विकास या विनाश? चंदौली में ड्रेनों की आधी-अधूरी खुदाई से कायम है बाढ़ का खतरा, भारतमाला प्रोजेक्ट के ठेकेदारों को बेची सरकारी मिट्टी

 

चंदौली में बिना किसी स्वीकृत बजट और प्रोजेक्ट के 31 सरकारी नालों की खुदाई का सनसनीखेज मामला सामने आया है। खुदाई से निकली उपजाऊ मिट्टी को भारतमाला प्रोजेक्ट के ठेकेदारों को बेचकर स्थानीय भुगतान का अनोखा 'जुगाड़' किया गया है।

 
 

31 सरकारी ड्रेनों की अवैध खुदाई

भारतमाला प्रोजेक्ट को बेची गई मिट्टी

बिना बजट शुरू हुआ पूरा खेल

मानसून में बढ़ा जलभराव का खतरा

किसानों की उपजाऊ मिट्टी हुई गायब

चंदौली जिले में इन दिनों विकास की आड़ में एक ऐसा अजीबोगरीब खेल देखने को मिल रहा है, जिसने सरकारी सिस्टम की ईमानदारी पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जिले के भीतर जल निकासी की व्यवस्था को पटरी पर लाने के नाम पर '31 ड्रेनों (नालों) की खुदाई और मिट्टी की धड़ल्ले से बिक्री' का एक बड़ा मामला गरमाया हुआ है। यह पूरी कहानी सरकारी अधिकारियों के 'देसी जुगाड़', आधे-अधूरे कामों और सीधे तौर पर गरीब किसानों की सुरक्षा के साथ किए गए खिलवाड़ की जीती-जागती मिसाल बन चुकी है। चंदौली समाचार के साथ खास बातचीत में पूर्व सांसद व सपा नेता रामकिशुन यादव ने जमकर भाजपा सरकार के अफसरों व सत्तापक्ष के नेताओं पर सवालिया निशान दागा, जो हर समय मीडिया के सामने लंबी-लंबी बातें करके डबल इंजन की सरकार की उपलब्धियां गिनाते हैं। 

अमूमन किसी भी सरकारी काम को शुरू करने के लिए बजट और कागजी मंजूरी की जरूरत होती है, लेकिन चंदौली का यह मामला बिल्कुल उल्टा है। यहाँ बिना किसी पक्के बजट के ही पोकलेन और जेसीबी मशीनें गरजने लगीं और देखते ही देखते कई किलोमीटर लंबे नाले खोद दिए गए। अब जब मानसून सिर पर आ गया है, तो इस अधूरे काम ने आसपास के दर्जनों गांवों के किसानों की रातों की नींद उड़ा दी है।

बिना पक्का प्रोजेक्ट पास हुए ही चलने लगीं मशीनें

इस पूरे मामले की जड़ में जाएं तो पता चलता है कि जिले की खराब जल निकासी को ठीक करने के लिए भाजपा नेताओं की तरफ से दावा किया गया था कि 31 प्रमुख ड्रेनों की खुदाई का टेंडर हुआ है। इन ड्रेनों में जनपद की बेहद खास और बड़ी ड्रेनें शामिल थीं, जैसे कि सुनार बड़ी ड्रेन, लहरा-मनिहरा ड्रेन और स्थानीय रिहायशी इलाकों के ठीक पास से गुजरने वाली गौरी-कोटवा ड्रेन।

चौंकाने वाली बात यह रही कि सिंचाई मंत्री ने खुद बड़े मंचों से दावा किया था कि इन नालों की कायाकल्प के लिए लगभग 350 करोड़ रुपये की एक भारी-भरकम परियोजना बनाई जा रही है। लेकिन जब आरटीआई और विभागीय सूत्रों से असली हकीकत का पता लगाया गया, तो मालूम पड़ा कि शासन स्तर से इस काम के लिए फूटी कौड़ी भी मंजूर नहीं की गई थी। अब सवाल यह उठता है कि जब सरकार की तरफ से कोई पैसा ही नहीं आया और प्रोजेक्ट को हरी झंडी नहीं मिली, तो फिर धरातल पर करोड़ों का यह काम किसके कहने पर और क्यों शुरू कर दिया गया? इसका सीधा और कड़वा जवाब यहाँ की कीमती 'मिट्टी' के खेल में छिपा हुआ है।

भारतमाला प्रोजेक्ट के ठेकेदारों से हुआ मिट्टी का गुप्त सौदा

चूंकि सिंचाई विभाग (बंधी डिवीजन) के पास इस काम को कराने के लिए सरकारी खजाने से कोई बजट नहीं था, इसलिए अधिकारियों और स्थानीय रसूखदारों ने मिलकर एक 'नायाब जुगाड़' निकाला। ठीक इसी समय जिले के भीतर 'भारतमाला प्रोजेक्ट' के तहत एक बहुत बड़ी सड़क (एक्सप्रेस-वे) का निर्माण कार्य चल रहा था। इस सड़क को ऊंचा करने और भरने के लिए ठेकेदारों को लाखों टन मिट्टी की सख्त जरूरत थी।

बस फिर क्या था, विभाग और भारतमाला प्रोजेक्ट के बड़े ठेकेदारों के बीच स्थानीय स्तर पर एक अंदरूनी एग्रीमेंट हो गया। इस समझौते के तहत ड्रेनों की खुदाई से जो भी उपजाऊ और कीमती मिट्टी निकल रही थी, उसे बिना किसी सरकारी एग्रीमेंट या आधिकारिक रसीद के सीधे भारतमाला प्रोजेक्ट की सड़कों में डाल दिया गया। इसके बदले में भारतमाला के ठेकेदारों ने बंदी डिवीजन के चहेते ठेकेदारों को सीधे पेमेंट  कर दिया। यानी न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी; बिना सरकारी बजट के ही करोड़ों का खेल पर्दे के पीछे निपटा दिया गया।

मिट्टी निकलते ही भाग खड़े हुए ठेकेदार, आधा-अधूरा छूटा काम

इस पूरे घालमेल की सबसे घिनौनी हकीकत तब सामने आई जब ठेकेदारों का मिट्टी निकालने का मकसद पूरा हो गया। जैसे ही भारतमाला प्रोजेक्ट के लिए जरूरी मिट्टी मिल गई, ड्रेनों की खुदाई कर रहे ठेकेदारों ने रातों-रात अपना बोरिया-बिस्तर समेटा और काम को बीच में ही छोड़कर रफूचक्कर हो गए।

नियम के मुताबिक, नाले की खुदाई के बाद उसके दोनों किनारों को मिट्टी डालकर ऊंचा और मजबूत  बनाया जाना चाहिए था, ताकि बरसात में पानी गांवों में न घुसे। लेकिन ठेकेदारों ने ऐसा कुछ नहीं किया। आज भी इन नालों के भीतर भारी मात्रा में जलकुंभी, सिल्ट और कचरा जस का तस भरा पड़ा है, जिससे पानी के बहने का रास्ता पूरी तरह ब्लॉक हो चुका है।

किसानों के सिर पर मंडराया बाढ़ और जलभराव का बड़ा खतरा

इस पूरे 'मिट्टी के काले कारोबार' का सबसे भारी हर्जाना अब चंदौली के भोले-भाले किसानों को भुगतना पड़ रहा है। मानसून की भारी बारिश शुरू हो चुकी है। अब डर यह है कि इन आधे-अधूरे खुदे हुए नालों में जब पानी का भारी दबाव बढ़ेगा, तो पानी आगे निकलने के बजाय कमजोर किनारों को तोड़कर सीधे किसानों के लहलहाते खेतों में भर जाएगा। जिससे धान की फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी।

इसके अलावा, सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि आमतौर पर सरकारी नालों से निकलने वाली उपजाऊ सिल्ट और मिट्टी को स्थानीय किसानों के खेतों में डाला जाता था, जिससे उनके खेत ऊंचे होते थे और फसल अच्छी होती थी। लेकिन इस बार वह पूरी उपजाऊ मिट्टी किसानों के खेतों में जाने के बजाय भारतमाला की चमचमाती सड़कों के नीचे दबाकर बेच दी गई। यह पूरा वाकया प्रशासनिक भ्रष्टाचार और घोर लापरवाही की जीती-जागती कहानी कह रहा है, जिस पर सत्तापक्ष के नेता अब पूरी तरह चुप्पी साधे बैठे हैं।