श्रीमद्भागवत महापुराण में है नरक चतुर्दशी और रूप चतुर्दशी का धार्मिक महत्व, जानें पौराणिक कथा, पूजा विधि और अभ्यंग-स्नान का समय

 

सनातन परंपरा में नरक चतुर्दशी व रूप चतुर्दशी का विशेष महत्व है। श्रीमद्भागवत अनुसार श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। जानिए अभ्यंग-स्नान, यम-तर्पण और दीपदान का धार्मिक विधान।

 
 

श्रीमद्भागवत में वर्णित नरकासुर वध प्रसंग

नरक चतुर्दशी पर अभ्यंग-स्नान की परंपरा

यमराज के 14 नामों से तर्पण विधान

चौमुखी दीपदान का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व

रूप चतुर्दशी पर सौंदर्य व षोडश श्रृंगार

दीपावली उत्सव श्रृंखला में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी, छोटी दीपावली और रूप चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। सनातन परंपरा में यह तिथि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अत्याचारी राक्षस नरकासुर के वध और उसके बंदीगृह से हजारों कन्याओं की मुक्ति से जुड़ी है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध (अध्याय 59) के अनुसार, जब नरकासुर ने युद्ध में शूल उठाया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया था। यह प्रसंग अधर्म पर धर्म की विजय का सर्वकालिक प्रतीक है।

अभ्यंग-स्नान और यम-तर्पण की शास्त्रीय परंपरा
धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे ग्रंथों में इस दिन सूर्योदय से पूर्व शरीर पर उबटन या तेल-मर्दन करके 'अभ्यंग-स्नान' करने का विधान है। मान्यता है कि इस स्नान से नरक के भय से मुक्ति और आरोग्य की प्राप्ति होती है। स्नान के उपरांत यमदेव के निमित्त तर्पण किया जाता है। पूजा विधि में ॐ यमाय नमः, ॐ धर्मराजाय नमः, ॐ मृत्यवे नमः सहित यमराज के 14 पवित्र नामों का उच्चारण करते हुए तिलयुक्त जल समर्पित किया जाता है। यह अनुष्ठान पितरों और यमराज के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का मार्ग है।

चौमुखी दीपदान और रूप चतुर्दशी का महत्व
सायंकाल के समय घर के मुख्य द्वार और देवालयों में चार बत्तियों (चौमुखी) वाला दीपक प्रज्वलित करने की प्रथा है। इसके लिए "दत्तो दीपश्चतुर्दश्यां नरकप्रीतये मया..." मंत्र के साथ दीपदान कर पापों के नाश व भयमुक्ति की प्रार्थना की जाती है। इसी दिन को रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है, जिसमें स्वच्छता, प्रसाधन और षोडश श्रृंगार के लोकाचार से सौंदर्य व सौभाग्य की कामना की जाती है। यह परंपरा बाह्य व आंतरिक दोनों प्रकार के रूप को संवारने की प्रेरणा देती है।

पर्व का आध्यात्मिक संदेश: अज्ञान का अंधकार दूर करने की प्रेरणा
भगवद्गीता के चौथे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब वे धर्म की पुनः स्थापना के लिए अवतार लेते हैं। नरक चतुर्दशी का वास्तविक आध्यात्मिक संदेश भी यही है कि मनुष्य अपने भीतर छिपे अहंकार, द्वेष, अन्याय और अज्ञान रूपी नरकासुर का अंत करे। केवल बाहर दीपक जलाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि अपने अंतःकरण में ज्ञान, करुणा और सदाचार का प्रकाश फैलाकर जीवन में सुख, शांति व सौहार्द स्थापित करना ही इस पर्व का मुख्य उद्देश्य है।