राजनीति के 'भ्रम' में बर्बाद हो रहा युवाओं का भविष्य, चुनाव में युवाओं की भूमिका पर डॉ. विनय कुमार वर्मा का बड़ा कटाक्ष
चुनाव के शोर में झंडा उठाने वाले युवाओं के लिए डॉ. विनय कुमार वर्मा का यह लेख आँखें खोलने वाला है। क्या नेताजी के कंधे पर हाथ रखने मात्र से आपका भविष्य संवर जाएगा? पढ़िए, राजनीति की कड़वी सच्चाई।
चुनावी रैलियों में युवाओं की बढ़ती भीड़
नेताजी के खास होने का जानलेवा भ्रम
नारों और झंडों के पीछे खोता भविष्य
राजनीति में युवाओं के इस्तेमाल का सच
चुनावी मौसम आते ही सड़कों पर उत्साह की लहर दौड़ जाती है। गली-मोहल्लों से लेकर सोशल मीडिया तक युवाओं की एक फौज नजर आने लगती है। डॉ. विनय कुमार वर्मा का लेख इसी 'राजनीतिक जागरण' के पीछे छिपे एक गंभीर संकट की ओर इशारा करता है। आखिर क्यों हमारा युवा अपने सुनहरे भविष्य को छोड़कर किसी नेता का 'झंडाबरदार' बनने में ही गर्व महसूस कर रहा है?
'खास आदमी' होने का घातक भ्रम
लेखक डॉ. विनय कुमार वर्मा कहते हैं कि चुनाव आते ही युवाओं को एक अजीब सा भ्रम घेर लेता है। उन्हें लगता है कि नेताजी का उनके कंधे पर हाथ रखना या मुस्कुराकर नाम ले लेना, उनकी सफलता की गारंटी है। यह 'सामूहिक स्वप्न' युवाओं को यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि वे अब नेताजी के सबसे करीबी हैं। जबकि हकीकत में, वे केवल उस भीड़ का हिस्सा मात्र हैं, जिसका उपयोग शक्ति प्रदर्शन के लिए किया जाता है।
कभी आपने गौर किया है- हर चुनाव के मौसम में अचानक देश में युवाओं की बाढ़ आ जाती है। सड़कों पर, चौराहों पर, रैलियों में,मोटरसाइकिलों की कतारों में… झंडे लहराते, गले में गमछा डालकर नारे लगाते हुए। ऐसा लगता है जैसे पूरा देश जाग गया हो। लेकिन सच पूछिए तो यह जागरण नहीं, एक अजीब-सा सामूहिक स्वप्न है- जिसमें हर युवा खुद को किसी नेता का “सबसे खास आदमी” समझ रहा होता है।
...और यही भ्रम उसकी सबसे बड़ी त्रासदी बन जाता है। वह सोचता है- “नेता जी मुझे जानते हैं… मेरे कंधे पर हाथ रखा था… मुस्कुराकर देखा था… मेरा नाम लिया था…” बस, यहीं से उसका भविष्य धीरे-धीरे नेता जी के जूते के नीचे आ जाता है और उसे पता भी नहीं चलता। वह भूल जाता है कि नेता जी के लिए वह बस एक चेहरा है- भीड़ का एक हिस्सा… एक नारा… एक वोट… एक पोस्टर का बैकग्राउंड। लेकिन वह खुद को “भविष्य का प्रधान/ सभासद, क्षेत्र /जिला पंचायत सदस्य, चेयरमैन, विधायक, सांसद.. आदि” समझने लगता है। यह व्यंग्य नहीं है… यह आज के युवाओं की सच्चाई है।
आप किसी भी छोटे कस्बे या शहर में चले जाइए… आपको ऐसे हजारों युवा मिल जाएंगे, जिनकी सुबह किसी किताब से नहीं, बल्कि किसी नेता के व्हाट्सएप मैसेज से शुरू होती है।
“आज रैली है…”
“आज स्वागत करना है…”
“आज बाइक रैली निकालनी है…” और वे सब कुछ छोड़कर दौड़ पड़ते हैं- मानो देश का भविष्य उन्हीं के कंधों पर टिका हो। पर एक सवाल पूछिए- जब यह रैली खत्म हो जाती है, तब उनका अपना जीवन कहाँ होता है?..किसी के पास डिग्री नहीं…किसी के पास हुनर नहीं…किसी के पास रोजगार नहीं…लेकिन हाँ, उनके पास नेता जी के साथ 50 फोटो जरूर होती हैं।
यह एक अजीब विडंबना है- देश में सबसे ज्यादा बेरोजगार वही युवा हैं, जो सबसे ज्यादा “व्यस्त” दिखाई देते हैं। सुबह से शाम तक नेता जी के पीछे-पीछे घूमते हैं, नारे लगाते हैं, पोस्टर चिपकाते हैं, कुर्सियाँ लगाते हैं, दरी बिछाते हैं, और रात को थककर सो जाते हैं- यह सोचकर कि उन्होंने आज “बहुत बड़ा काम” किया है। सच पूछिए तो उन्होंने काम नहीं किया… उन्होंने अपने जीवन का एक और दिन खो दिया।.... और यह खोना धीरे-धीरे आदत बन जाता है। राजनीति एक मंच है-लेकिन मंच पर वही खड़ा होता है, जो पहले खुद को तैयार करता है। जो पढ़ता है, सोचता है, समझता है, समाज को जानता है। लेकिन हमारे युवा क्या कर रहे हैं? वे मंच के पीछे खड़े होकर ताली बजा रहे हैं…और सोच रहे हैं कि एक दिन वे भी मंच पर होंगे।
यह वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति बिना पढ़े IAS बनने का सपना देखे…या बिना अभ्यास के क्रिकेट टीम में जगह पाने की उम्मीद करे।
राजनीति कोई जादू की छड़ी नहीं है कि आपने झंडा उठाया और जीवन बदल गया। बल्कि यह एक ऐसी जगह है, जहाँ बिना तैयारी के गए लोग सबसे पहले कुचले जाते हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में युवा अपने अंदर एक झूठा आत्मविश्वास पैदा कर लेते हैं। उन्हें लगता है कि वे बहुत “पावरफुल” हैं… क्योंकि वे नेता जी के करीब हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि वे जितने करीब दिखते हैं, उतने ही दूर होते हैं। नेता जी के लिए वे उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितना किसी शादी में खाना परोसने वाला वेटर।
जब तक मेहमान हैं, तब तक वेटर भी जरूरी है। लेकिन जैसे ही खाना खत्म… वेटर की जरूरत खत्म। आपने कभी सोचा है- जो नेता आज आपको “भाई” कहकर बुला रहा है, क्या वह आपके घर की जिम्मेदारी लेगा? क्या वह आपके बच्चों की फीस भरेगा? क्या वह आपके माता-पिता का इलाज करवाएगा? अगर नहीं… तो फिर आप उसके लिए अपनी जवानी क्यों दांव पर लगा रहे हैं? यह सवाल कड़वा है...लेकिन जरूरी है।
हमारे समाज में एक अजीब-सी मानसिकता बन गई है- कि राजनीति में जाओ, तो “सेट” हो जाओगे। लेकिन कोई यह नहीं बताता कि राजनीति में “सेट” होने के लिए पहले जीवन में “सेट” होना पड़ता है। जो लोग आज बड़े नेता हैं, उन्होंने भी पहले अपने जीवन को मजबूत बनाया था।
किसी ने पढ़ाई की… किसी ने व्यवसाय किया…किसी ने सामाजिक कार्यों में पहचान बनाई…तब जाकर वे राजनीति में टिक पाए। लेकिन आज का युवा बिना नींव के महल बनाने चला है।..और फिर जब महल गिरता है, तो उसे समझ में आता है कि उसने जीवन के सबसे कीमती साल किस भ्रम में गंवा दिए।
यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि कोई भी नेता यह नहीं चाहता कि उसका कार्यकर्ता उससे आगे निकल जाए। वह आपको हमेशा अपने नीचे ही रखना चाहेगा- ताकि आप उसके लिए काम करते रहें।..आप जितना उसके पीछे दौड़ेंगे, वह उतना आगे भागेगा और आप… हमेशा पीछे ही रह जाएंगे। इसलिए यह समय है कि युवा खुद से सवाल पूछें- क्या मैं भीड़ का हिस्सा हूँ… या अपनी पहचान बनाने वाला इंसान? क्या मैं दूसरों के सपनों को पूरा कर रहा हूँ… या अपने सपनों को जी रहा हूँ? क्या मैं अपने भविष्य को बना रहा हूँ… या उसे धीरे-धीरे खत्म कर रहा हूँ?
अगर इन सवालों के जवाब ईमानदारी से दे दिए जाएं, तो आधा जीवन अपने आप सही दिशा में आ जाएगा।जीवन का सच बहुत सरल है- जो अपने समय का मूल्य नहीं समझता, समय उसका मूल्य खत्म कर देता है। आज जो युवा अपनी जवानी को हल्के में ले रहा है, कल वही युवा नौकरी के लिए दर-दर भटकेगा। आज जो नेता के पीछे बाइक चला रहा है, कल वही अपने बच्चों की फीस भरने के लिए परेशान होगा और तब उसे समझ आएगा कि रैली में सबसे आगे चलने वाला, जीवन में सबसे पीछे रह गया।
ये बातें किसी राजनीति के खिलाफ नहीं है- यह उस मानसिकता के खिलाफ है, जो युवाओं को बिना सोचे- समझे भीड़ का हिस्सा बना देती है। अगर आप सच में राजनीति में जाना चाहते हैं-तो जाइए। लेकिन पहले खुद को तैयार कीजिए। इसीलिए पढ़िए…समझिए…कौशल विकसित कीजिए…आर्थिक रूप से मजबूत बनिए…तब राजनीति आपके लिए अवसर बनेगी, बोझ नहीं।
लेकिन याद रखिए-
खाली जेब और बड़ी महत्वाकांक्षा, जीवन का सबसे खतरनाक संयोजन है।
यह आपको सपने तो दिखाएगा, लेकिन उन्हें पूरा करने की ताकत नहीं देगा।
इसलिए पहले अपनी जेब मजबूत कीजिए…फिर अपने सपनों को उड़ान दीजिए।
आज जरूरत इस बात की है कि युवा अपने जीवन की दिशा बदलें। वे समझें कि भीड़ में खड़े होकर चिल्लाने से ज्यादा जरूरी है- अकेले खड़े होकर कुछ कर दिखाना। जब युवा आत्मनिर्भर बनेंगे, तब राजनीति भी बदलेगी। तब नेता भी जमीन पर आकर काम करेंगे- क्योंकि उनके पीछे अंधी भीड़ नहीं, समझदार नागरिक खड़े होंगे। अब बस इतना ही- झंडा उठाना आसान है…लेकिन जीवन उठाना मुश्किल है। निर्णय आपको करना है- आप झंडा उठाएंगे… या अपना भविष्य?