झाड़-फूंक के चक्कर में उजड़ीं दो जिंदगियां: नौगढ़ अस्पताल में दवा थी, फिर भी नहीं बची गर्भवती की जान

चंदौली के नौगढ़ में सांप के डसने पर परिजन गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने के बजाय 4 घंटे तक ओझा के पास झाड़-फूंक कराते रहे। सीएचसी में एंटी स्नेक वेनम उपलब्ध होने के बावजूद अंधविश्वास और देरी के कारण मां व मासूम बच्चे की मौत हो गई।
 

नौगढ़ में झाड़-फूंक बनी काल

सीएचसी में उपलब्ध थी दवा

अंधविश्वास ने छीनी दो जिंदगियां

सर्पदंश के बाद 4 घंटे की देरी

ओझा के चक्कर में मौत

चंदौली जिले के तहसील नौगढ़ में एक बार फिर अंधविश्वास ने दो जानें ले लीं। पंचायत बाघी के कोठी घाट गांव की रहने वाली 5 माह की गर्भवती प्रीति निषाद को मंगलवार रात सांप ने काट लिया था। अस्पताल में जीवन रक्षक दवा मौजूद थी, लेकिन सही समय पर इलाज न मिलने के कारण एक मां और उसकी कोख में पल रहे मासूम की जान चली गई।

आधी रात को सांप ने काटा, ओझा के पास पहुंचे परिजन
घटना मंगलवार रात करीब 12 बजे की है। घर में सो रही प्रीति को जहरीले सांप ने डंस लिया। चीख-पुकार सुनकर परिजन इकट्ठा तो हुए, लेकिन उन्होंने तुरंत अस्पताल भागने के बजाय चकिया क्षेत्र स्थित एक ओझा का दरवाजा खटखटाया। अस्पताल ले जाने के बजाय परिजन झाड़-फूंक कराने में लग गए और करीब चार घंटे तक तंत्र-मंत्र चलता रहा।

जब तक अस्पताल पहुंचे, पूरे शरीर में फैल चुका था जहर
चार घंटे तक झाड़-फूंक चलने के बाद जब प्रीति की हालत ज्यादा बिगड़ने लगी, तब जाकर परिजनों की आंखें खुलीं। आनन-फानन में सुबह उन्हें नौगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) लाया गया। वहां डॉक्टरों ने बिना देरी किए एंटी स्नेक वेनम (ASV) का इंजेक्शन दिया और प्राथमिक इलाज शुरू किया। लेकिन तब तक सांप का जहर पूरे शरीर में फैल चुका था। गंभीर हालत को देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें तुरंत रेफर किया, पर इलाज के दौरान प्रीति और उनके बच्चे की मौत हो गई।

अस्पताल में दवा भी थी और डॉक्टर भी
इस पूरे हादसे का सबसे दुखद पहलू यह है कि नौगढ़ सीएचसी में एंटी स्नेक वेनम की कोई कमी नहीं थी। सीएचसी अधीक्षक डॉ. अवधेश सिंह महीनों से गांव-गांव जाकर लोगों से अपील कर रहे हैं कि "सांप काटते ही सीधे अस्पताल आएं, झाड़-फूंक में समय न गंवाएं।" इसके बावजूद परिजन पहले ओझा के पास गए, जिससे इलाज में काफी देर हो गई।

अंधविश्वास का डंक सांप से भी ज्यादा जहरीला
अगर परिजन रात में ही सीधे अस्पताल पहुंचते, तो आज प्रीति और उनका बच्चा जिंदा होते। यह घटना साबित करती है कि सर्पदंश से ज्यादा खतरनाक इलाज में की गई देरी होती है। अस्पताल में दवा उपलब्ध होने के बाद भी यदि लोग ओझा के पास जा रहे हैं, तो यह समाज में फैले गहरे अंधविश्वास को दर्शाता है।

सवाल जो सोचने पर मजबूर करते हैं
यह दर्दनाक हादसा सिर्फ एक परिवार का नुकसान नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है। क्या हर गांव तक यह संदेश नहीं पहुंच पा रहा कि सर्पदंश के बाद का पहला घंटा ही जिंदगी और मौत का फैसला करता है? यदि समय रहते सोच नहीं बदली, तो न जाने और कितनी जिंदगियां ऐसे ही अंधविश्वास की भेंट चढ़ती रहेंगी।