UP में प्रशासक बनते ही बंद हुआ ग्राम प्रधानों का मानदेय, कल्याण कोष से 10 लाख की मदद पर भी लगा ब्रेक

 

यूपी में प्रशासक के रूप में काम कर रहे 57,694 ग्राम प्रधानों का 5,000 रुपये का मानदेय और कल्याण कोष से मिलने वाली 10 लाख रुपये की आर्थिक मदद बंद हो गई है। प्रधान संगठन ने सरकार से सुविधाएं बहाल करने की मांग की है।

 
 

57,694 ग्राम प्रधानों का मानदेय हुआ बंद

प्रशासक बनते ही रुकीं सभी वित्तीय सुविधाएं

मृत्यु होने पर नहीं मिलेगी 10 लाख की मदद

पंचायती राज विभाग से सुविधाएं बहाली की मांग

तय समय पर चुनाव न होने से बनी स्थिति

उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव समय पर न होने के कारण निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के पद पर तैनात किया गया था। लेकिन प्रशासक की जिम्मेदारी संभालते ही प्रदेश के 57,694 ग्राम प्रधानों को मिलने वाला 5,000 रुपये का मासिक मानदेय अचानक बंद हो गया है। इसके अलावा आकस्मिक मृत्यु होने पर कल्याण कोष से उनके परिजनों को मिलने वाली 10 लाख रुपये की आर्थिक मदद भी रोक दी गई है।

पंचायती राज विभाग को लिखा पत्र
मानदेय और अन्य वित्तीय लाभ अचानक बंद होने से ग्राम प्रधानों में भारी असंतोष व्याप्त है। इस स्थिति को देखते हुए ग्राम प्रधानों ने पंचायती राज विभाग को पत्र लिखकर अपनी रोक दी गई सुविधाएं जल्द बहाल करने की मांग उठाई है। उधर, पंचायती राज विभाग के निदेशक अमित सिंह ने स्पष्ट किया है कि शासन की ओर से प्रशासकों के मानदेय और सुविधाओं के संबंध में अब तक कोई अलग से नया दिशा-निर्देश जारी नहीं हुआ है।

प्रधान संगठन ने सरकार के सामने रखी बात
पंचायती राज ग्राम प्रधान संगठन के प्रदेश अध्यक्ष ललित शर्मा का कहना है कि तय समय पर पंचायत चुनाव न हो पाने के कारण ही निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उन्होंने बताया कि 26 मई से निवर्तमान ग्राम प्रधान प्रशासक के पद पर निरंतर कार्य कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद पंचायती राज विभाग की ओर से उन्हें मिलने वाले मासिक मानदेय और कल्याण कोष की मदद पर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया गया है।

चुनाव टलने में प्रधानों का कोई दोष नहीं
संगठन के प्रदेश अध्यक्ष ने बताया कि पंचायती राज विभाग के निदेशक अमित सिंह को इस संबंध में औपचारिक पत्र भेजकर मांग की जा चुकी है कि प्रशासकों को पूर्व की भांति मानदेय और कल्याण कोष से मिलने वाली आर्थिक मदद दी जाए। उन्होंने तर्क दिया कि यदि चुनाव समय पर संपन्न नहीं हो पाए हैं, तो इसमें ग्राम प्रधानों का कोई दोष नहीं है। जब वे जनता और गांव के विकास के लिए प्रशासक के रूप में लगातार काम कर रहे हैं, तो उनकी सुविधाएं रोकना कतई उचित नहीं है।