चंदौली में अमृत सरोवरों पर 30.45 करोड़ स्वाहा: घाट टूटे, तालाबों में उगी जलकुंभी, कागजों में सिमटा जल संरक्षण प्लान

 

चंदौली में जल संरक्षण के लिए 30.45 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से बने अमृत सरोवर आज खुद बदहाली के आंसू रो रहे हैं। मानकों की अनदेखी के चलते अधिकांश तालाब सूखे पड़े हैं और ग्रामीण पानी के संकट से जूझ रहे हैं।

 
 

अमृत सरोवरों पर 30.45 करोड़ रुपये खर्च

जिले के अधिकांश तालाब जीर्ण-शीर्ण अवस्था में

एक सरोवर की खुदाई पर 10.50 लाख रुपये खर्च

259 तालाबों को अमृत सरोवर बनाने का दावा

गहराई कम होने से गर्मी में सूखे सरोवर

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले से सरकारी बजट के दुरुपयोग और बदइंतजामी की एक बेहद निराशाजनक तस्वीर सामने आई है। ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट से राहत देने और भूजल स्तर को सुधारने के लिए शुरू की गई महत्वाकांक्षी 'अमृत सरोवर योजना' जिले में पूरी तरह हांफती नजर आ रही है। करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने के बाद भी अधिकांश अमृत सरोवर आज जीर्ण-शीर्ण और दयनीय अवस्था में पड़े हैं।

30.45 करोड़ रुपये का बजट हुआ स्वाहा
जिला प्रशासन के दावों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2024-25 तक जिले के कुल 259 तालाबों को आधुनिक और सुंदर अमृत सरोवर के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया था। इस भारी-भरकम काम के लिए सरकारी खजाने से लगभग 30.45 करोड़ रुपये की मोटी रकम भी खर्च की जा चुकी है। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि ये सरोवर आज जल संरक्षण के अपने मूल उद्देश्य से पूरी तरह भटक चुके हैं।

10.50 लाख में केवल गड्ढा खोदा गया
सरकारी मानकों के अनुसार, एक अमृत सरोवर की केवल खुदाई और घाट निर्माण के काम पर ही करीब 10.50 लाख रुपये का बजट अलॉट किया गया था। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि इस भारी बजट के बाद भी काम में जमकर लापरवाही बरती गई। मुड़हुआ दक्षिणी, पंडी और लाठियां कला गाँव के अमृत सरोवर इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं, जहाँ लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी केवल साधारण गड्ढे खोदकर छोड़ दिए गए।

गहराई में खामी, पशुओं के लिए पानी नहीं
तालाबों के समतलीकरण और उनकी गहराई को लेकर तय किए गए मानकों को पूरी तरह हवा में उड़ा दिया गया। सरोवरों की गहराई बहुत कम रखी गई, जिसके कारण मानसून के दौरान इकट्ठा हुआ वर्षा का पानी कुछ ही महीनों में सूख जाता है। नतीजतन, भीषण गर्मी के मौसम में ये तालाब पूरी तरह रेगिस्तान बन जाते हैं। मुड़हुआ गाँव के विपिन मिश्रा और दीनानाथ मौर्य ने बताया कि सही निर्माण न होने से गाँव के लोगों और बेजुबान पशुओं को पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसना पड़ रहा है।

घाट टूटे और जलकुंभी का साम्राज्य
जिले के जिन तालाबों में थोड़ा-बहुत पानी बचा भी है, वहां रखरखाव के अभाव में पूरी तरह झाड़-झंखाड़ और जलकुंभी ने कब्जा कर लिया है। करोड़ों रुपये खर्च करके बनाए गए सरोवरों के पक्के घाट और घूमने के लिए तैयार किए गए पाथवे अभी से ही टूट-फूटकर बिखरने लगे हैं। पंडी गाँव के अमृत सरोवर की हालत तो यह हो गई है कि पानी न होने के कारण ग्रामीण अब सूखे तालाब के अंदर अपने पशुओं को खूंटे से बांध रहे हैं।

रोजगार और मछली पालन के दावे निकले झूठे
सरकार की इस बहुउद्देशीय योजना का एक मुख्य मकसद स्थानीय स्तर पर ग्रामीणों को रोजगार देना, तालाबों के किनारे हरित पट्टी विकसित कर सौंदर्यीकरण करना और मछली पालन जैसी आय बढ़ाने वाली गतिविधियों को शुरू करना था। गाँव के नंदकिशोर और मुकेश कुमार का कहना है कि जमीनी स्तर पर इनमें से एक भी काम शुरू नहीं हो सका। प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही के कारण ग्रामीणों को रोजगार के सुनहरे अवसर से भी हाथ धोना पड़ा है।

सीडीओ ने दिए जांच और सुधार के आदेश
इस पूरे मामले पर मचे हंगामे और शिकायतों के बाद मुख्य विकास अधिकारी आर जगत साई ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि जिन भी अमृत सरोवरों के निर्माण कार्य में खामियां या तकनीकी कमियां पाई गई हैं, उन सभी की गहन जांच कराई जाएगी। इसके साथ ही संबंधित कार्यदायी संस्थाओं और विभागों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे मानकों के अनुरूप तत्काल सुधारात्मक कार्य शुरू कराएं, ताकि इस योजना का वास्तविक लाभ ग्रामीण जनता तक समय से पहुँचाया जा सके।