अध्यात्म का सच: भगवान को क्यों चढ़ता है सिर्फ '56 भोग'? जानिए इसके पीछे का असली गणित और गहरा राज
अक्सर लोग समझते हैं कि छप्पन भोग का मतलब भगवान को 56 तरह के पकवान चढ़ाना है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक और व्यावहारिक गणित छिपा है, जिसका संबंध हमारी इंद्रियों और उम्र से है? आइए जानते हैं।
छप्पन भोग के पीछे छिपा है गहरा अध्यात्म
भोजन के 6 रसों से बनता है यह खास भोग
इंसानी जीवन के 6 विकारों से है इसका सीधा संबंध
14 इंद्रियों और 4 विधियों का अनोखा गणित
संतोषी माता व्रत और खटाई का असली मतलब
जब भी किसी बड़े त्योहार या धार्मिक आयोजन की बात आती है, तो हमारे दिमाग में भगवान को चढ़ाए जाने वाले 'छप्पन भोग' की तस्वीर जरूर उभरती है। आम आदमी यही समझता है कि छप्पन भोग का मतलब है 56 अलग-अलग तरह के स्वादिष्ट पकवान तैयार करके भगवान के आगे परोस देना। प्रक्रिया के तौर पर तो यह बात बिल्कुल सही है, लेकिन हमारी सनातन संस्कृति में हर धार्मिक क्रिया के पीछे एक गहरा अध्यात्म और गहरा भाव छिपा होता है। इस भाव को जाने बिना पूजा का पूरा फल नहीं मिलता।
भोजन के 6 रस और भोग लगाने के तरीके
हम जो भी पकवान बनाते हैं, उनमें मुख्य रूप से छह रस होते हैं— खारा, मीठा, खट्टा, कड़वा, कसैला और तीखा (चरपरा)। इन छह रसों को मिलाकर ही 56 प्रकार के व्यंजन तैयार किए जाते हैं, जिसमें हर रस के आठ से नौ प्रकार के पकवान होते हैं। यही नहीं, शास्त्रों के अनुसार भोजन को ग्रहण करने की चार विधियां बताई गई हैं— चबाकर (चर्ब), चूसकर (चोष्य), चाटकर (लेह्य) और पीकर (पेय)।
आखिर '56' की संख्या ही क्यों चुनी गई?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि यह संख्या 56 ही क्यों है? न एक कम, न एक ज्यादा। दरअसल, व्यावहारिक जीवन में इंसान छह मुख्य विकारों या बुराइयों में डूबा रहता है— काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर (ईर्ष्या)। हमारे रोजमर्रा के व्यवहार और वाणी में भी ये छह रस दिखते हैं। जैसे सच कड़वा होता है, झूठ मीठा होता है, व्यंग्य तीखा होता है और मन में कपट हो तो कहते हैं कि खटास भरी हुई है।
कपट की खटाई और संतोषी माता का व्रत
खटाई के नाम पर समाज में एक बड़ी अज्ञानता भी फैली है। जैसे संतोषी माता के व्रत की कथा में जेठानियों ने कपट के चलते भोजन में खटाई मिला दी थी। यहाँ 'कपट' को ही खटाई का रूप माना गया था। लेकिन लोगों ने यह गांठ बांध ली कि व्रत में खटाई खाने से व्रत टूट जाएगा। असल में परहेज खटाई से नहीं, बल्कि दिल के कपट से करना था। रामचरितमानस में भी कहा गया है कि दूध और पानी प्रेम के कारण मिलकर एक भाव बिकते हैं, लेकिन जैसे ही कपट रूपी खटाई पड़ती है, दोनों अलग हो जाते हैं और स्वाद भी नष्ट हो जाता है।
जानिए 56 भोग का असली गणित
हम अपने जीवन में इन छह रसों को 14 इंद्रियों के माध्यम से भोगते हैं। इन चौदह इंद्रियों में पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार शामिल हैं। इसके साथ ही, हम अपनी उम्र के चार पड़ावों में इन रसों को चार अलग तरीकों से लेते हैं। जन्म से 25 साल तक हम जीवन के अनुभवों को पीकर (पेय) ग्रहण करते हैं, 25 से 50 साल तक चबाकर (चर्ब), 50 से 75 साल तक चूसकर (चोष्य) और 75 से 100 साल की उम्र तक चाटकर (लेह्य) भोगते हैं।
भगवान को सौंप दें अपनी इंद्रियां
इस प्रकार, जब हम अपनी 14 इंद्रियों के जरिए जीवन की 4 अवस्थाओं में मिलने वाले सभी भोगों को भगवान के चरणों में समर्पित कर देते हैं, तो यही असली छप्पन भोग बनता है। इसका सीधा गणित है:
इंद्रियां-4
विधियां/अवस्थाएं-14
4x14 = 56 भोग
यानी अपनी सभी इंद्रियों और जीवन को भगवान को सौंप देना ही सच्चा छप्पन भोग है। तरह-तरह के व्यंजन परोसना तो बाहरी ज्ञान है, लेकिन इस आंतरिक रहस्य को समझकर जीवन जीना ही असली ज्ञान है।