विरासत बचाने की गुहार: चकिया में गोंडवाना राजचिन्ह के संरक्षण के लिए आदिवासी समाज ने निकाली रैली
चकिया में गोंड़ और खरवार आदिवासी समाज ने अपनी गौरवशाली विरासत 'गोंडवाना राजचिन्ह' के संरक्षण के लिए एक विशाल रैली निकाली। वन विश्रामगृह दिलकुशा परिसर से शुरू हुई इस रैली में लोगों ने प्रतीक चिन्ह की उपेक्षा पर चिंता जताते हुए इसे ऐतिहासिक धरोहर घोषित करने और इसके सौंदर्यीकरण की मांग की।
दिलकुशा परिसर से आदिवासी समाज की अधिकार रैली
'हाथी पर शेर' अंकित गोंडवाना राजचिन्ह का पूजन और माल्यार्पण
गोंड़ व खरवार समाज ने जताई ऐतिहासिक धरोहर की उपेक्षा पर चिंता
उत्तर प्रदेश सरकार से संरक्षण और सौंदर्यीकरण की अपील
आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक विरासत बचाने का संकल्प
चंदौली जनपद के चकिया नगर पंचायत स्थित वन विश्रामगृह (दिलकुशा परिसर) से सोमवार को आदिवासी समाज की एक महत्वपूर्ण रैली निकाली गई। गोंड राजाओं द्वारा स्थापित ऐतिहासिक 'गोंडवाना राजचिन्ह' के अस्तित्व पर मंडराते खतरे और इसकी उपेक्षा को लेकर गोंड़ व खरवार समाज के लोगों ने एकजुटता दिखाई। रैली की शुरुआत में समाज के प्रतिनिधियों ने 'हाथी पर शेर' अंकित प्राचीन प्रतीक चिन्ह पर माल्यार्पण किया और इसे अपने पूर्वजों की वीरता व गौरव का प्रतीक बताया।
उचित देखरेख के अभाव में क्षतिग्रस्त हो रही धरोहर
रैली को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने गहरी चिंता व्यक्त की कि गोंडवाना राजचिन्ह आदिवासी इतिहास और परंपरा का एक अटूट हिस्सा है, लेकिन वर्तमान में यह प्रशासनिक उदासीनता का शिकार है। देखरेख और सुरक्षा के अभाव में यह महत्वपूर्ण प्रतीक चिन्ह धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो रहा है। वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आदिवासी समाज की यह ऐतिहासिक पहचान मिट जाएगी।
सरकार और प्रशासन से बड़ी मांगें
आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने उत्तर प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन के समक्ष निम्नलिखित मांगें रखीं...
1-ऐतिहासिक धरोहर का दर्जा: गोंडवाना राजचिन्ह को आधिकारिक रूप से ऐतिहासिक धरोहर घोषित किया जाए।
2-सौंदर्यीकरण और स्वच्छता: दिलकुशा परिसर में राजचिन्ह के आसपास विशेष साफ-सफाई और सौंदर्यीकरण कराया जाए।
3-सुरक्षा व्यवस्था: प्रतीक चिन्ह को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक बाउंड्री या सुरक्षा कवच की व्यवस्था हो।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन के जरिए दिखायी एकजुटता
रैली में शामिल लोगों ने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को रखा और प्रशासन से जल्द ही किसी सकारात्मक पहल की उम्मीद जताई। समाज के लोगों का कहना है कि यह केवल एक पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। कार्यक्रम में मुख्य रूप से विजय गोंड़, कुंदन गोंड़, रामदुलारे गोंड सहित आदिवासी समाज के सैकड़ों महिला-पुरुष और युवा उपस्थित रहे।