अनंत चतुर्दशी का है खास महत्व, भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा से मिलती है पापों से मुक्ति, जानिए 14 गांठ वाले सूत्र का रहस्य

अनंत चतुर्दशी भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा का पर्व है। इस दिन 14 गांठों वाला अनंत सूत्र बांधा जाता है और गणेश विसर्जन होता है। पांडवों और कौंडिन्य ऋषि की कथा से इसका महत्व जुड़ा है।

 
 

भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को मनाई जाती है अनंत चतुर्दशी

भगवान विष्णु के अनंत शयन रूप की होती है पूजा

14 गांठों वाला अनंत सूत्र बांधना है मुख्य नियम

इसी दिन 10 दिन के गणेशोत्सव का होता है समापन

जैन धर्म में पर्युषण पर्व का समापन और वासुपूज्य का मोक्ष दिवस

अनंत चतुर्दशी जिसे अनंत चौदस भी कहा जाता है, सनातन धर्म का एक बहुत ही पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहार है। यह पर्व मुख्य रूप से भगवान विष्णु के अनंत रूप को समर्पित है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को यह त्योहार मनाया जाता है। इस पर्व का महत्व हिंदू और जैन दोनों धर्मों में बहुत ज्यादा है।

1. भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा
इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु के अनंत शयन रूप की पूजा करते हैं। यानी क्षीरसागर में शेषनाग पर विश्राम करते हुए विष्णु जी का ध्यान किया जाता है। अनंत का मतलब है जिसका न कोई आदि है और न कोई अंत, यानी स्वयं श्री नारायण। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजन करने से जीवन के सभी दुख और पाप दूर हो जाते हैं और सुख-समृद्धि मिलती है।

2. 14 गांठों वाला अनंत सूत्र
इस व्रत का सबसे मुख्य नियम अनंत सूत्र या अनंत का डोरा बांधना है। यह रेशम या सूती धागा होता है, जिसमें 14 गांठें लगाई जाती हैं। ये 14 गांठें भगवान विष्णु द्वारा बनाए गए 14 लोकों का प्रतीक मानी जाती हैं। इन लोकों के नाम हैं - भूर, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यः, अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल। पूजा के बाद पुरुष इसे अपने दाहिने हाथ पर और महिलाएं अपने बाएं हाथ पर बांधती हैं।

3. गणेश विसर्जन का अंतिम दिन
यह दिन उत्सव के लिहाज से भी बहुत बड़ा है। क्योंकि इसी दिन 10 दिनों से चले आ रहे गणेशोत्सव का समापन होता है। श्रद्धालु पूरे गाजे-बाजे के साथ गणपति बप्पा की मूर्तियों का पवित्र जलाशयों या समुद्र में विसर्जन करते हैं।

4. जैन धर्म में भी है बड़ा महत्व
जैन समुदाय, खासकर दिगंबर जैन समाज के लिए यह दिन बहुत आध्यात्मिक होता है। इस दिन उनके सबसे महत्वपूर्ण 10 दिन के पर्व पर्युषण पर्व का समापन होता है। साथ ही जैन मान्यता के अनुसार 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य ने इसी दिन मोक्ष प्राप्त किया था।

अनंत चतुर्दशी की व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाठ हारकर वन में कष्ट झेल रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिलने आए। तब युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से इस दुख से निकलने का उपाय पूछा। श्रीकृष्ण ने उन्हें सभी पापों का नाश करने वाला अनंत व्रत करने की सलाह दी और एक कथा सुनाई।प्राचीन काल में सुमंत नाम के एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे। उनकी पुत्री का नाम सुशीला था, जिसका विवाह कौंडिन्य ऋषि से हुआ था। एक बार विदाई के बाद आश्रम लौटते समय शाम हो गई, तो वे यमुना नदी के किनारे रुके। वहां सुशीला ने कुछ महिलाओं को सुंदर कपड़े पहनकर भगवान अनंत की पूजा करते देखा। पूछने पर महिलाओं ने उन्हें अनंत व्रत का महत्व बताया। सुशीला ने उसी समय रेशमी धागे में 14 गांठें लगाकर वह डोरा अपने हाथ में बांध लिया। जब कौंडिन्य ऋषि को यह पता चला, तो उन्होंने इसे भगवान का अपमान समझकर गुस्से में वह डोरा निकालकर आग में जला दिया। इस अनादर के कारण ऋषि का सारा धन और वैभव नष्ट हो गया। अपनी गलती का अहसास होने पर ऋषि पश्चाताप करते हुए भगवान अनंत की खोज में वन में निकल पड़े। बहुत भटकने के बाद जब वे बेहोश होकर गिर पड़े, तब भगवान अनंत प्रकट हुए।

भगवान ने कहा कि यदि वे घर लौटकर 14 वर्षों तक विधि-विधान से यह व्रत करें, तो उनके सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। ऋषि ने वैसा ही किया और उन्हें फिर से सुख-समृद्धि मिली। श्रीकृष्ण की प्रेरणा से युधिष्ठिर ने भी यह व्रत किया, जिसके बाद पांडवों को महाभारत के युद्ध में जीत मिली और खोया हुआ राज्य वापस मिला।