वन विभाग में भूचाल! पीसीएफ के 'काले फरमान' के खिलाफ कल से काली पट्टी बांधेंगे वन कर्मचारी
यूपी वन विभाग के पीसीएफ द्वारा जारी आउटसोर्सिंग व ठेकेदारी प्रथा के आदेश पर कर्मचारियों का गुस्सा फूट पड़ा है। संघ ने इसे 'जंगल नीलामी अध्यादेश' करार देते हुए आंदोलन और 25 अगस्त को लखनऊ घेराव का ऐलान किया है।
पीसीएफ के आदेश पर भड़का वनकर्मियों का गुस्सा
11 से 13 अगस्त तक काली पट्टी बांध प्रदर्शन
25 अगस्त को लखनऊ वन मुख्यालय घेराव की तैयारी
ठेकेदारी प्रथा से 20-25 साल पुराने कर्मचारी परेशान
प्रदेश अध्यक्ष भोरिक यादव ने खोला मोर्चा
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCF), उत्तर प्रदेश के 17 जुलाई 2026 के एक पत्र ने पूरे वन विभाग में हड़कंप मचा दिया है। इस आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि अब वन विभाग में वृक्षारोपण और अन्य सभी कार्य दैनिक मजदूरी पर कराने के बजाय आउटसोर्स और ठेकेदारी प्रथा से कराए जाएंगे। इस फैसले से पिछले 20-25 सालों से जंगलों की रखवाली कर रहे दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों का भविष्य अंधकार में लटक गया है।
संघ ने बताया 'जंगल नीलामी अध्यादेश', आर-पार की तैयारी
न्यू दैनिक वेतनभोगी वन कर्मचारी संघ ने इस आदेश को "जंगल नीलामी अध्यादेश" करार देते हुए सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। संघ के प्रदेश अध्यक्ष भोरिक यादव ने कहा कि जो कर्मचारी सालों से अपना पसीना बहाकर जंगलों की सुरक्षा कर रहे हैं, सरकार उन्हें सीधे सड़क पर लाने की साजिश रच रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि ठेकेदारी लागू होने से वन माफियाओं को खुली छूट मिल जाएगी और जंगलों का बड़े पैमाने पर नुकसान होगा।
आंदोलन की पूरी रूपरेखा तैयार
संघ ने अपने चरणबद्ध आंदोलन की पूरी रणनीति तय कर ली है। 11 अगस्त को हर जिले में वन प्रभाग और निदेशक को "काला मांग पत्र" सौंपा जाएगा। इसके बाद 11 से 13 अगस्त तक प्रदेश भर के सभी वनकर्मी काली पट्टी बांधकर काम करेंगे और इसे "काला दिवस" के रूप में मनाएंगे। वहीं, जिला मुख्यालयों पर जुलूस निकालकर जिलाधिकारी (डीएम) को भी ज्ञापन दिया जाएगा।
25 अगस्त को लखनऊ वन मुख्यालय घेरेंगे कर्मचारी
संघ ने 25 अगस्त को लखनऊ स्थित वन मुख्यालय पर एक विशाल 'महा गेट मीटिंग' बुलाने का फैसला किया है, जहां प्रदेश भर से हजारों की संख्या में कर्मचारी जुटेंगे। भोरिक यादव ने कहा कि यह लड़ाई सिर्फ हमारी रोजी-रोटी की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जंगलों को बचाने की है। उन्होंने सभी कर्मचारियों से 25 अगस्त को लखनऊ पहुंचकर इस काले फरमान को वापस कराने की अपील की है।
कर्मचारी संघ के अनुसार पीसीएफ के आदेश से होने वाले प्रमुख नुकसान निम्नलिखित हैं, जिसको सबको ध्यान में रखना है...
1. मजदूरी में दलाली: ठेकेदारी लागू होने पर ₹500 की मजदूरी में से ठेकेदार ₹200 दलाली काटेगा, जिससे कर्मचारियों के सामने भुखमरी का संकट पैदा होगा।
2. कागजी वृक्षारोपण: धरातल पर पौधरोपण नहीं होगा, सारा काम सिर्फ कागजों और फोटो तक सीमित रहकर घोटाले की भेंट चढ़ जाएगा।
3. अनुभवी कर्मचारियों की बेदखली: पिछले 25-30 सालों से काम कर रहे अनुभवी दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को एक झटके में बेरोजगार कर दिया जाएगा।
4. जंगलों की सुरक्षा पर खतरा: जंगल में आग लगने, अवैध कटान या अतिक्रमण होने पर कोई जवाबदेही तय नहीं होगी।
5. वन माफियाओं का वर्चस्व: ठेकेदार और माफिया आपस में मिलकर जंगलों के 'हरे सोने' को लूटने का काम करेंगे।
6. गुलामी की मजबूरी: 20 वर्षों से पसीना बहाने वाले कर्मचारियों को ठेकेदारों के आगे गिड़गिड़ाने और गुलामी करने पर मजबूर होना पड़ेगा।
7. असुरक्षित पर्यावरण: वन संरक्षण की विशेषज्ञता न रखने वाले बाहरी ठेकेदारों के हाथों में पर्यावरण संरक्षण का काम सौंपने से बड़ा नुकसान होगा।
8. सरकारी बजट की बर्बादी: आउटसोर्सिंग एजेंसियों और ठेकेदारों को बीच में लाने से सरकारी खजाने की लूट होगी और सीधा लाभ कर्मचारियों को नहीं मिलेगा।
9. संस्थागत उत्तरदायित्व का खात्मा: वन विभाग का अपने पारंपरिक और समर्पित कर्मचारियों से सीधा नियंत्रण खत्म हो जाएगा, जिससे वन संपदा लावारिस हो जाएगी।