चंदौली के रामगढ़ में बाबा कीनाराम जन्मोत्सव के दौरान हो रही बाबा की सिद्धियों और चमत्कारों की चर्चा

 

चंदौली में अघोर पंथ के संस्थापक बाबा कीनाराम का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। सिद्धियों और चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध बाबा के दरबार में हजारों श्रद्धालु आशीर्वाद लेने पहुंच रहे हैं।

 
 

चंदौली के रामगढ़ में जन्मोत्सव

तीन दिवसीय विशाल भंडारा व पूजा

अघोर पंथ के संस्थापक बाबा

बाबा की सिद्धियों के अनोखे चमत्कार

तपोभूमि में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

चंदौली जिले में स्थित रामगढ़ में अघोर पंथ के महान संत स्वामी कीनाराम महाराज का जन्मोत्सव बड़ी ही धूमधाम से मनाया जा रहा है। तीन दिनों तक चलने वाले इस भव्य आयोजन में पूजा-पाठ, सांस्कृतिक कार्यक्रम और विशाल भंडारे के आयोजन का आज तीसरा और आखिरी दिन है। पहले दो दिनों की तरह आज भी बाबा के दरबार और उनकी तपोभूमि पर मत्था टेकने के लिए चंदौली ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन पहुंच रहे हैं।

रामगढ़ की माटी में जन्मे अघोर पंथ के महान संत
बाबा कीनाराम जी का जन्म चंदौली जिले के रामगढ़ में हुआ था, जिन्हें अघोर पंथ का प्रतिस्थापक माना जाता है। उनके पिता का नाम अकबर सिंह और माता का नाम मनसा देवी था। उनके जन्म की तारीख को लेकर कुछ भ्रम जरूर है, लेकिन उनका जन्म वर्ष 1693 के आसपास माना जाता है। उनके माता-पिता की कोई भी संतान जीवित नहीं बचती थी, इसलिए पुरानी परंपरा के अनुसार इस बच्चे की सांकेतिक खरीद-बिक्री की गई, जिससे उनका नाम 'कीनाराम' पड़ा।

बचपन में वैराग्य और गुरु से दीक्षा की शुरुआत
बाबा कीनाराम का विवाह बचपन में ही लगभग 10 से 12 वर्ष की उम्र में कात्यायनी देवी के साथ कर दिया गया था। हालांकि, दुल्हन की विदाई से पहले ही बाबा ने अपने परिवार को बता दिया था कि दुल्हन की मृत्यु हो चुकी है और यह बात सच साबित हुई। पत्नी के निधन के बाद उन्हें संसार से वैराग्य हो गया और वे अपना सब कुछ छोड़कर साधना के मार्ग पर निकल पड़े। 

चलते-चलते वे बलिया जिले के कामेश्वर धाम (कारों) पहुंचे, जहां भगवान शिव ने तपस्या की थी। वहां उनकी मुलाकात अघोर पंथ के प्रसिद्ध संत शिवाराम महाराज से हुई। कीनाराम जी ने शिवाराम जी से दीक्षा ली और उन्हें अपना पहला गुरु बनाया। इसके बाद वे हिंगलाज भवानी के दर्शन करने गए और फिर काशी (वाराणसी) आ गए, जो आज 'क्रीं कुंड' या बाबा कीनाराम आश्रम के नाम से पूरी दुनिया में विख्यात है।

ज़मींदार का अहंकार तोड़ा, कोड़े की मार खुद सही
बाबा कीनाराम की सिद्धियों और अलौकिक चमत्कारों की कहानियां आज भी बहुत मशहूर हैं। एक बार बाबा किसी गांव से गुजर रहे थे, जहां के जमींदार का नियम था कि लगान न चुकाने पर लोगों को कोड़े मरवाए जाते थे। गांव की एक गरीब वृद्धा अपने बेटे के लिए रो रही थी, क्योंकि सूखा पड़ने के कारण उसका बेटा जमींदारी का कर जमा नहीं कर पाया था। 

बाबा ने उस जमींदार से जाकर उस लड़के को माफ करने का अनुरोध किया, लेकिन धन के घमंड में चूर जमींदार नहीं माना। इसके बाद बाबा एक पेड़ के नीचे बैठकर मंत्रों का जाप करने लगे। जैसे ही कारिंदों ने लड़के पर कोड़े बरसाने शुरू किए, एक अद्भुत चमत्कार हुआ—कोड़े लड़के को पड़ रहे थे, लेकिन उनका दर्द और निशान जमींदार की पीठ पर बन रहे थे। यह देखकर जमींदार घबरा गया, उसने तुरंत कोड़े रुकवाए और बाबा से क्षमा मांगी।

वाराणसी के लोटा बाबा का भंडारा और अनोखा चमत्कार
एक अन्य ऐतिहासिक घटना वाराणसी के ईश्वर गंगी मोहल्ले की है, जहां वैष्णव संत लोटा बाबा हर साल साधुओं के लिए बड़ा भंडारा करते थे। लोटा बाबा ने काशी में रहने वाले अघोरी बाबा कीनाराम को कभी इस भंडारे में निमंत्रित नहीं किया था। एक बार जब भंडारा चल रहा था और साधु भोजन करने ही वाले थे, तो अचानक पत्तलों पर परोसी गई मिठाइयां और पकवान मांस-मछली में बदल गए और जल की जगह शराब बन गई।

जब लोटा बाबा चिंतित हुए, तो एक साधु ने बताया कि पास के पीपल के पेड़ के नीचे बाबा कीनाराम बैठे हैं और निमंत्रण न मिलने के कारण यह सब हुआ है। इसके बाद लोटा बाबा ने स्वयं जाकर बाबा कीनाराम से अपनी भूल की क्षमा मांगी। बाबा के भंडारे में पहुंचते ही सारा भोजन फिर से पूर्ववत स्वादिष्ट पकवानों में बदल गया और सभी साधुओं ने प्रेमपूर्वक भोजन ग्रहण किया।

गंगा में बहते शव में फूंक दिए थे प्राण
बाबा की सिद्धियों का एक और बड़ा उदाहरण तब देखने को मिला जब वे संत कालूराम के साथ गंगा किनारे जा रहे थे। गंगा में एक शव बहता हुआ आ रहा था, जिसे देखकर कालूराम जी ने कहा कि देखो मृत शरीर बह रहा है। बाबा कीनाराम ने तुरंत कहा कि यह मृत नहीं बल्कि जीवित है।

जब कालूराम जी ने उस शरीर को बुलाने को कहा, तो बाबा ने दूर से ही आवाज दी, "इधर आओ"। बाबा की आवाज सुनते ही उस निर्जीव शरीर में प्राणों का संचार हो गया और वह व्यक्ति उठकर खड़ा हो गया तथा अपने घर की ओर चल दिया। अघोर पंथ के इस महान संत की साधना और सिद्धियों की गाथाएं आज भी लोगों को भक्ति और अध्यात्म से सराबोर कर देती हैं।