चंदौली के आलमपुर ग्राम पंचायत में बड़ा फर्जीवाड़ा: निरस्त GST नंबर पर लाखों का भुगतान, भ्रष्टाचार का खेल उजागर

 

चंदौली के सकलडीहा ब्लॉक की आलमपुर ग्राम पंचायत में 'जीएसटी घोटाले' का मामला सामने आया है। विभाग द्वारा 2023 में निरस्त की जा चुकी फर्म "श्री राम एंटरप्राइजेज" को वर्ष 2025 में लाखों का भुगतान कर दिया गया, जिससे विकास कार्यों में भारी भ्रष्टाचार की आशंका गहरा गई है।

 
 

निरस्त GST फर्म को किया गया सरकारी भुगतान

आलमपुर ग्राम पंचायत में वित्तीय अनियमितता का खुलासा

बिना सत्यापन के ₹3,67,390 का वाउचर पास

पंचायत सचिव और कर्मियों की मिलीभगत के आरोप

ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर दर्ज फर्जीवाड़े के दस्तावेज

चंदौली जिले के  सकलडीहा ब्लॉक की आलमपुर ग्राम पंचायत से सरकारी धन की बंदरबांट का एक गंभीर मामला प्रकाश में आया है। यहाँ के जिम्मेदार अधिकारियों ने वित्तीय नियमों को ताक पर रखकर एक ऐसी वेंडर फर्म को सरकारी खजाने से भुगतान कर दिया, जिसका जीएसटी (GST) पंजीकरण विभाग द्वारा काफी समय पहले ही निरस्त किया जा चुका था। यह मामला न केवल भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है, बल्कि सरकारी निगरानी तंत्र की विफलता को भी उजागर करता है।

श्री राम एंटरप्राइजेज और 'सुओ-मोटो' कैंसिलेशन का खेल
दस्तावेजों के अनुसार, "श्री राम एंटरप्राइजेज" (SHRI RAM ENTERPRISES) नामक फर्म, जिसका मालिकाना हक मंजू देवी के पास बताया जाता है, का GSTIN 09CGYPD5298P1Z3 है। विभागीय रिकॉर्ड बताते हैं कि इस फर्म का जीएसटी पंजीकरण 10 अगस्त 2023 को ही विभाग द्वारा "Suo-moto cancelled" (स्वयं से निरस्त) घोषित कर दिया गया था। नियमतः, पंजीकरण रद्द होने के बाद कोई भी फर्म सरकारी कार्यों के लिए बिल जारी करने या भुगतान प्राप्त करने की पात्र नहीं होती।

जुलाई 2025 में किया गया ₹3.67 लाख का फर्जीवाड़ा
हैरानी की बात यह है कि जीएसटी रद्द होने के लगभग दो साल बाद, 26 जुलाई 2025 को आलमपुर ग्राम पंचायत ने इसी निष्क्रिय फर्म के नाम पर ₹3,67,390 की भारी राशि का वाउचर (5THSFC/2025-26/P/24) जारी कर दिया। ई-ग्राम स्वराज पोर्टल के अनुसार, यह भुगतान "ग्रे वाटर मैनेजमेंट सिस्टम" और "रिंकू यादव के घर तक इंटरलॉकिंग कार्य" के नाम पर किया गया है। बिना किसी भौतिक सत्यापन और जीएसटी वैधता की जांच किए, पंचायत सचिव, कनिष्ठ अभियंता (जेई) और अन्य कर्मियों ने मिलकर इस फाइल को पीएफएमएस (PFMS) के माध्यम से पास कर दिया।

कठोर कानूनी कार्रवाई की उठ रही मांग
इस प्रकरण के सामने आने के बाद स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी रोष व्याप्त है। जानकारों का कहना है कि यह कृत्य धोखाधड़ी (IPC 420), जालसाजी (467) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत गंभीर अपराध है। आरोप है कि विकास कार्यों के नाम पर फर्जी बिल लगाकर सरकारी धन को निजी स्वार्थ के लिए निकाला गया है।

ग्रामीणों ने जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी (CDO) से मांग की है कि इस पूरे घोटाले की उच्चस्तरीय तकनीकी जांच कराई जाए। साथ ही, जिन अधिकारियों के डिजिटल सिग्नेचर (DSC) से यह भुगतान हुआ है, उन पर मुकदमा दर्ज कर रिकवरी की प्रक्रिया शुरू की जाए। अब देखना यह है कि प्रशासन इस 'डिजिटल घोटाले' के मास्टरमाइंड्स पर कब और कैसी कार्रवाई करता है।