वीरासराय गांव में बंदरों का खूनी आतंक: हफ्ते भर में 24 से ज्यादा ग्रामीण जख्मी, दहशत में लोग
चंदौली के धानापुर स्थित वीरासराय गांव में बंदरों के आतंक से जनजीवन अस्त-व्यस्त है। दर्जनों ग्रामीणों को घायल करने के बाद अब वन विभाग और ग्राम प्रशासन के बीच जिम्मेदारी को लेकर खींचतान जारी है, जिससे ग्रामीण भयभीत हैं।
वीरासराय गांव में बंदरों का हमला
एक सप्ताह में दर्जनों लोग घायल
घरों की छतों पर बंदरों का डेरा
वन विभाग और प्रशासन की बेरुखी
बच्चों और महिलाओं में भारी दहशत
चंदौली जनपद के धानापुर विकासखंड अंतर्गत वीरासराय गांव में पिछले एक सप्ताह से बंदरों ने आतंक मचा रखा है। करीब दो दर्जन बंदरों के झुंड ने गांव की गलियों और छतों पर अपना डेरा जमा लिया है, जिससे ग्रामीणों का अपने ही घरों से बाहर निकलना दूभर हो गया है। स्थिति इतनी विकट है कि अब तक दो दर्जन के करीब लोग बंदरों के हमले में गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं।
हमले में घायल हुए एक दर्जन नामजद ग्रामीण
ग्रामीणों के अनुसार, बंदर अचानक हमला कर रहे हैं, जिससे बचने का मौका तक नहीं मिल पा रहा है। अब तक हुए हमलों में रामनारायण सिंह (69 वर्ष), अमरनाथ (45), सविता (40), जीतू (20), देखवंती (50), ममता (40), कंचन (35), राधिका (30), किशोर (32) और आलोक (35) सहित कई अन्य लोग बुरी तरह जख्मी हो चुके हैं। बंदरों के इस हिंसक व्यवहार के कारण खासकर बच्चों और बुजुर्गों में भारी भय का माहौल व्याप्त है।
प्रशासनिक लापरवाही और जिम्मेदारी का खेल
ग्रामीणों ने इस समस्या को लेकर जिला प्रशासन और वन विभाग से गुहार लगाई है, लेकिन विभागों के बीच जिम्मेदारी को लेकर विरोधाभास सामने आ रहा है। धानापुर के वन दरोगा फिरोज गांधी का कहना है कि सरकार के नियमों के मुताबिक बंदरों को पकड़वाने की प्राथमिक जिम्मेदारी ग्राम प्रधानों की है, इसलिए यह मामला उनके सीधे क्षेत्राधिकार में नहीं आता।
दूसरी ओर, बरहनी के वन दरोगा मनोज श्रीवास्तव ने बताया कि उनके ब्लॉक क्षेत्र में बंदरों को काबू करने के लिए महुजी और दूधारी गांव में दो पिंजरे लगाए गए हैं। हालांकि, वीरासराय के ग्रामीणों को अब तक इस समस्या से कोई राहत नहीं मिली है।
ग्रामीणों ने दी आंदोलन की चेतावनी
वीरासराय के लोगों का कहना है कि वे दहशत के साये में जीने को मजबूर हैं। घरों की छतों पर जाने और गलियों में अकेले निकलने में खतरा बना हुआ है। ग्रामीणों ने मांग की है कि वन विभाग और ग्राम प्रधान आपसी समन्वय बनाकर तत्काल पिंजरे लगवाएं और बंदरों को पकड़कर जंगल में छोड़ें। यदि जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो ग्रामीण ब्लॉक मुख्यालय पर प्रदर्शन करने के लिए बाध्य होंगे।