दिवाली के अगले दिन जरूर करें ये पारंपरिक काम: जानें अन्नकूट, सूप पीटने और दीप विसर्जन के नियम

दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का विशेष पर्व मनाया जाता है। जानिए इस दिन कौन-कौन सी शुभ परंपराएं निभाई जाती हैं और पूजा सामग्री का सही विसर्जन कैसे किया जाता है।

 

गोवर्धन पर्वत और भगवान कृष्ण की विशेष पूजा

छप्पन भोग और अन्नकूट प्रसाद का महत्व

घर से दरिद्रता भगाने की पारंपरिक सूप पीटने की विधि

व्यापारियों के लिए नए बही-खाता पूजन का महत्व

लक्ष्मी पूजा की चौकी हटाने और सामग्री विसर्जन के नियम

दिवाली का पर्व समाप्त होते ही अगले दिन कई तरह की पारंपरिक पूजा और धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया जाता है। हिंदू धर्म में दिवाली का अगला दिन बेहद शुभ और महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन मुख्य रूप से गोवर्धन पूजा, जिसे अन्नकूट भी कहा जाता है, बहुत ही धूमधाम के साथ मनाई जाती है। इसके अलावा, घर में सुख-समृद्धि बनाए रखने और नकारात्मकता को दूर करने के लिए सुबह से ही कई खास काम और परंपराएं निभाई जाती हैं।

गोवर्धन पर्वत और भगवान कृष्ण का पूजन
दिवाली के अगले दिन सुबह या गोधूलि बेला में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है। इस आकृति के साथ भगवान कृष्ण, गाय और बछड़ों की पूजा करने का विधान है। इस अवसर पर गायों को स्नान कराकर उन्हें रोली-चंदन का तिलक लगाया जाता है और फूलों की माला पहनाई जाती है। इसके बाद गायों को हरा चारा और विशेष पकवान खिलाकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है, जिससे घर में खुशहाली बनी रहती है।

अन्नकूट का भोग और छप्पन प्रकार के पकवान
गोवर्धन पूजा के अवसर पर विशेष रूप से अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। इसमें चावल, दाल, कढ़ी और कई तरह की मौसमी सब्जियों को मिलाकर एक साथ पकाया जाता है। इसके साथ ही भगवान कृष्ण को छप्पन भोग या अन्नकूट का प्रसाद अर्पित किया जाता है। पूजा समाप्त होने के बाद इस पवित्र प्रसाद को परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिलकर ग्रहण किया जाता है, जिससे आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ता है।

घर से दरिद्रता भगाने की सूप पीटने की परंपरा
कई क्षेत्रों में दिवाली की अगली सुबह ब्रह्म मुहूर्त में एक बहुत ही पुरानी परंपरा निभाई जाती है। घर की महिलाएं सुबह उठकर पुराना सूप लेती हैं और उसे डंडे या उंगली से पीटती हैं। इस दौरान "बैठो लक्ष्मी, भाग दरिद्रता" या "अन्न-धन लक्ष्मी घर में आए, दरिद्र बाहर जाए" जैसे पारंपरिक बोल बोले जाते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से घर से नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता बाहर निकल जाती है और मां लक्ष्मी का स्थाई वास होता है।

नए बही-खातों का पूजन और व्यापारिक शुरुआत
व्यापारी वर्ग और दुकानदारों के लिए दिवाली के अगले दिन की शुरुआत बहुत खास होती है। इस शुभ दिन पर वे अपने नए बही-खातों और हिसाब-किताब की नई कॉपियों का पूजन करते हैं। मां लक्ष्मी और भगवान श्री गणेश का ध्यान करके नए वित्तीय वर्ष और कामकाज की शुरुआत की जाती है। इसके साथ ही लोग एक-दूसरे के घर जाकर दिवाली की शुभकामनाएं देते हैं, मिठाइयां बांटते हैं और रिश्तों में मिठास घोलते हैं।

लक्ष्मी पूजा की चौकी हटाना और सामग्री का विसर्जन
दिवाली के अगले दिन सुबह स्नान-ध्यान करने के बाद मां लक्ष्मी की पूजा चौकी को आदरपूर्वक हटाया जा सकता है। पूजा में इस्तेमाल किए गए अक्षत और अनाज को खुले में फेंकने के बजाय पक्षियों या जानवरों को खिला देना चाहिए। कलश के जल को घर के पौधों में डाल दें और नारियल को प्रसाद के रूप में परिवार में बांट लें। वहीं पूजा की बची हुई खील, बताशों और प्रसाद को जरूरतमंदों में बांटना बेहद शुभ होता है।

दीयों और पूजा सामग्री का सही इस्तेमाल
दिवाली की रात जलाए गए दीयों में से जो दीये साफ और साबुत बचे हों, उन्हें पानी से अच्छी तरह धोकर आगे की पूजा या त्योहारों में फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है। पूजा में इस्तेमाल हुए पुराने फूल और बची हुई अन्य सामग्री को किसी साफ-सुथरे स्थान या बहती नदी में विसर्जित करना चाहिए। कुछ दीयों को घर के मुख्य मंदिर में जलाकर रखना शुभ माना जाता है। इस प्रकार नियमों का पालन करने से घर में मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।