इसलिए बदलने वाली है विश्वकर्मा जयंती की तारीख, ज्योतिष के विद्वानों ने कर दी है घोषणा

जैसे मकर राशि में प्रवेश के समय मकर संक्रांति और मेष राशि में प्रवेश पर मेष संक्रांति मनाई जाती है, उसी प्रकार सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश करने पर कन्या संक्रांति मनाई जाती है।
 

छह वर्ष बाद 18 सितंबर को मनाई जाएगी विश्वकर्मा जयंती

अभी तक हर साल 17 सितंबर को मनाई जाती है विश्वकर्मा जयंती

कन्या संक्रांति से जुड़ा है विश्वकर्मा जयंती का पर्व

सूर्य के राशि परिवर्तन पर आधारित है तिथि निर्धारण

सृष्टि के आदिशिल्पी भगवान विश्वकर्मा की जयंती हर वर्ष परंपरानुसार 17 सितंबर को मनाई जाती है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, लेकिन ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह पर्व कन्या संक्रांति के अवसर पर मनाया जाना चाहिए, जब सूर्य सिंह राशि से कन्या राशि में प्रवेश करते हैं। दशकों से कन्या संक्रांति 17 सितंबर के आसपास पड़ती आ रही है, इसलिए यह पर्व इसी तिथि पर मनाया जाता रहा है। लेकिन ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि अब स्थिति बदलने वाली है। आने वाले छह वर्षों बाद सूर्य की राशि स्थिति में परिवर्तन होगा और यह पर्व 18 सितंबर को मनाया जाएगा।

बीएचयू के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पांडेय बताते हैं कि भगवान विश्वकर्मा की जयंती सौर मान के अनुसार मनाया जाने वाला पर्व है। जिस समय प्रजापिता ब्रह्मा के पुत्र भगवान विश्वकर्मा का प्राकट्य हुआ था, उस समय सूर्य सिंह राशि से कन्या राशि में प्रवेश कर रहे थे। इसलिए यह पर्व कन्या संक्रांति से जुड़ा हुआ है। जैसे मकर राशि में प्रवेश के समय मकर संक्रांति और मेष राशि में प्रवेश पर मेष संक्रांति मनाई जाती है, उसी प्रकार सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश करने पर कन्या संक्रांति मनाई जाती है।

उन्होंने बताया कि 1981 से कन्या संक्रांति 17 सितंबर को पड़ती आ रही है। कुछ वर्षों में यह 16 सितंबर को भी हुई, लेकिन परंपरागत रूप से इसे 17 सितंबर को ही मनाया गया। सूर्य की राशि स्थिति में तिथि परिवर्तन लगभग 72 वर्षों के बाद होता है। यह अवधि पूरी होने पर धीरे-धीरे तिथियों में बदलाव आता है। इसी कारण आगामी वर्षों में कन्या संक्रांति 18 सितंबर को पड़ेगी और विश्वकर्मा जयंती भी उसी दिन मनाई जाएगी।

इस परिवर्तन को लेकर श्रद्धालुओं और सनातन धर्मावलंबियों में उत्सुकता है। परंपरा और आस्था का यह पर्व न केवल धर्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत खास माना जाता है।