सांसद-विधायक जी कभी इधर भी आइए! हिनौत घाट के गांवों में आज भी नहीं है ढंग की सड़क और अस्पताल, फेसबुक पोस्ट से छिड़ी बहस

 

चन्दौली के नौगढ़ में नक्सली हमले में शहीद हुए 15 जवानों की धरती हिनौत घाट आज भी विकास की राह देख रही है। सोशल मीडिया पर एक फेसबुक पोस्ट के जरिए स्थानीय युवाओं ने सांसद और विधायक से सड़क, अस्पताल और शहीद स्मारक बनाने की मांग की है।

 
 

20 नवंबर 2004 को हुआ था नक्सली हमला

15 पुलिस और पीएसी जवान हुए थे शहीद

फेसबुक पोस्ट से सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

सड़क, अस्पताल और बुनियादी सुविधाओं की कमी

जनप्रतिनिधियों से विकास को प्राथमिकता देने की मांग

चन्दौली जिले की तहसील नौगढ़ का हिनौत घाट इलाका एक बार फिर सुर्खियों में है। यह नाम सुनते ही आज भी 20 नवंबर 2004 की वह खौफनाक सुबह याद आ जाती है, जब नक्सलियों द्वारा किए गए एक बड़े लैंडमाइन विस्फोट और अंधाधुंध फायरिंग में पुलिस और पीएसी (PAC) के 15 जांबाज जवान शहीद हो गए थे। उन वीर जवानों ने इस पूरे बीहड़ इलाके की शांति और सुरक्षा के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था। लेकिन बेहद अफसोस की बात है कि इस ऐतिहासिक शहादत के 22 साल बीत जाने के बाद भी हिनौत घाट विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है।

इस बार यह गंभीर मुद्दा किसी राजनीतिक रैली या चुनावी मंच से नहीं, बल्कि क्षेत्र के ही एक जागरूक युवा अजय प्रताप की फेसबुक पोस्ट से उठा है। अजय ने अपनी पोस्ट का शीर्षक दिया था—"हिनौत घाट की खामोशी चीख रही है... 15 शहीदों का कर्ज कौन चुकाएगा?" देखते ही देखते यह पोस्ट सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गई और स्थानीय लोगों ने सरकार व प्रशासन के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करना शुरू कर दिया।

जनप्रतिनिधियों को क्षेत्र की याद दिलाने की कोशिश
सोशल मीडिया पर लोग इस बात को लेकर बेहद नाराज हैं कि क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद कुंवर छोटेलाल खरवार और विधायक कैलाश आचार्य इसी मिट्टी और अंचल से गहरे जुड़े हैं। इसके बावजूद शहीदों की इस पावन धरती के विकास को वह प्राथमिकता नहीं मिल सकी, जिसकी वह हकदार थी। लोगों ने तीखी प्रतिक्रियाएं देते हुए लिखा कि सांसद और विधायक जी, कभी इस शहादत की धरती पर गाड़ी से उतरकर पैदल घूम आइए, तब आपको पता चलेगा कि यहाँ के ग्रामीण आज भी किस नरक और कठिनाइयों के बीच जीने को मजबूर हैं।

अजय प्रताप ने अपनी वायरल पोस्ट में जमीनी हकीकत को बयां करते हुए दावा किया है कि आज भी इस क्षेत्र के तमाम गांवों में पक्की सड़कें और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं तक मयस्सर नहीं हैं। खासकर बरसात के दिनों में यहाँ के रास्ते इतने दुर्गम और कीचड़ से भर जाते हैं कि किसी गंभीर मरीज या गर्भवती महिला को अस्पताल तक पहुँचाना एक जंग जीतने जैसा होता है। बेहतर डॉक्टरों और इलाज के अभाव में आज भी लोगों को इलाज के लिए मीलों दूर भटकना पड़ता है।

ग्रामीणों की ये चार मांगें बनीं जनआंदोलन
इस फेसबुक पोस्ट के जरिए क्षेत्र के लोगों ने एकजुट होकर सरकार के सामने चार प्रमुख मांगें रखी हैं, जो अब एक जनभावना का रूप ले चुकी हैं:

पहली मांग: शहीद हुए 15 जांबाज जवानों की याद में हिनौत घाट पर एक भव्य शहीद स्मारक और सुंदर पार्क का निर्माण कराया जाए।

दूसरी मांग: पूरे हिनौत घाट क्षेत्र के गांवों को पक्की व गुणवत्तापूर्ण सड़कों से जोड़ा जाए और यहाँ 24 घंटे चालू रहने वाला सर्वसुविधायुक्त अस्पताल बनाया जाए।

तीसरी मांग: क्षेत्र के किसी बड़े सरकारी स्कूल, कॉलेज या अस्पताल का नामकरण इन शहीद जवानों के नाम पर किया जाए।

चौथी मांग: पिछड़ेपन को दूर करने के लिए इस पूरे नक्सल प्रभावित क्षेत्र को विशेष पैकेज देकर "आदर्श विकास क्षेत्र" घोषित किया जाए।

केवल श्रद्धांजलि से नहीं, विकास से मिले सम्मान
स्थानीय बुजुर्गों और युवाओं का कहना है कि हर साल शहीद दिवस पर नेता और अधिकारी यहाँ आकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और फूल-माला चढ़ाकर चले जाते हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि शहादत का यह सम्मान केवल भाषणों में नहीं, बल्कि धरातल पर विकास के रूप में दिखाई दे। शिक्षा और रोजगार न होने से यहाँ के युवाओं को लगातार पलायन करना पड़ रहा है।

अजय प्रताप की इस मुहिम ने सोए हुए सिस्टम को एक बार फिर झकझोर कर रख दिया है। अब देखना यह है कि क्या जनता की यह आवाज सिर्फ सोशल मीडिया की दीवारों तक सिमट कर रह जाएगी या फिर प्रशासन और जनप्रतिनिधि जागेंगे और हिनौत घाट को उसका हक दिलाएंगे। (यह खबर स्थानीय दावों और सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है, प्रशासन का पक्ष आने पर उसे भी जोड़ा जाएगा।)