पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए रखें 'रोहिणी व्रत', जानें सही अवधि, विधि और उद्यापन का महत्व

रोहिणी व्रत 2024: पति की लंबी उम्र, संतान और वैवाहिक सुख के लिए रोहिणी व्रत की सही विधि, पारण समय और उद्यापन का महत्व जानें। यह व्रत जैन समुदाय में आत्म-शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण है।
 

जैन धर्म का पवित्र 'रोहिणी व्रत'

वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि और सौभाग्य का मार्ग

इस विधि से करें पूजा, खुल जाएंगे सौभाग्य के द्वार

रोहिणी व्रत का हिंदू और जैन धर्म में विशेष महत्व है। जैन समुदाय के लिए यह पर्व अत्यधिक महत्वपूर्ण है, जहाँ इसे आत्म-शुद्धि और कर्मों के निर्मूलन के उद्देश्य से रखा जाता है। यह व्रत 27 नक्षत्रों में से एक, रोहिणी नक्षत्र के दिन आता है, इसलिए इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। इस दिन विशेष रूप से जैन धर्म के बारहवें तीर्थंकर, वासुपूज्य भगवान की पूजा की जाती है। महिलाओं का मानना है कि इस व्रत का पूरी श्रद्धा और नियम से पालन करने पर उन्हें अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु का वरदान प्राप्त होता है।

व्रत की सही अवधि और उद्यापन की अनिवार्यता

वैसे तो प्रत्येक वर्ष में बारह रोहिणी व्रत होते हैं, लेकिन इसे करने की एक निश्चित समयावधि बताई गई है। भक्तगण आमतौर पर इसे तीन, पांच या सात वर्षों तक करते हैं। हालांकि, ज्योतिष के अनुसार इस व्रत की उचित और पूर्ण अवधि पांच वर्ष और पांच महीने की होती है। इस अवधि के पूरा होने के बाद उद्यापन करना अनिवार्य है। उद्यापन ही इस महाव्रत का पूर्ण समापन माना जाता है। उद्यापन के बिना व्रत अधूरा रह जाता है। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति नियमपूर्वक इसका पालन करता है, उसे सभी प्रकार के दुखों और दरिद्रता से मुक्ति मिलती है।

रोहिणी व्रत की सरल पूजा विधि

रोहिणी व्रत के दिन कुछ विशेष नियमों का पालन करना आवश्यक है। व्रत करने वाली महिलाओं को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। सर्वप्रथम सूर्य भगवान को जल चढ़ाकर पूजा का संकल्प लें। पूजा के लिए वासुपूज्य भगवान की पंचरत्न, स्वर्ण या ताम्र प्रतिमा स्थापित की जाती है। विधि-विधान से उनकी आराधना करें, जिसमें वस्त्र, धूप-दीप, फूल, फल और नैवेद्य का भोग लगाया जाता है। पूजा के दौरान व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करना चाहिए। इस दिन क्रोध, छल और आलस्य से बचना चाहिए तथा मन, वचन और कर्म से पवित्र रहना चाहिए।

दान और पारण का विधान

रोहिणी व्रत के दौरान दान का बहुत महत्व माना गया है। पूजा समाप्त होने के बाद मंदिरों में जाकर या किसी भी जरूरतमंद व्यक्ति को दान अवश्य करना चाहिए। यह व्रत उपवास रखकर किया जाता है, लेकिन यदि उपवास रखना संभव न हो, तो फलाहार लिया जा सकता है। व्रत का पारण अगले दिन रोहिणी नक्षत्र की समाप्ति के बाद मार्गशीर्ष नक्षत्र में किया जाता है। सही समय पर विधि-विधान से पारण करने से ही व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त होता है। इस व्रत को करने से संतान सुख में वृद्धि होती है और वैवाहिक जीवन सफल होता है।