कल तक जिसे कहा 'फर्जी संघ', आज उसी को वार्ता का न्योता! धरने की दरी बिछते ही वन विभाग के बदले तेवर

 

चंदौली वन विभाग में कर्मचारियों के आंदोलन के आगे प्रशासन बैकफुट पर आ गया है। जिस संगठन को डीएफओ ने कल तक फर्जी बताया था, अब उसी के साथ 27 जून को वार्ता की मेज सजेगी। जानिए क्या है पूरा मामला।

 
 

धरने की दरी बिछते ही बदले तेवर

27 जून को होगी अहम बैठक

बाबू पर वसूली के गंभीर आरोप

वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल

कर्मचारियों के दबाव में झुका प्रशासन

 

चंदौली जिले के काशी वन्य जीव प्रभाग रामनगर में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों का आंदोलन शुरू होने से पहले ही एक ऐसा मोड़ आया है, जिसने विभाग की पूरी कार्यप्रणाली पर उंगली उठा दी है। व्हाट्सएप पर 22 जून को जारी एक सरकारी पत्र में डीएफओ बी. शंकर ने जिस कर्मचारी संघ को ‘तथाकथित’ और ‘फर्जी’ करार दिया था, उसी विवाद के ठीक अगले ही दिन विभाग को अपने कदम पीछे खींचने पड़ गए। जैसे ही दफ्तर के बाहर धरने की दरी बिछी, वैसे ही अफसर वार्ता की मेज पर आने को मजबूर हो गए।

पहले बताया फर्जी, अब बातचीत का न्योता
प्रदेशाध्यक्ष रामाशंकर यादव को भेजे पत्र में डीएफओ ने साफ़ शब्दों में लिखा था कि यह कथित संघ बिना सबूतों के मनगढ़ंत आरोप लगा रहा है। विभाग की तरफ से रामनगर थाने को भी पत्र भेजकर कानूनी कार्रवाई की तैयारी कर ली गई थी। लेकिन मंगलवार को न्यूनतम दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी संघ के बैनर तले जैसे ही सैकड़ों कर्मचारियों ने दफ्तर का घेराव कर नारेबाजी शुरू की, वैसे ही विभाग के सुर बदल गए। आनन-फानन में डीएफओ के निर्देश पर एसडीओ वरुण प्रताप सिंह मौके पर पहुंचे और 27 जून को बैठक करने का लिखित आश्वासन देकर मामला शांत कराया।

विवाद की जड़ में है बड़े बाबू पर वसूली के आरोप
इस पूरे घमासान की असली वजह अधिष्ठान शाखा में बैठे एक तथाकथित बड़े बाबू हैं। कर्मचारियों और संगठन का खुला आरोप है कि नियमित करने (विनियमितीकरण) और अन्य विभागीय कामों के बदले लंबे समय से कर्मचारियों से अवैध वसूली की जा रही है। कर्मचारियों का कहना है कि अगर ये सारे आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद थे, तो विभाग ने पहले इसकी कोई साफ और निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई? आंदोलन के दबाव में आकर अचानक बातचीत की पहल करना पूरे मामले को शक के घेरे में खड़ा कर रहा है।

“आखिर बाबू इतना ताकतवर कैसे हो गया?”
वन विभाग के गलियारों में अब सबसे बड़ा सवाल यही तैर रहा है कि आखिर एक बाबू में इतनी ताकत कहाँ से आई कि लगातार शिकायतों के बाद भी उस पर कोई आंच नहीं आई? क्या उसे किसी बड़े अधिकारी का वरदहस्त प्राप्त है? क्या शिकायतों की फाइलों को जानबूझकर दबाया गया? या फिर विभाग सच सामने आने से डर रहा है? यही वजह है कि अब यह लड़ाई सिर्फ एक बाबू की नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और सिस्टम की पारदर्शिता की बन चुकी है।

चंदौली समाचार के कुछ सीधे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद कुछ तीखे सवाल उठना लाजमी हैं:--

1-यदि संगठन सचमुच फर्जी था, तो फिर विभाग उसके साथ आधिकारिक वार्ता क्यों कर रहा है?

2- यदि आरोप झूठे थे, तो निष्पक्ष जांच कराकर सच सामने क्यों नहीं लाया गया?

3- यदि बाबू पूरी तरह निर्दोष है, तो विभाग खुलकर उसका बचाव या सफाई क्यों नहीं दे रहा?

अब हर किसी की निगाहें 27 जून को होने वाली इस महत्वपूर्ण बैठक पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि कर्मचारियों को उनके सवालों के जवाब मिलते हैं या फिर विवाद और गहराता है।