EXCLUSIVE : योगी सरकार का एक आदेश... नौगढ़ के हजारों गरीबों की रोजी पर संकट!
लखनऊ से जारी एक प्रशासनिक आदेश ने नौगढ़ और चकिया के वनांचल में खलबली मचा दी है। वन विभाग में सीधी मजदूरी की दशकों पुरानी व्यवस्था खत्म कर इसे ठेकेदारों को सौंपा जा रहा है। जानिए कैसे इस फैसले से स्थानीय आदिवासियों के रोजगार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
PCCF के नए फरमान से नौगढ़ में हड़कंप
वनांचल में अब ठेकेदारों के जरिए होगा काम
बंद हुई DFO और रेंजर की सीधी भर्ती व्यवस्था
स्थानीय वनवासी और गरीबों के रोजगार पर गहराया संकट
क्या ठेका व्यवस्था में सुरक्षित रहेगा स्थानीय लोगों का हक?
लखनऊ में बैठे एक अफसर के एक हस्ताक्षर से चकिया और नौगढ़ के हजारों वनवासियों की रोजी-रोटी छीन जाएगी? 17 जुलाई 2026 को प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) कार्यालय से जारी एक नए आदेश ने पूरे वनांचल में खलबली मचा दी है। इस फरमान के बाद वन विभाग की बरसों पुरानी व्यवस्था पूरी तरह बदल गई है। अब DFO और रेंज अधिकारी सीधे गांव के गरीबों को दैनिक मजदूर के तौर पर नहीं रख सकेंगे।
अब ठेकेदारों के भरोसे रहेंगे वनांचल के काम
नए नियमों के मुताबिक, जंगलों में होने वाले सारे बड़े काम अब आउटसोर्सिंग एजेंसियों यानी ठेकेदारों के जरिए कराए जाएंगे। इनमें वृक्षारोपण, गड्ढों की खुदाई, पौधों की सुरक्षा, निराई-गुड़ाई और जंगलों की सफाई जैसे तमाम वानिकी कार्य शामिल हैं। सरकार इस बदलाव को व्यवस्था में पारदर्शिता लाने वाला बड़ा कदम बता रही है। हालांकि, नौगढ़ के पहाड़ों और जंगलों में रहने वाले गरीब मजदूर पूछ रहे हैं कि इस बदलाव की असली कीमत आखिर उन्हें क्यों चुकानी पड़ रही है?
बरसात में कटता था गरीबों का राशन
नौगढ़ के वनांचल में रहने वाले आदिवासियों और भूमिहीन परिवारों के लिए बरसात का मौसम सिर्फ बारिश लेकर नहीं आता, बल्कि यह रोजगार का सबसे बड़ा जरिया होता है। इस मौसम में जब खेतों में मजदूरी कम मिलती है, तब वन विभाग का पौधारोपण अभियान ही इनका सहारा बनता है। दो से तीन महीने की यह मजदूरी ही इन परिवारों के घर का राशन चलाती है, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाती है और आने वाले त्योहारों का आधार बनती है।
पारदर्शिता का दावा, पर अधिकार की गारंटी कहां?
सरकार का पक्ष है कि नई आउटसोर्सिंग व्यवस्था से फर्जी भुगतान पर लगाम लगेगी, पारदर्शिता आएगी और श्रमिकों को PF व ESI जैसी सुविधाएं मिलेंगी। यह बातें सुनने में भले ही अच्छी लगें, लेकिन आदेश में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि ठेका कंपनियां स्थानीय मजदूरों को काम देने के लिए बाध्य होंगी या नहीं। जब जंगल नौगढ़ का है, मिट्टी नौगढ़ की है और मेहनत भी यहीं के लोग करते हैं, तो फिर रोजगार पर पहला हक किसी बाहर के ठेकेदार या मजदूर का कैसे हो सकता है?
ठेका व्यवस्था से बढ़ा शोषण का डर
सरकारी महकमों में पहले से चल रही आउटसोर्सिंग व्यवस्था का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है। अक्सर देखा गया है कि ठेकेदार मजदूरों की दिहाड़ी में कटौती करते हैं, समय पर भुगतान नहीं करते और उनके अधिकारों की अनदेखी करते हैं। अगर ये एजेंसियां दूसरे जिलों या बाहर से अपने मजदूर ले आईं, तो नौगढ़ की पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। इससे स्थानीय लोगों का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा।
ठेकेदारों से नहीं, पसीने से हरे हुए हैं जंगल
नौगढ़ के घने और खूबसूरत जंगल किसी ठेका कंपनी की देन नहीं हैं, बल्कि यह यहां के स्थानीय मजदूरों के खून-पसीने का नतीजा हैं। ये लोग इलाके के हर रास्ते, पहाड़ी और मौसम से अच्छी तरह वाकिफ हैं। अगर इन अनुभवी हाथों को नजरअंदाज कर केवल कागजी कंपनियों पर निर्भरता बढ़ाई गई, तो इससे न सिर्फ गरीबों का चूल्हा बुझेगा, बल्कि वृक्षारोपण अभियानों की गुणवत्ता पर भी बुरा असर पड़ेगा।
सरकार और प्रशासन को देना होगा जवाब
अब यह मामला सिर्फ कागजी आदेश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह वनांचल के सामाजिक न्याय और हक का मुद्दा बन चुका है। सरकार को यह साफ करना होगा कि क्या ठेकेदारों के लिए स्थानीय लोगों को काम देना अनिवार्य होगा? अगर बाहर से आई एजेंसियां समय पर काम नहीं कर पाईं या स्थानीय गरीबों की मजदूरी मारी गई, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? नौगढ़ का हर गरीब परिवार आज इन्हीं सवालों के जवाब का इंतजार कर रहा है।