ईरान युद्ध और गहराता आर्थिक संकट: AIPF ने पीएम मोदी की 'सात-सूत्रीय अपील' को बताया सरकार की विफलताओं का पर्दाफाश
ईरान युद्ध के बीच प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक अपील पर AIPF ने तीखा पलटवार किया है। अजय राय का कहना है कि सरकार अपनी गलत नीतियों का बोझ जनता पर डाल रही है, जिससे देश में डॉलर की किल्लत और खाद्य संकट का खतरा बढ़ गया है।
प्रधानमंत्री की सात-सूत्री आर्थिक अपील पर विवाद
डॉलर की कमी और रुपये की ऐतिहासिक गिरावट
यूएई मुक्त व्यापार समझौते से स्वर्ण आयात में उछाल
उर्वरक संकट और प्राकृतिक खेती पर श्रीलंका जैसी चेतावनी
भारत के बढ़ते विदेशी कर्ज और राजकोषीय घाटे पर चिंता
पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार और आर्थिक स्थिरता को हिलाकर रख दिया है। सवा दो महीनों तक अर्थव्यवस्था की मजबूती का दावा करने के बाद, अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक सात-सूत्री अपील की है। इस अपील पर ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम (AIPF) की ओर से अजय राय ने एक अधिकृत बयान जारी किया है, जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं और रणनीतिक विफलताओं को कटघरे में खड़ा किया है।
प्रधानमंत्री की सात-सूत्री अपील और उसके पीछे का संकेत
प्रधानमंत्री ने देशवासियों से ऊर्जा, विदेशी मुद्रा और संसाधनों को बचाने के लिए सात प्रमुख कदम उठाने का आह्वान किया है:----
ऊर्जा संरक्षण के लिए 'वर्क फ्रॉम होम' को प्राथमिकता देना।
सार्वजनिक परिवहन का उपयोग कर ईंधन की खपत कम करना।
खाना पकाने के तेल (Edible Oil) के इस्तेमाल में कटौती।
विदेशी मुद्रा बचाने हेतु साल भर सोना न खरीदना।
स्वदेशी उत्पादों का अधिकतम उपयोग।
अनावश्यक विदेश यात्राओं से बचना।
उर्वरक संकट को देखते हुए किसानों का 'प्राकृतिक खेती' की ओर जाना।
एआईपीएफ का मानना है कि ये अपील स्पष्ट संकेत देती है कि देश आने वाले दिनों में ऊर्जा, डॉलर और उर्वरकों की भारी किल्लत का सामना करने वाला है।
रणनीतिक तेल भंडार और कूटनीतिक चूक का सवाल
अजय राय ने बयान में सवाल उठाया कि जब दुनिया ऊर्जा संकट की ओर बढ़ रही थी, तब भारत सरकार ने पर्याप्त रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserves) क्यों नहीं बनाया? अमेरिका के दबाव में आकर पहले ईरान और फिर रूस से मिल रहे रियायती तेल को बंद करना भारत के लिए महंगा साबित हुआ है। इसके साथ ही विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से पैसा निकालने की तेज रफ्तार और रुपये की गिरती कीमत ने संकट को और गहरा दिया है। रुपये की यह कमजोरी ईरान युद्ध से पहले से ही जारी थी, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की आंतरिक जर्जरता को दर्शाती है।
स्वर्ण आयात और धनी वर्ग को लाभ
आर्थिक संकट के बीच सरकार ने सोने-चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाकर 15% कर दिया है। एआईपीएफ के मुताबिक, स्वर्ण आयात बढ़ने के लिए मोदी सरकार का यूएई (UAE) के साथ किया गया मुक्त व्यापार समझौता जिम्मेदार है। इस समझौते के तहत टैरिफ रेट कोटा सिस्टम ने स्वर्ण आयात को बढ़ा दिया, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ी सेंध लगी। पिछले साल सोने के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गए, जिससे यह मध्यम वर्ग की पहुँच से बाहर हो गया, जबकि अति-धनी वर्ग डॉलर बाहर भेजकर खरीदारी करता रहा।
विदेश यात्रा और 'कैपिटल फ्लाइट'
प्रधानमंत्री ने मध्यम वर्ग से विदेश यात्रा टालने को कहा है, जबकि आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि विदेश जाने वालों की संख्या घटी है। इसके बावजूद डॉलर बाहर जा रहा है, जिसका मुख्य कारण 'लिबरलाइज्ड रेमिटैंस स्कीम' के तहत अति-धनी व्यक्तियों द्वारा विदेश में चल-अचल संपत्ति में किया जा रहा भारी निवेश है। अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच ही 26.4 बिलियन डॉलर का निवेश विदेश भेजा गया, जिसका मार्ग खुद सरकार ने 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के नाम पर प्रशस्त किया।
खाद्य संकट की आशंका: क्या भारत बनेगा अगला श्रीलंका?
उर्वरक रसायनों के अभाव के बीच प्रधानमंत्री ने किसानों को 'प्राकृतिक खेती' की सलाह दी है। एआईपीएफ ने इसे बेहद खतरनाक कदम बताया है। बयान में याद दिलाया गया कि 2021 में श्रीलंका की राजपक्षे सरकार ने भी विदेशी मुद्रा संकट के दौरान अचानक रासायनिक उर्वरकों पर प्रतिबंध लगाकर प्राकृतिक खेती थोपी थी, जिससे वहां की कृषि तबाह हो गई और 2022 में भीषण जन-विद्रोह हुआ। भारत में भी अगर वैकल्पिक इंतजाम के बिना ऐसा किया गया, तो खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
बढ़ता कर्ज और ढांचागत समस्याएं
भारत सरकार का कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। पिछले वर्ष 14 लाख करोड़ के मुकाबले इस वर्ष 17.2 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेने की योजना है। अधिक ब्याज दरों पर मिल रहा यह ऋण देश के भविष्य को संकट में डाल रहा है। इसके साथ ही 'बर्नस्टीन रिसर्च' जैसी संस्थाओं ने भी आगाह किया है कि भारत में रोजगार का संकट 'अस्तित्वगत' हो गया है। जेनेरेटिव एआई के कारण आईटी क्षेत्र में नौकरियों पर खतरा है और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर इसे संभालने में सक्षम नहीं है।
समाधान की मांग
एआईपीएफ ने मांग की है कि सरकार संकट की सारी जिम्मेदारी नागरिकों पर डालने के बजाय अपनी नीतियों में सुधार करे। आरएंडडी (R&D) पर खर्च बढ़ाना, कृषि क्षेत्र में बुनियादी सुधार और विदेशी मुद्रा के पलायन को रोकना अनिवार्य है। अजय राय ने कहा कि केवल नारों से नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक विकल्पों और देश को भरोसे में लेकर ही इस संकट से उबरा जा सकता है। ईरान युद्ध ने भारत की आर्थिक दिशा को समझने और उसके विकल्प पर विचार करने की जरूरत को और स्पष्ट कर दिया है।