चंदौली में जमीनी जंग: हाईवे के लिए हजारों एकड़ जमीन मंजूर, पर अमड़ा पावर हाउस के लिए दो बीघे का रोना क्यों?
चंदौली के अमड़ा स्वतंत्र फीडर को लेकर किसानों का गुस्सा फूट पड़ा है। पूर्व सांसद रामकिशुन यादव ने सरकार को घेरते हुए कहा कि सड़कों के लिए तुरंत जमीन मिल जाती है, लेकिन 220 KV बिजली स्टेशन के लिए प्रशासन 10 साल से सिर्फ टालमटोल कर रहा है।
अमड़ा स्वतंत्र फीडर पर बढ़ा विवाद
गाजीपुर और दिलदारनगर से बिजली संकट
पूर्व सांसद रामकिशुन यादव का हमला
किसानों की उपजाऊ जमीन पर कब्जा
आर-पार के आंदोलन की बड़ी चेतावनी
चंदौली जिले में बिजली की किल्लत और बदहाल आपूर्ति को लेकर किसानों का गुस्सा अब सातवें आसमान पर पहुंच गया है। पिछले कई सालों से इलाके के किसान अमड़ा स्वतंत्र फीडर (220 KV बिजली स्टेशन) के निर्माण को लेकर लगातार आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन शासन और प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है। यह पूरा मामला अब केवल बिजली की समस्या तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह स्थानीय राजनीति और जनता के अधिकारों की एक बड़ी लड़ाई बन चुका है।
इस गंभीर समस्या को लेकर 'चंदौली समाचार' ने समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और चंदौली के पूर्व सांसद रामकिशुन यादव से खास बातचीत की। इस दौरान पूर्व सांसद का दर्द और गुस्सा साफ दिखाई दिया। उन्होंने सूबे की भाजपा सरकार और जिले के प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली पर बेहद तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने सीधे तौर पर सरकार की नीयत पर उंगली उठाई और पूछा कि आखिर चंदौली के अन्नदाताओं के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है?
हाईवे के लिए जमीन हाजिर, बिजलीघर के लिए बहानेबाजी
पूर्व सांसद रामकिशुन यादव ने सरकार के रवैये पर तंज कसते हुए कहा, "वाह रे भाजपा सरकार के नेता और अधिकारी! आपकी दोहरी सोच को सलाम है।" उन्होंने कहा कि जब सरकार को बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों, ठेकेदारों और रसूखदार नेताओं को खुश करना होता है, तो सड़कों, एक्सप्रेस-वे और चमचमाते कॉरिडोर के लिए हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन चुटकियों में मिल जाती है। लेकिन जब नरवन क्षेत्र और चंदौली के हजारों गरीब किसानों के फायदे के लिए महज एक-दो बीघे जमीन लेकर बिजली का पावर हाउस बनाने की बात आती है, तो पूरा सरकारी अमला अचानक पंगु हो जाता है।
अधिकारी और नेता जनता के सामने यह अजीबोगरीब रोना रोने लगते हैं कि पूरे जिले में पावर हाउस के लिए जमीन ही उपलब्ध नहीं है। रामकिशुन यादव ने सीधे तौर पर सवाल दागा कि पिछले 10 सालों से सूबे और केंद्र में भाजपा की सरकार है, फिर भी आज तक नरवन की भलाई और किसानों के उद्धार के लिए अमड़ा में स्वतंत्र फीडर क्यों नहीं बनवाया जा सका? क्या 10 साल का लंबा समय एक छोटे से बिजलीघर के लिए जमीन तलाशने के लिए काफी नहीं था?
दूरदराज से आती है बिजली, बार-बार टूटते हैं तार
इलाके में बिजली संकट की कड़वी हकीकत बयां करते हुए स्थानीय लोगों और किसानों ने बताया कि वर्तमान में अमड़ा और उसके आसपास के दर्जनों गांवों में बिजली की सप्लाई बहुत दूर से की जाती है। यहाँ बिजली गाजीपुर जिले के जमानिया और दिलदारनगर जैसे सुदूर इलाकों से खींचकर लाई जाती है। इतनी लंबी दूरी से बिजली आने के कारण तकनीकी दिक्कतें रोज का हिस्सा बन चुकी हैं। आए दिन हाई वोल्टेज और जर्जर तारों के टूटने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। कभी ट्रांसफार्मर फुंक जाता है तो कभी खंभे गिर जाते हैं। इस वजह से हफ्तों तक आपूर्ति पूरी तरह ठप रहती है। भीषण गर्मी और फसलों की सिंचाई के समय जब किसानों को सबसे ज्यादा बिजली की जरूरत होती है, तब उन्हें बूंद-बूंद पानी और रोशनी के लिए तरसना पड़ता है। दूर से आने वाली इस बिजली की वजह से वोल्टेज इतना कम होता है कि किसानों के नलकूप और ट्यूबवेल तक नहीं चल पाते।
खाली पड़ी जमीनों को कूड़ाघर बना रखा है प्रशासन ने
पूर्व सांसद ने प्रशासन के उस तर्क की धज्जियां उड़ा दीं जिसमें कहा जाता है कि जमीन उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि जिले में सरकार के पास अस्पताल, पुराने डाक बंगले और सिंचाई विभाग की कई एकड़ जमीनें खाली पड़ी हुई हैं। इनमें से कई संपत्तियां तो ऐसी हैं जो देखरेख के अभाव में अब असामाजिक तत्वों का अड्डा बन चुकी हैं या फिर वहां कूड़ाघर बना दिया गया है। स्थानीय स्तर पर किसानों ने कई बार सुझाव भी दिया कि इन बेकार पड़ी सरकारी जमीनों का सदुपयोग करके वहाँ 220 KV का बिजली स्टेशन आसानी से बनाया जा सकता है। लेकिन अधिकारियों की मंशा सिर्फ फाइलों को एक टेबल से दूसरे टेबल पर दौड़ाने की है। वे जनहित के इस बेहद जरूरी काम को लेकर रत्ती भर भी गंभीर नहीं दिखाई दे रहे हैं।
कॉरिडोर और ग्रीन फील्ड सड़कों के नाम पर जमीन का खेल
रामकिशुन यादव ने सिलसिलेवार ढंग से गिनाते हुए कहा कि चंदौली जिले में हाईवे, बड़े-बड़े कॉरिडोर, रिंग रोड, भारतमाला प्रोजेक्ट, एक्सप्रेस-वे और अब गाजीपुर-महाराजगंज से जिगना होते हुए धरोली तक जाने वाली नई ग्रीन फील्ड सड़क का निर्माण धड़ल्ले से चल रहा है। इन सभी लग्जरी प्रोजेक्ट्स के लिए जब भी सरकार की इच्छा होती है, रातों-रात नोटिफिकेशन जारी होता है और जमीन हाजिर हो जाती है। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि असल में सरकार अमड़ा पावर हाउस को बनवाना ही नहीं चाहती। प्रशासनिक अधिकारी सिर्फ उन कामों को रॉकेट की रफ्तार से निपटा रहे हैं जिससे बड़े-बड़े ठेकेदारों की जेबें भरें और उनके आका खुश रहें। किसानों की बुनियादी सहूलियतें देने वाले जितने भी प्रोजेक्ट्स हैं, उन्हें जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है ताकि जनता परेशान होती रहे।
'धान का कटोरा' आज छिनने की कगार पर
सपा नेता ने कहा कि चंदौली को पूरे उत्तर प्रदेश में 'धान का कटोरा' कहा जाता है। यहाँ की मिट्टी बेहद उपजाऊ है और यहाँ का किसान हाड़-तोड़ मेहनत करके पूरे प्रदेश का पेट भरता है। लेकिन आज इसी अन्नदाता की सबसे कीमती और पुश्तैनी उपजाऊ जमीन को विकास की वेदी पर जबरन चढ़ाया जा रहा है। लगातार हो रहे अंधाधुंध भूमि अधिग्रहण के कारण जिले में खेती योग्य कुल क्षेत्रफल तेजी से घटता जा रहा है। इसका सीधा और बुरा असर आने वाले समय में कृषि उत्पादन और अनाज की पैदावार पर पड़ेगा। यहाँ के अधिकांश गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार पूरी तरह से धान और गेहूं की पारंपरिक खेती पर ही आश्रित हैं। उनके पास रोजी-रोटी का न तो कोई दूसरा पक्का साधन है और न ही कोई बड़ा व्यापार। जब सरकार विकास के बड़े-बड़े दावों के साथ उनकी पुश्तैनी जमीनें छीन लेती है, तो इन परिवारों के सामने दाने-दाने का और अस्तित्व का एक बड़ा संकट खड़ा हो जाता है।
'स्किल इंडिया' के नारे निकले पूरी तरह खोखले
रोजगार के मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लेते हुए रामकिशुन यादव ने कहा कि दिल्ली और लखनऊ से गूंजने वाले 'स्किल इंडिया' और 'साइनिंग इंडिया' जैसे चमकीले नारे चंदौली की जमीन पर आकर पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं। ये नारे सिर्फ कागजों, सरकारी फाइलों और टीवी विज्ञापनों तक ही सीमित हैं। जिन किसानों की हजारों एकड़ जमीनें इन पक्की सड़कों के नीचे दबा दी गईं, उनके बच्चों के लिए सरकार ने रोजगार का कोई इंतजाम नहीं किया। पूरे चंदौली जिले में पिछले कई वर्षों में एक भी नई बड़ी औद्योगिक इकाई या फैक्ट्री नहीं लगाई गई है, जहाँ जमीन खो चुके किसानों के पढ़े-लिखे बेरोजगार बच्चे काम कर सकें। जमीन भी चली गई और नौकरी भी नहीं मिली, ऐसे में यहाँ का युवा पूरी तरह हताश हो चुका है।
डरा-धमका कर जमीन लेने का संगीन आरोप
बातचीत के दौरान यह गंभीर आरोप भी सामने आया कि प्रशासन की तरफ से जमीन लेने की जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है, वह बिल्कुल भी पारदर्शी या सहमति पर आधारित नहीं है। पूर्व सांसद ने कहा कि सीधे-साधे किसानों को स्थानीय अधिकारियों के जरिए डराया-धमकाया जाता है। विज्ञापनों और एकतरफा विज्ञप्तियों के माध्यम से जबरन कार्रवाई करके उनकी जमीनों पर कब्जा कर लिया जाता है। किसान अपनी बात रखने के लिए महीनों से धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं, आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन तानाशाही रवैये के चलते सरकार पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है। आज चंदौली का किसान अपने ही देश में, अपनी ही जमीन पर खुद को बेहद असहाय और ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
अस्तित्व बचाने के लिए आर-पार के मूड में अन्नदाता
पूर्व सांसद रामकिशुन यादव ने सरकार को बहुत ही कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि चंदौली को केवल बाहरी लोगों के लिए 'चरागाह' समझ लिया गया है, जहाँ से जो चाहे आए और किसानों का हक लूटकर चला जाए। एक तरफ सरकार मंचों से किसानों की आय दोगुनी करने का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन जमीनी हकीकत में वह उनकी आय का इकलौता स्रोत यानी उनकी पुश्तैनी जमीन ही छीन रही है। अब पानी सिर से ऊपर निकल चुका है। इसी हताशा और गुस्से के कारण चंदौली का किसान अब चुप बैठने वाला नहीं है। अपनी पुश्तैनी जमीन और बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए यहाँ का अन्नदाता अब जेल जाने, लाठियां खाने और सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ आर-पार का ऐतिहासिक संघर्ष करने के लिए पूरी तरह से कमर कस चुका है।