तहसील में ई-रजिस्ट्री के खिलाफ वकीलों का हल्लाबोल: वरिष्ठ अधिवक्ता संतोष कुमार पाठक बोले- 'गरीबों के पेट पर लात मार रही सरकार'
मुगलसराय तहसील में ई-रजिस्ट्री और ई-केवाईसी नियमों के विरोध में वकीलों का धरना जारी है। वरिष्ठ अधिवक्ता संतोष कुमार पाठक ने इसे सरकारी लूट बताते हुए कहा कि इससे भ्रष्टाचार बढ़ेगा और गरीबों के लिए जमीन की रजिस्ट्री नामुमकिन हो जाएगी।
ई-रजिस्ट्री और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के खिलाफ वकीलों का धरना
वरिष्ठ अधिवक्ता संतोष कुमार पाठक ने सरकार के खिलाफ खोला मोर्चा
स्टाम्प वेंडर, टाइपिस्ट और वकीलों की रोजी-रोटी पर संकट
गांव के गरीबों के पास पैन कार्ड न होने से रजिस्ट्री रुकने का डर
सब-रजिस्ट्रार के मौके पर जाकर जांच करने से बढ़ेगी रिश्वतखोरी
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जमीन की रजिस्ट्री प्रक्रिया में किए गए नए बदलावों को लेकर वकीलों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। चंदौली जिले की मुगलसराय तहसील में रजिस्ट्री के नए नियमों के विरोध में अधिवक्ताओं का जोरदार धरना प्रदर्शन लगातार जारी है। ई-केवाईसी और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण जैसी नई व्यवस्थाओं के खिलाफ वकीलों ने तहसील परिसर में इकट्ठा होकर सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और इस नियम को तुरंत वापस लेने की मांग की।
इस आंदोलन को धार देने के लिए जनपद के वरिष्ठ अधिवक्ता संतोष कुमार पाठक भी वकीलों के बीच धरने पर पहुंचे। उन्होंने कड़े शब्दों में सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह ई-रजिस्ट्री कुछ और नहीं, बल्कि सरकारी लूट की एक नई और सोची-समझी व्यवस्था है। उन्होंने साफ किया कि उत्तर प्रदेश के तमाम अधिवक्ता इस व्यवस्था का तब तक डटकर विरोध करेंगे, जब तक सरकार इसे वापस नहीं ले लेती।
रोजी-रोटी पर संकट: टाइपिस्ट, स्टाम्प वेंडर और वकीलों के पेट पर आघात
अधिवक्ता संतोष कुमार पाठक ने कहा कि अब तक जो मैनुअल रजिस्ट्री यानी कागजी बैनामे की व्यवस्था चल रही थी, उससे न जाने कितने परिवारों का घर चलता है। कलेक्ट्रेट और तहसीलों में बैठने वाले स्टाम्प विक्रेता, डीड राइटर, टाइपिस्ट और अधिवक्ताओं की आमदनी का सबसे बड़ा और मुख्य जरिया जमीन का बैनामा ही है। अगर सरकार इस पूरी व्यवस्था को ऑनलाइन या डिजिटल करके कंपनियों के हाथ में सौंप देगी, तो इन गरीब और मेहनतकश लोगों के पेट पर सीधा लात मारने का काम होगा।
उन्होंने सरकार की नीति पर एक बड़ा व्यावहारिक सवाल उठाते हुए पूछा कि नए नियमों में अब रजिस्ट्री के लिए पैन कार्ड को पूरी तरह अनिवार्य कर दिया गया है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी गांवों में रहने वाले बहुत से गरीब और किसान परिवारों के पास पैन कार्ड जैसी चीजें उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में क्या सरकार यह चाहती है कि गांव के उन गरीब लोगों की जमीनों की रजिस्ट्री अब कभी न हो पाए?
'सब-रजिस्ट्रार जाएंगे मौके पर, तो क्या बिना रिश्वत के होगा काम?'
वरिष्ठ अधिवक्ता ने नए नियम की एक और खामी को उजागर करते हुए कहा कि सरकार ने नियम बनाया है कि अब जमीन के मालिकाना हक की जांच करने के लिए सब-रजिस्ट्रार खुद मौके पर यानी जमीन पर जाएंगे, और उनके हरी झंडी देने के बाद ही रजिस्ट्री हो पाएगी। संतोष कुमार पाठक ने तीखा सवाल किया कि क्या आज के समय में बिना वकीलों की मदद के कोई साफ-सुथरा और बिना विवाद वाला बैनामा संभव है? उन्होंने आरोप लगाया कि इस नियम के आने से दफ्तरों में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार का खेल कई गुना ज्यादा बढ़ जाएगा, जिससे आम जनता को प्रताड़ित होना पड़ेगा।
धरने को संबोधित करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरी नई व्यवस्था के पीछे बड़ी-बड़ी कंपनियों और कमिशनखोरी का एक बड़ा खेल चल रहा है। पूरे प्रदेश में सक्रिय कारपोरेट कंपनियां सरकार को मोटा चंदा और कमीशन दे रही हैं, जिसके दबाव में आकर इस पूरी रजिस्ट्री प्रक्रिया को जानबूझकर इतना कठिन बनाया जा रहा है। इस मौके पर उनके साथ सैकड़ों की संख्या में अधिवक्ता और तहसील से जुड़े कर्मचारी मौजूद रहे, जिन्होंने इस काले नियम के खिलाफ आखिरी दम तक लड़ने का संकल्प लिया।