नौगढ़ में कागजों पर दौड़ रही जी-राम योजना, 22 हजार से अधिक मजदूर बेरोजगार, रोजी-रोटी के लिए शहरों की ओर पलायन शुरू
चंदौली के नौगढ़ ब्लॉक में जी-राम योजना सरकारी दावों के विपरीत दम तोड़ती नजर आ रही है। कागजों में हजारों सक्रिय मजदूरों के दर्ज होने के बावजूद जमीन पर काम न मिलने से ग्रामीण अब पलायन करने को मजबूर हैं।
नौगढ़ ब्लॉक में 22,816 सक्रिय मजदूर काम के लिए परेशान
अप्रैल और मई का महीना बीतने के बाद भी काम ठप
बीडीओ विकास सिंह पर समय न देने का प्रधानों ने लगाया आरोप
रोजगार न मिलने से गांवों से बड़े पैमाने पर शुरू हुआ पलायन
ग्रामीणों ने जिलाधिकारी चंद्र मोहन गर्ग से की जमीनी जांच की मांग
उत्तर प्रदेश सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में हर हाथ को काम देने और स्थानीय स्तर पर आजीविका सुनिश्चित करने का दावा लगातार कर रही है। हालांकि, चंदौली जनपद के सुदूरवर्ती नौगढ़ विकास खंड में इन सरकारी दावों की जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट और चिंताजनक दिखाई दे रही है। यहां रिकॉर्ड की फाइलों में तो हजारों मजदूरों को रोजगार की पूरी गारंटी दी गई है, लेकिन धरातल पर श्रमिक पूरी तरह खाली बैठे हैं। आलम यह है कि अब गांवों में रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है, जिसके चलते बड़ी संख्या में मजदूरों का पलायन शुरू हो चुका है।
सरकारी आंकड़ों की बात करें तो नौगढ़ ब्लॉक में कुल 29,934 श्रमिक पंजीकृत हैं। इनमें से 29,178 श्रमिकों का डाटा अपडेटेड है और कुल 22,816 मजदूर सक्रिय श्रेणी में शामिल हैं। कागजी तौर पर रोजगार देने का यह ढांचा बेहद मजबूत नजर आता है, मगर धरातल पर काम की आस लगाए बैठे इन मजदूरों को सिर्फ आश्वासन और लंबा इंतजार ही मिल रहा है। अप्रैल का पूरा महीना बीत गया और अब मई भी समाप्त होने के कगार पर है, फिर भी क्षेत्र के गांवों में बड़े पैमाने पर कोई भी श्रम आधारित कार्य प्रारंभ नहीं कराया जा सका है।
दो-दो चार्ज लेकर उलझे हुए हैं बीडीओ साहब, इंतजार करते रहते हैं प्रधान
स्थानीय ग्रामीणों और ग्राम प्रधानों का सीधा आरोप है कि नौगढ़ के प्रभारी खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) विकास सिंह, जिनके पास चकिया विकास खंड का भी अतिरिक्त प्रभार है, वह ब्लॉक मुख्यालय में नियमित रूप से समय नहीं देते हैं। जिलाधिकारी चंद्र मोहन गर्ग द्वारा कार्यालय समय में अनिवार्य उपस्थिति के सख्त निर्देशों के बावजूद बीडीओ की मौजूदगी न के बराबर रहती है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि अधिकारी कभी दोपहर बाद नौगढ़ आते भी हैं, तो वे सीधे अपने सरकारी आवास में चले जाते हैं और कुछ ही देर में वापस रवाना हो जाते हैं। इस लचर व्यवस्था के कारण विभिन्न गांवों के प्रधान फाइलों और विकास प्रस्तावों को लेकर घंटों इंतजार करने के बाद बैरंग लौट जाते हैं। आजकल ब्लॉक में विकास कार्यों की चर्चा से ज्यादा इस बात की चर्चा होती है कि 'आज साहब आए या नहीं?'
नौगढ़ इलाके से शहरों की तरफ मुड़े मजदूरों के कदम
वर्तमान में तालाबों की खुदाई, चकरोड मरम्मत, मिट्टी कार्य और अन्य बुनियादी श्रमप्रधान योजनाएं केवल फाइलों में ही स्वीकृत दिख रही हैं। गांवों में स्थिति यह है कि मजदूर सुबह-सुबह इस उम्मीद के साथ चौपालों पर जुटते हैं कि आज शायद काम मिलेगा, लेकिन शाम तक उन्हें खाली हाथ और मायूस होकर घर लौटना पड़ता है। पोर्टल पर रोजगार के आंकड़े भले ही चमक रहे हों, पर ग्रामीणों के घरों में चूल्हा जलाने की चिंता बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि ग्रामीण अंचल का युवा वर्ग अब रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन करने के लिए विवश हो गया है, जिससे युवाओं में भारी आक्रोश पनप रहा है।
जिम्मेदारी तय करने की उठी मांग
नौगढ़ के निवासियों के बीच अब यह चर्चा आम हो चली है कि ब्लॉक में योजनाओं की रफ्तार से ज्यादा अधिकारियों की आवाजाही और प्रभार व्यवस्था का खेल चल रहा है। मजदूरों को उनके ही गांव में हक का काम नहीं मिल रहा है। इस गंभीर समस्या को देखते हुए प्रबुद्ध नागरिकों और ग्रामीणों ने जिलाधिकारी चंद्र मोहन गर्ग से नौगढ़ ब्लॉक की जमीनी हकीकत की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
लोगों का स्पष्ट कहना है कि रोजगार गारंटी से जुड़ी योजनाएं केवल वातानुकूलित कमरों की बैठकों, कागजी रिपोर्टों और ऑनलाइन पोर्टल के आंकड़ों से सफल नहीं हो सकतीं। जब 22 हजार से ज्यादा सक्रिय श्रमिक काम के अभाव में बेरोजगार बैठे हों, तो पूरी निगरानी प्रणाली पर सवाल उठना लाजिमी है। यदि समय रहते जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की गई, तो फाइलों में दौड़ रही यह योजना धरातल पर पूरी तरह दम तोड़ देगी।