नौगढ़ में नवरात्र के अवसर पर रामकथा और शिवधनुष आयोजन से गूंजा पंडाल
प्रयागराज की कथा वाचिका प्रतिमा तिवारी ने प्रस्तुत की रामकथा
मिथिला के प्रसंगों के साथ छंदों और भावों का अद्भुत प्रदर्शन
प्रयागराज से आईं प्रतिमा तिवारी सुना रहीं रामकथा
चंदौली जिले के तहसील नौगढ़ में दुर्गा मंदिर पोखरे पर नवरात्र के अवसर पर चल रही रामकथा के सातवें दिन प्रयागराज से आई कथा वाचिका प्रतिमा तिवारी ने रामचरितमानस के छंदों और भावों के सहारे मिथिला के प्रसंगों को इतने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया कि पूरा पंडाल “जय श्रीराम” के उद्घोष से गूंज उठा। प्रतिमा तिवारी की ओजस्वी आवाज़ और वाणी की लय ने ऐसा वातावरण बनाया कि श्रोता भावविह्वल हो उठे।
रावण भी पहुंचा था शिव धनुष तोड़ने
कथा वाचिका ने प्रसंग में बताया कि शिवधनुष को तोड़ने रावण भी आया था। रात के समय जब रावण शक्ति को आजमाने के लिए शिवधनुष उठाने गया, तभी भगवान शंकर प्रकट होकर बोले – “हे रावण, यह धनुष मेरे आराध्य श्रीराम का है। यह तुम्हारे लिए नहीं है, लौट जाओ।” यह सुनकर रावण वहीं से लौट गया।
राजाओं से न उठने वाला धनुष, राम के स्पर्श से हुआ खंडित
प्रतिमा तिवारी ने कहा कि धनुष यज्ञ में दस-दस राजा भी मिलकर धनुष नहीं उठा सके। राजा जनक व्यथित होकर बोले – “धरती वीरों से खाली हो गई है।” तभी लक्ष्मण खड़े होकर बोले – “जहां रघुवंशी बैठे हों, वहां अनुचित बात नहीं होनी चाहिए। हम पूरे ब्रह्मांड को गेंद की तरह उछाल सकते हैं।” राम ने इशारे से लक्ष्मण को शांत किया और गुरु विश्वामित्र के आदेश पर धनुष को प्रणाम कर हाथ लगाया, और वह अपने-आप टूट गया। कथा वाचिका ने कहा – “जैसे प्रभु के सत्संग में जीव का अहंकार टूटकर शरणागत हो जाता है, वैसे ही धनुष भी राम के स्पर्श से टूट गया।
लक्ष्मण का व्यंग्य, भैया ने छुआ और धनुष टूट गया
कथा वाचिका ने सुनाया कि धनुष टूटते ही परशुराम गरजते हुए पहुंचे और बोले – “किसने मेरे आराध्य का धनुष तोड़ा? किसने जानकी से नाता जोड़ा? हे जनक! यह अपराधी कौन है? राम ने सिर झुकाकर कहा – “मुनिवर, इसे तोड़ने वाला आपका सेवक ही होगा।लक्ष्मण मुस्कुराते हुए बोले “पुराना धनुष भैया ने छुआ और टूट गया, ऐसे धनुष हमने बचपन में भी तोड़े हैं। इतनी देर से खड़े हैं, पैर में दर्द हो रहा होगा, कारीगर बुलवाकर धनुष जुड़वा देते हैं। परशुराम गुस्से से बोले – “मैं परशुराम हूं, क्षत्रियों का दमन करने वाला। तुम हमारे बारे में जानते नहीं हो! इस व्यंग्य और क्रोध के बीच राम की विनम्रता ने परशुराम का क्रोध शांत कर दिया और वे जयघोष करते हुए लौट गए।
मंच पर निकली झांकी, सीता ने राम को जयमाल पहनाई
शिवधनुष टूटने के बाद राम–लक्ष्मण–सीता की जीवंत झांकी जब मंच पर आई, तो पंडाल “जय श्रीराम” के उद्घोष से गूंज उठा। सीता ने मंच पर ही राम के गले में जयमाल डाली। उसी समय सखियों ने पारंपरिक विवाह-गीत ‘गालियां’ सुनाईं। यह लोक-रीति है, जिसमें वर को हँसी-ठिठोली में छेड़ा जाता है। यह दृश्य जैसे ही आया, पंडाल खिलखिला उठा। सखियों ने झुककर वरमाला पहनाने को उकसाते हुए बोला—“पहुना के गरहिया जनि… हउह बड़ा धीर हो…”—और कोहबर में राम की चरण-पादुका कपड़े में लपेटकर जानकी से कहा—“इन्हें कुलदेवी मानकर प्रणाम करिए।” मर्यादा की चौखट से बाहर गए बिना, इस रसिक प्रसंग ने कथा की मिठास बढ़ा दी—श्रोता ताली और हँसी में डूब गए।
एक ही मंडप में राम–सीता, लक्ष्मण–उर्मिला, भरत– मांडवी, शत्रुघ्न–श्रुतकीर्ति की विवाह झांकी ने पूरे पंडाल को भक्ति-रसधारा में बहा दिया। ‘चारिउ भइ बिबाहु सुसाधा, मंगल मूरति मंगल साधा’ — छंद सुनते ही श्रोता भावविह्वल हो उठे। कथा वाचिका ने सुनाया कि अयोध्या से बारात बिना दूल्हे के चली, केवल प्रभु के भाई और गुरु साथ थे। उन्होंने कहा – “यह केवल विवाह नहीं, मर्यादा और संयम की यात्रा थी। जब तक व्रत, धर्म और अनुशासन के कारण दूल्हा स्वयं नहीं जाता, तब तक भी उसके नाम से समाज की बारात चल सकती है।” इस भावपूर्ण टिप्पणी पर पंडाल तालियों और “जय श्रीराम” के उद्घोष से गूंज उठा।
इस अवसर पर मुख्य यजमान शिव नारायण जायसवाल सपत्नीक सुनीति ने समस्त धार्मिक औपचारिकताएं निभाईं — मंडप-पूजन, आहुति, वर-वधू के लिए मंगल-आशीर्वाद और पूजन-अर्चना की रस्में सम्पन्न कर आयोजन को विधिपूर्वक सम्पन्न कराया। संचालन राजू पांडे ने किया। इस अवसर पर दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष पंकज जायसवाल, भाजपा मंडल अध्यक्ष भगवान दास अग्रहरि, कृष्णकांत केसरी, छैबरनाथ जायसवाल, नगीना केसरी, सोनू जायसवाल, राधे यादव, हिमांशु जायसवाल समेत सम्मानित नागरिक उपस्थित रहे।