की कमजोर प्रमुख मुद्राओं में रहा। 
          
 पहला कारण है-भारत डॉलर कमाता है, पर तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रक्षा उपकरण और कई आवश्यक वस्तुओं के लिए डॉलर खर्च भी बहुत करता है। जब आयात बिल तेजी से बढ़ता है और निर्यात उसी गति से नहीं बढ़ता, तो देश से डॉलर अधिक बाहर जाने लगते हैं। इसे ही चालू खाते का दबाव कहा जाता है। युद्ध अमेरिका का हो सकता है, पर तेल की कीमत भारत के आयात बिल में आग लगा देती है। डॉलर पर खर्च भारत करता है, इसलिए चोट रुपये को लगती है।
              
दूसरा कारण है-डर के समय विदेशी निवेशक जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालते हैं। भारत जैसे उभरते बाजारों में वे लाभ कमाने आते हैं, पर संकट के समय वे पैसा निकालकर डॉलर, अमेरिकी बॉन्ड या सुरक्षित परिसंपत्तियों में जाते हैं। रिऊटर्स के अनुसार संघर्ष शुरू होने के बाद भारतीय शेयरों से विदेशी निवेशकों की बड़ी निकासी हुई, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।  जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बेचते हैं, वे रुपये को डॉलर में बदलकर बाहर ले जाते हैं। इससे बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
           
तीसरा कारण है-डॉलर की माँग। मुद्रा की कीमत भी मांग और आपूर्ति से तय होती है। यदि भारत में तेल कंपनियों, सोना आयातकों, विदेशी कर्ज चुकाने वाली कंपनियों, विदेश यात्रा करने वालों और निवेश निकालने वालों को एक साथ डॉलर चाहिए, तो डॉलर महंगा होगा। डॉलर महंगा होगा तो रुपया कमजोर दिखेगा। यह किसी एक सरकार, एक दिन या एक बयान का परिणाम नहीं, बल्कि कई धाराओं का संगम है।
              
चौथा कारण है-भारत की संरचनात्मक आयात- निर्भरता। हम बहुत कुछ बनाते हैं, पर अब भी बहुत कुछ खरीदते हैं। ऊर्जा में निर्भरता, इलेक्ट्रॉनिक्स में निर्भरता, कुछ रक्षा-सामग्री में निर्भरता, उर्वरक और खाद्य तेल में निर्भरता-ये सब रुपये की पीठ पर अदृश्य बोझ हैं। जब दुनिया शांत रहती है, यह बोझ धीरे चलता है; जब दुनिया में युद्ध होता है, वही बोझ अचानक पहाड़ बन जाता है।
                    
पाँचवाँ कारण है-सोना। भारत में सोना भावना है, पर अर्थव्यवस्था में वह डॉलर-खर्च है। जब लोग अधिक सोना खरीदते हैं, तो सोना आयात होता है और उसके बदले डॉलर जाता है। इसलिए कठिन समय में सरकारें सोना खरीद पर नियंत्रण, शुल्क, बॉन्ड या अपील का रास्ता अपनाती हैं। हाल की रिपोर्टों में सरकार द्वारा ईंधन बचत, आयात संयम और विदेशी मुद्रा संरक्षण की चिंता स्पष्ट दिखती है। 
                    
छठा कारण है-अमेरिकी डॉलर की वैश्विक सत्ता। अमेरिका युद्ध में खर्च करे, फिर भी यदि दुनिया को लगता है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था, अमेरिकी बॉन्ड बाजार और डॉलर प्रणाली बाकी देशों से अधिक सुरक्षित है, तो डॉलर मजबूत रहता है। यह आर्थिक शक्ति से भी अधिक संस्थागत शक्ति है। अमेरिका कर्ज ले सकता है, डॉलर छाप सकता है, बॉन्ड बेच सकता है, और दुनिया फिर भी उसका कर्ज खरीदती है। यह सुविधा भारत, ईरान, रूस या अनेक देशों के पास नहीं है।
            
सातवाँ कारण है-रुपये की तुलना केवल डॉलर से हो रही है। हो सकता है डॉलर के मुकाबले कई मुद्राएँ कमजोर हों, पर जब हम कहते हैं रुपया गिरा, तो हम डॉलर को मापदंड बना रहे होते हैं। डॉलर यदि पूरी दुनिया के विरुद्ध मजबूत हो रहा है, तो रुपया कमजोर दिखेगा, भले भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त न हो। फिर भी भारत पर तेल और आयात का विशेष बोझ है, इसलिए दबाव अधिक दिखता है। अब प्रश्न आता है-सुधार कैसे हो? 
                  
सुधार का पहला उपाय है ऊर्जा आत्मनिर्भरता। सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, जैव ईंधन, इलेक्ट्रिक सार्वजनिक परिवहन और घरेलू गैस/तेल खोज को केवल घोषणाओं से नहीं, युद्धस्तर की नीति से आगे बढ़ाना होगा। जब तक भारत तेल पर निर्भर रहेगा, हर पश्चिम एशियाई तनाव रुपये के माथे पर पसीना ला देगा।
                  
सुधार का दूसरा उपाय है आयात घटाना, पर जबरदस्ती नहीं- उत्पादन बढ़ाकर। मोबाइल, चिप, बैटरी, मशीनरी, रक्षा उपकरण, खाद्य तेल, उर्वरक और औद्योगिक कच्चे माल में भारत को आत्मनिर्भरता की वास्तविक यात्रा करनी होगी। ‘स्थानीय खरीदो’ का नारा तब सफल होगा जब स्थानीय वस्तु गुणवत्ता, मूल्य और उपलब्धता में सक्षम होगी।
            
सुधार का तीसरा उपाय है निर्यात बढ़ाना। भारत को केवल उपभोक्ता राष्ट्र नहीं, उत्पादक और निर्यातक राष्ट्र बनना होगा। आईटी सेवा, दवा, कृषि-प्रसंस्करण, वस्त्र, हस्तशिल्प, शिक्षा, स्वास्थ्य-पर्यटन, आध्यात्मिक पर्यटन और डिजिटल सेवाएँ- ये डॉलर कमाने के स्वाभाविक मार्ग हैं। रुपये को मजबूत करने का सबसे सुंदर तरीका है- डॉलर कमाना।
               
सुधार का चौथा उपाय है विदेशी निवेश को टिकाऊ बनाना। केवल शेयर बाजार में आने-जाने वाला निवेश चंचल होता है। कारखाने लगाने वाला निवेश, टेक्नोलॉजी लाने वाला निवेश, रोजगार बनाने वाला निवेश और दीर्घकालिक पूँजी रुपये को अधिक स्थिरता देती है। नीति स्थिर हो, कर व्यवस्था सरल हो, अनुबंध विश्वसनीय हों और न्यायिक प्रक्रिया तेज हो- तो पूँजी भागती नहीं, ठहरती है।
         
सुधार का पाँचवाँ उपाय है मुफ्त योजनाओं की समीक्षा। गरीब की सहायता राष्ट्रधर्म है, पर चुनावी मुफ्तखोरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ सकती है। जो योजना व्यक्ति को श्रम, कौशल और आत्मनिर्भरता की ओर ले जाए, वह शुभ है; जो स्थायी निर्भरता बनाए, वह खतरनाक है। सरकारों को लोककल्याण और लोकलुभावन खर्च में स्पष्ट भेद करना होगा।
          
सुधार का छठा उपाय है सोने को मृत बचत से उत्पादक बचत में बदलना। भारत के घरों में रखा सोना भावनात्मक सुरक्षा है, पर अर्थव्यवस्था के लिए निष्क्रिय पूँजी भी है। यदि सरकार सुरक्षित, सरल और भरोसेमंद गोल्ड डिपॉजिट, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड, पेंशन और स्वास्थ्य सुरक्षा विकल्प दे, तो लोग भौतिक सोना कम खरीदेंगे। भरोसा बनेगा तो अलमारी का सोना अर्थव्यवस्था की धारा में आएगा।
       
सुधार का सातवाँ उपाय है रुपये का अंतरराष्ट्रीय उपयोग बढ़ाना। भारत यदि कुछ व्यापार रुपये में कर सके, मित्र देशों के साथ मुद्रा-समझौते बढ़ाए, तो डॉलर पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होगी। यह एक दिन का काम नहीं, पर आरंभ आवश्यक है।
         
सुधार का आठवाँ उपाय है सरकारी अनुशासन। जनता से पेट्रोल बचाने और सोना न खरीदने की अपील तभी नैतिक प्रभाव रखती है जब शासन स्वयं अनावश्यक खर्च, दिखावटी आयोजन, विलासिता और अल्पकालिक राजनीतिक खर्चों पर संयम दिखाए। राष्ट्र की अर्थव्यवस्था केवल जनता की जेब से नहीं सुधरती; वह नीति की सादगी और शासन की गंभीरता से सुधरती है।
          
इसलिए सत्य यही है कि युद्ध अमेरिका लड़े, ईरान लड़े, रूस लड़े या कोई और- भारत यदि तेल, सोना और आयात के लिए डॉलर पर निर्भर रहेगा, तो हर वैश्विक संकट रुपये को छुएगा। डॉलर इसलिए नहीं मजबूत होता कि अमेरिका निर्दोष है; वह इसलिए मजबूत होता है क्योंकि दुनिया की वित्तीय व्यवस्था अब भी उसके इर्द-गिर्द घूमती है। रुपया इसलिए गिरता है कि हमारी अर्थव्यवस्था में अभी भी आयात का भार, डॉलर की भूख और पूँजी की चंचलता मौजूद है।
         
इसलिए रुपये की रक्षा मुद्रा-बाजार में नहीं, खेत, कारखाने, प्रयोगशाला, बंदरगाह, विद्यालय, ऊर्जा-केंद्र और नीति-निर्माण की मेज पर होगी। जब भारत अधिक बनाएगा, अधिक बेचेगा, कम आयात करेगा, ऊर्जा में आत्मनिर्भर होगा, चुनावी खर्च पर संयम रखेगा और जनता को सुरक्षित निवेश देगा- तब रुपया केवल कागज का नोट नहीं रहेगा, वह राष्ट्र की रीढ़ बन जाएगा।

रुपया इसलिए नहीं गिरता कि भारत युद्ध लड़ रहा है; वह इसलिए गिरता है क्योंकि युद्ध के समय भारत को महंगा तेल, महंगा डॉलर और चंचल विदेशी पूँजी का सामना करना पड़ता है। डॉलर अमेरिका की मुद्रा है, पर दुनिया का डर भी उसी में शरण लेता है। रुपये को मजबूत करना है तो भारत को केवल बचत नहीं, उत्पादन, निर्यात, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और राजकोषीय अनुशासन की दिशा में निर्णायक कदम उठाने होंगे।