धानापुर कांड के शहीद चिंगनू चमार का परिवार बदहाल, टूटी झोपड़ी में रहने को मजबूर, नहीं मिला एक सरकारी आवास

 

1942 के ऐतिहासिक धानापुर कांड में शहीद हुए चिंगनू चमार का परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। देश स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों में जुटा है, लेकिन शहीद के परिजन झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं।

 
 

शहीद चिंगनू चमार का परिवार बेघर

बिरना गांव में नहीं बना स्मारक

1942 धानापुर कांड में हुए शहीद

16 अगस्त को मनाया जाएगा शहीद दिवस

परिजनों को सरकारी योजनाओं का इंतजार

देश एक बार फिर स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों में जोर-शोर से जुटा हुआ है। लेकिन उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के बिरना गांव से एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने आई है, जो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देती है। 1942 के ऐतिहासिक धानापुर थाना कांड में अपनी जान कुर्बान करने वाले अमर शहीद चिंगनू चमार का परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है।

आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी शहीद के परिजनों को पक्का सरकारी आवास तक नहीं मिल सका है। वे आज भी झोपड़ी और करकट के कच्चे मकानों में गुजर-बसर करने को मजबूर हैं। गांव वालों का आरोप है कि स्थानीय नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों ने इस स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिवार को योजनाओं का लाभ दिलाने में कभी कोई रुचि नहीं दिखाई।

धानापुर थाने पर फहराया था तिरंगा, 10 दिनों तक बेबस रही अंग्रेजी हुकूमत
16 अगस्त 1942 का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। महात्मा गांधी के आह्वान पर हजारों क्रांतिकारियों ने धानापुर थाने को घेर लिया और वहां तिरंगा फहराने का प्रयास किया। अंग्रेजी पुलिस ने आंदोलनकारियों पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं। लेकिन वीरों का हौसला नहीं डगमगाया और आखिरकार उन्होंने थाने पर तिरंगा फहरा ही दिया।

इस भीषण गोलीबारी में आठ जांबाज स्वतंत्रता सेनानी मौके पर ही शहीद हो गए थे। शहीद हीरा सिंह, रघुनाथ सिंह, महंगू सिंह और चिंगनू चमार जैसे वीरों के बलिदान के चलते ही 16 से 26 अगस्त तक, यानी पूरे 10 दिनों तक धानापुर थाने पर आजाद भारत का तिरंगा फहराता रहा। इन्हीं शहीदों की याद में हर साल 16 अगस्त को धानापुर में 'शहीद दिवस' मनाया जाता है।

शहीदों की सूची में दूसरा नाम, फिर भी गांव में न द्वार बना न स्मारक
सरकारी अभिलेखों और शहीदों की आधिकारिक सूची में चिंगनू चमार का नाम दूसरे स्थान पर दर्ज है। धानापुर कस्बे में बने शहीद स्मारक में कई वीरों की प्रतिमाएं लगी हुई हैं और अन्य शहीदों के पैतृक गांवों में स्मृति द्वार बनाए गए हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि शहीद चिंगनू चमार के गांव बिरना में अब तक न तो कोई स्मृति द्वार बना है और न ही उनकी याद में कोई स्मारक स्थापित किया गया है।

शहीद चिंगनू चमार के पौत्र रामनरेश उर्फ पंडित जी ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि उनके दादा का नाम शहीदों की सूची में ऊपर होने के बावजूद परिवार को कोई सरकारी सहायता नहीं मिली। उन्होंने बताया कि 15 अगस्त 2023 को गांव में प्रधानमंत्री के नाम का एक बोर्ड जरूर लगा दिया गया था, लेकिन परिवार की माली हालत सुधारने के लिए किसी ने कोई ठोस मदद नहीं की।

ग्रामीणों ने उठाई आवाज: केवल बोर्ड लगाने से नहीं मिलेगा शहीदों को सम्मान
बिरना गांव के निवासी नंदलाल, रामप्रताप, प्रकाश, महेंद्र, शिवमूरत, होरिल, अभिमन्यु, संतोष और बबलू समेत कई ग्रामीणों ने अब एकजुट होकर प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जताई है। ग्रामीणों ने मांग की है कि गांव में शहीद चिंगनू चमार के नाम पर एक भव्य स्मृति द्वार और स्मारक तुरंत बनाया जाए।

इसके साथ ही ग्रामीणों ने सरकार से शहीद के परिवार को तुरंत पक्का आवास देने और अन्य सभी जनकल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने की मांग की है। गांव वालों का साफ कहना है कि स्वतंत्रता सेनानियों को असली सम्मान सिर्फ भाषणों या बोर्ड लगाने से नहीं मिलेगा, बल्कि उनके परिवारों की सुध लेकर उन्हें सम्मानजनक जीवन देना सरकार की जिम्मेदारी है।