इंसानियत की मिसाल पेश करते रहे इंस्पेक्टर अनिल पांडेय, दरोगा का शव खुद उठाने से लेकर बेटियों की शादी में मदद तक, सबको याद आएगा कार्यकाल

 

अलीनगर थाना प्रभारी अनिल पांडेय का पुलिस लाइन स्थानांतरण होने से क्षेत्र में निराशा है। अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों को बचाने और गरीबों के मसीहा के रूप में पहचान बनाने वाले इस जांबाज अफसर की कार्यशैली मिसाल बन गई है।
 

पिकअप चालक को बचाने के लिए खाई में लगाई छलांग

शहीद दरोगा के क्षत-विक्षत शव को खुद हाथों से उठाया

गरीब बेटियों की शादियों में गुप्त दान और सहयोग

बिना प्रचार के 'नेकी कर दरिया में डाल' वाली कार्यशैली

अलीनगर क्षेत्र के व्यापारियों और आमजन में मायूसी

चंदौली जनपद अंतर्गत अलीनगर थाने में तैनात इंस्पेक्टर अनिल पांडेय का तबादला पुलिस लाइन कार्यालय से संबद्ध कर दिया गया है। जैसे ही उनके स्थानांतरण की खबर सार्वजनिक हुई, पूरे क्षेत्र में मायूसी छा गई। एक सख्त पुलिस अधिकारी के साथ-साथ एक बेहद संवेदनशील इंसान के रूप में उन्होंने जनता के बीच जो जगह बनाई, वैसी मिसाल कम ही देखने को मिलती है।

मौत को मात देने का वो साहसिक प्रयास
इंस्पेक्टर अनिल पांडेय की बहादुरी का वो किस्सा आज भी लोगों की जुबां पर है, जब जुलाई के महीने में एक पिकअप वाहन अनियंत्रित होकर गहरी खाई में गिर गया था। मौके पर मौजूद भीड़ जहां वीडियो बनाने और तमाशा देखने में मशगूल थी, वहीं अनिल पांडेय ने बिना अपनी जान की परवाह किए गहरी खाई में छलांग लगा दी। उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर खलासी को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। यद्यपि चालक को नहीं बचाया जा सका, लेकिन इंस्पेक्टर की इस जांबाजी का वीडियो पूरे देश में वायरल हुआ था।

कर्तव्य के प्रति अटूट निष्ठा
हाल ही में एक दर्दनाक रेल हादसे में एक दरोगा की मौत हो गई थी, जिसमें शव क्षत-विक्षत हो गया था। उस समय जहां लोग पास जाने से कतरा रहे थे, वहां इंस्पेक्टर अनिल पांडेय ने खुद आगे बढ़कर अपने हाथों से शव के अंगों को समेटा और सम्मानजनक विदाई सुनिश्चित की। यह दृश्य उनके भीतर छिपे एक संवेदनशील सहकर्मी और सच्चे पुलिसकर्मी की पहचान कराता है।

बिना शोर-शराबे के 'नेकी' का सफर
अनिल पांडेय केवल अपराध नियंत्रण के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी दरियादिली के लिए भी जाने जाते रहे। "नेकी कर दरिया में डाल" के सिद्धांत पर चलते हुए उन्होंने दर्जनों गरीब बेटियों की शादी में आर्थिक सहयोग दिया और कई जरूरतमंदों का इलाज कराया। खास बात यह है कि उन्होंने इन कार्यों का कभी कोई प्रचार नहीं किया और न ही कभी कैमरों के सामने अपनी मदद का प्रदर्शन किया।

अलीनगर थाने में उनके कार्यकाल के दौरान न केवल अपराधियों में खौफ रहा, बल्कि आम जनता ने खुद को सुरक्षित महसूस किया। उनके ट्रांसफर से क्षेत्र के व्यापारियों और स्थानीय निवासियों में दुख जरूर है, लेकिन उनकी कर्तव्यनिष्ठा की कहानियां चंदौली के इतिहास में दर्ज हो गई हैं।