दीपावली मनाने के पीछे सिर्फ श्रीराम का आगमन ही नहीं, छिपी हैं ये 5 पौराणिक कथाएं, क्या जानते हैं आप

 

दिवाली सिर्फ भगवान राम के वनवास से लौटने का पर्व नहीं है, बल्कि इसके पीछे नरकासुर वध, मां लक्ष्मी का अवतार और पांडवों की वापसी जैसी कई पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हैं।

 
 

दीपावली क्यों मनाई जाती है

भगवान श्रीराम का अयोध्या आगमन

श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का वध

समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी

पांडवों की अज्ञातवास से वापसी

कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला दीपावली का त्यौहार सिर्फ दीपों का उत्सव नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। जब भी दिवाली की बात होती है, तो सबसे पहले भगवान श्रीराम के 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की कथा याद आती है।

हालांकि, पौराणिक ग्रंथों और इतिहास में ऐसे कई अन्य महत्वपूर्ण प्रसंग भी मिलते हैं, जिनकी वजह से यह पावन पर्व सदियों से मनाया जाता आ रहा है। आइए जानते हैं दिवाली से जुड़ी उन मुख्य कथाओं के बारे में।

भगवान श्रीराम का अयोध्या आगमन और दीपोत्सव
महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के अनुसार, जब भगवान श्रीराम लंकापति रावण का वध करके और अपनी पत्नी माता सीता को मुक्त कराकर अपने भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे, तो पूरे नगर वासियों ने उनका भव्य स्वागत किया था। उस दिन संपूर्ण अयोध्या नगरी दीयों की रोशनी से जगमगा उठी थी। अपने प्रिय राजा के लौटने की खुशी में हर घर और गांव में दीपक जलाए गए थे। तभी से हर साल कार्तिक अमावस्या को दिवाली का यह पावन पर्व मनाया जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर का अंत
दिवाली से जुड़ी एक और बेहद महत्वपूर्ण कथा भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित है। माना जाता है कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से अत्याचारी असुर नरकासुर का संहार किया था। नरकासुर को यह श्राप मिला था कि उसका अंत केवल किसी स्त्री के हाथों ही होगा। नरकासुर के आतंक और अत्याचार से मुक्ति मिलने की अपार खुशी में वहां के लोगों ने दीपोत्सव मनाया था, जिसके अगले दिन दीपावली का पर्व धूमधाम से मनाया गया।

पांडवों की अज्ञातवास से हस्तिनापुर वापसी
भगवान राम की ही तरह महाभारत काल में पांडवों को भी कौरवों के कारण अज्ञातवास और वनवास की कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा था। जब पांडव अपना अज्ञातवास पूरा करके हस्तिनापुर वापस लौटे थे, तो प्रजा ने उनका स्वागत दीप जलाकर किया था। हस्तिनापुर की पूरी नगरी को सुंदर दीपों से सजाया गया था। इस खुशी के मौके को भी दिवाली की शुरुआत और उत्सव परंपरा के रूप में देखा जाता है।

समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी का प्राकट्य
दीपावली के दिन धन की देवी लक्ष्मी जी की पूजा का विशेष विधान है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक मास की अमावस्या के दिन ही समुद्र मंथन के दौरान देवी लक्ष्मी का पृथ्वी पर अवतार हुआ था। माता लक्ष्मी को धन, वैभव और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। यही कारण है कि दिवाली की रात हर घर में दीपक प्रज्वलित करने के साथ-साथ मां लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा की जाती है।

मां काली का रौद्र रूप और भगवान शिव का स्पर्श
एक अन्य कथा के अनुसार, माता पार्वती ने दुष्ट असुरों का संहार करने के लिए महाकाली का भयानक रूप धारण किया था। असुर का वध करने के बाद भी मां काली का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। तब उनके क्रोध को नियंत्रित करने के लिए भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए। शिव जी के स्पर्श से माता पार्वती का क्रोध शांत हुआ। इसी वजह से दिवाली के दिन उनके शांत रूप देवी लक्ष्मी का पूजन होता है, वहीं तंत्र साधना के लिए इस रात मां काली की पूजा का भी विशेष विधान है।