नौगढ़ अस्पताल की बदहाली: सांसद-विधायक फोटोबाजी में मस्त, बिना महिला डॉक्टर और अल्ट्रासाउंड के 'भगवान भरोसे' हो रही डिलीवरी
चंदौली के नौगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में स्वास्थ्य सेवाएं वेंटिलेटर पर हैं। न महिला डॉक्टर, न विशेषज्ञ और न ही अल्ट्रासाउंड की सुविधा। जनप्रतिनिधियों के चुनावी वादे खोखले साबित हो रहे हैं और गर्भवती महिलाएं जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं।
एएनएम और जीएनएम के भरोसे हो रहे प्रसव
सांसद कुंवर छोटेलाल खरवार और विधायक के वादे फेल
90 किमी दूर वाराणसी रेफर होने को मजबूर महिलाएं
पहाड़ी रास्तों पर एंबुलेंस में कट रही जिंदगी
चंदौली जिले के नक्सल प्रभावित और वनवासी तहसील नौगढ़ में स्वास्थ्य व्यवस्था की तस्वीर सरकारी दावों की पूरी पोल खोल रही है। चुनाव के समय स्वास्थ्य, सड़क और विकास के बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन आज नौगढ़ की तस्वीर नहीं बदली। क्षेत्रीय सांसद कुंवर छोटेलाल खरवार और विधायक कैलाश आचार्य की तस्वीरें फेसबुक पर तो खूब चमकती हैं, लेकिन उनके क्षेत्र का सबसे संवेदनशील ब्लॉक आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरस रहा है। सवाल यह है कि आखिर वनवासी इलाके की महिलाओं को सुरक्षित मातृत्व सेवाएं देना जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता में क्यों नहीं है?
एएनएम-जीएनएम के भरोसे प्रसव का 'जोखिम'
नौगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) पर हर महीने औसतन 70 से 80 प्रसव (डिलीवरी) होते हैं। यह आंकड़ा किसी भी अस्पताल की संवेदनशीलता बताने के लिए पर्याप्त है, लेकिन विडंबना देखिए कि यहाँ न तो कोई महिला चिकित्सक तैनात है और न ही कोई स्त्री रोग विशेषज्ञ। पूरा अस्पताल एएनएम और जीएनएम के भरोसे चल रहा है। जटिल प्रसव की स्थिति में इन कर्मियों के पास हाथ खड़े करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता, जिसका खामियाजा गरीब महिलाओं को भुगतना पड़ता है।
90 किलोमीटर का 'मौत का सफर'
नौगढ़ सीएचसी में सुविधाओं का इतना अभाव है कि यहाँ अल्ट्रासाउंड तक की मशीन चालू हालत में नहीं है। यदि किसी गर्भवती महिला की स्थिति थोड़ी भी गंभीर होती है, तो उसे 40 किलोमीटर दूर चकिया या फिर 90 किलोमीटर दूर वाराणसी रेफर कर दिया जाता है। पहाड़ी रास्तों और उबड़-खाबड़ रास्तों के बीच यह सफर कई बार जिंदगी और मौत के बीच की दूरी बन जाता है। प्रसव पीड़ा से तड़पती महिलाओं के लिए यह सफर किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है।
प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल
स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की कार्यशैली पर अब स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं। एक लाख से अधिक की आबादी जिस अस्पताल पर निर्भर है, वहां वर्षों से विशेषज्ञ डॉक्टरों की स्थायी तैनाती न होना व्यवस्था की बड़ी विफलता है। ओपीडी में तैनात महिला चिकित्सक की नियमित अनुपस्थिति ने आग में घी डालने का काम किया है।
डीएम साहब से जनता की पुकार
नौगढ़ की जनता अब सीधे जिलाधिकारी चंद्रमोहन गर्ग और जिले से मुख्य चिकित्साधिकारी से गुहार लगा रही है। लोगों का पूछना है कि "डीएम साहब, कभी नौगढ़ अस्पताल भी देख लीजिए।" आखिर इस अस्पताल की प्रभावी मॉनिटरिंग कब शुरू होगी? कब यहां के गरीब वनवासियों को इलाज के लिए वाराणसी की खाक नहीं छाननी पड़ेगी? यह लापरवाही न केवल प्रशासनिक अक्षमता है, बल्कि मानवता के साथ भी क्रूर मजाक है। वक्त आ गया है कि जनप्रतिनिधि फोटोबाजी छोड़ धरातल पर उतरें और माताओं की जान से हो रहे इस खेल को बंद करें।