एलिवेटेड रोड के इंतजार में उजड़ गया मुगलसराय का पुराना बाजार, बड़े-बड़े वादों के भंवर में फंसा है चंदौली

 

चंदौली के मुगलसराय में एलिवेटेड रोड की अधूरी प्लानिंग से व्यापार पूरी तरह ठप हो गया है। वहीं, सड़कों के प्रोजेक्ट के तहत बिना उचित मुआवजे के जमीन अधिग्रहण के खिलाफ अब किसानों ने जेल भरो आंदोलन और आर-पार के संघर्ष का मन बना लिया है।

 
 

उजड़ गया मुगलसराय का मुख्य बाजार

एलिवेटेड रोड की अधूरी प्लानिंग से तबाही

बिना स्पष्ट मुआवजे के जमीन अधिग्रहण

ट्रामा सेंटर और मछली मंडी के वादे खोखले

अब सड़क पर उतरकर लड़ेंगे किसान

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में इन दिनों विकास की बयार बहने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। टीवी से लेकर अखबारों तक और सोशल मीडिया से लेकर चौराहों के होर्डिंग्स तक 'साइनिंग इंडिया' के नारे गूंज रहे हैं। लेकिन जब आप इन चमकीले विज्ञापनों के पीछे छिपी जमीनी हकीकत को टटोलेंगे, तो आपको चंदौली की एक अलग और बेहद कड़वी तस्वीर दिखाई देगी।

आज यहाँ का व्यापारी अपनी उजड़ती दुकान को देखकर खून के आंसू रो रहा है, तो देश का पेट भरने वाला अन्नदाता अपनी उपजाऊ पुश्तैनी जमीन छिन जाने के डर में रात-रात भर सो नहीं पा रहा है। वादे तो इस जिले को कैलिफोर्निया बनाने के किए गए थे, लेकिन आज हकीकत यह है कि चंदौली की पुरानी औद्योगिक और व्यापारिक पहचान पूरी तरह धूल फांक रही है।

एलिवेटेड फ्लाई ओवर के इंतजार में तबाह हुआ मुगलसराय का व्यापार

चंदौली जिले की व्यापारिक रीढ़ कहे जाने वाले मुगलसराय (पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर) की हालत आज किसी से छिपी नहीं है। कभी इस शहर के बाजारों की रौनक देखने लायक होती थी, लेकिन आज यहाँ सन्नाटा पसरा है। सरकार की तरफ से बड़े ही शोर-शराबे के साथ घोषणा की गई थी कि शहर के बीचों-बीच, यानी रेलवे स्टेशन से लेकर चकिया तिराहे तक एक शानदार एलिवेटेड फ्लाई ओवर ब्रिज बनाया जाएगा।

इस घोषणा के बाद विकास की मशीनें तो आईं, लेकिन उनके साथ आई अधूरी प्लानिंग और अंतहीन तोड़-फोड़। सालों बीत जाने के बाद भी यह एलिवेटेड रोड आज तक बनकर तैयार नहीं हो सकी। इस लेटलतीफी और अव्यवस्था ने मुगलसराय के पूरे स्थानीय व्यापार को पूरी तरह चौपट कर के रख दिया है।

ग्राहकों ने फेरा मुंह, दो हिस्सों में बंट गया पूरा बाजार

सड़क निर्माण के नाम पर बिना किसी ठोस प्लानिंग के जो तोड़-फोड़ की गई, उसने मुगलसराय के हंसते-खेलते बाजार को दो अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया है। सड़कों पर उड़ती धूल, गड्ढे और ट्रैफिक जाम के कारण अब बाहर से आने वाले खरीदारों ने इस बाजार से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है। जो छोटे और बड़े व्यापारी अपनी थोक और फुटकर खरीदारी के लिए मुगलसराय आते थे, वे अब बनारस या चंदौली के दूसरे बाजारों का रुख करने लगे हैं।

आवाजाही इतनी मुश्किल हो चुकी है कि स्थानीय लोग भी अब इन दुकानों तक पहुंचने से कतराते हैं। आलम यह है कि जो दुकानदार कभी लाखों का व्यापार करते थे, आज उनके सामने अपनी दुकान का किराया निकालने और परिवार की रोजी-रोटी चलाने का एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया है। स्थानीय व्यापारियों का साफ कहना है कि अगर यह काम सही समय पर और सही प्लानिंग के साथ किया गया होता, तो आज व्यापारियों को भुखमरी के कगार पर नहीं पहुंचना पड़ता।

ट्रामा सेंटर से लेकर मछली मंडी तक, कागजों में सिमटे सारे प्रोजेक्ट

सरकार ने चंदौली की भोली-भाली जनता को बहलाने के लिए कई बड़े-बड़े 'तोहफे' देने के वादे किए थे, लेकिन धरातल पर आते-आते ये सारे तोहफे खोखले साबित हुए। उदाहरण के तौर पर यहाँ के ट्रामा सेंटर को ही देख लीजिए। ट्रामा सेंटर के नाम पर करोड़ो रुपये खर्च करके केवल बिल्डिंग की रंगाई-पुताई चमका दी गई है, लेकिन जब अंदर जाकर देखें तो जरूरी जीवनरक्षक सुविधाएं और डॉक्टरों का पूरी तरह अकाल है। गंभीर मरीजों को आज भी बनारस रेफर कर दिया जाता है।

यही हाल माधोपुर में शुरू हुए 'इंडो-इजराइल प्रोजेक्ट' का भी हुआ। दावा था कि इस प्रोजेक्ट के जरिए स्थानीय किसानों को आधुनिक तकनीक से खेती करना सिखाया जाएगा और उन्नत किस्म की नर्सरी दी जाएगी, लेकिन आज यह प्रोजेक्ट जमीनी स्तर पर कहीं ढूंढने से भी नहीं मिलता। इसके अलावा, बड़े तामझाम के साथ घोषित हुई हाईटेक मछली मंडी का भी आज तक कोई अता-पता नहीं है, जिससे इस कारोबार से जुड़े व्यापारी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

मेडिकल कॉलेज पर भी स्थानीय लोगों का हक नहीं

मौजूदा सरकार जिस बाबा कीनाराम मेडिकल कॉलेज को अपनी सबसे बड़ी पीठ थपथपाने वाली उपलब्धि बताती है, उसकी इनसाइड स्टोरी भी कुछ और ही है। जानकार बताते हैं कि इस मेडिकल कॉलेज की असल स्वीकृति और कागजी प्रक्रिया पिछली सरकार के कार्यकाल में ही तय हो चुकी थी, मौजूदा सरकार ने तो सिर्फ इसका फीता काटा है।

चलो मान भी लें कि मेडिकल कॉलेज बन गया, लेकिन इसका चंदौली के स्थानीय गरीब बच्चों को क्या सीधा फायदा मिला? इस मेडिकल कॉलेज में सीटों का नामांकन ऑल इंडिया लेवल (राष्ट्रीय स्तर) की परीक्षा के आधार पर होता है। इसका नतीजा यह है कि चंदौली की मिट्टी पर बने इस कॉलेज में बाहर के राज्यों के बच्चे आकर डॉक्टर बन रहे हैं, जबकि चंदौली के स्थानीय और ग्रामीण परिवेश के होनहार बच्चों को इसमें कोई विशेष आरक्षण या सीधा लाभ नहीं मिल पा रहा है।

अब सिर्फ संघर्ष ही रास्ता, जेल जाने को भी तैयार हैं लोग

जब विज्ञापनों की झूठी चमक और शांतिपूर्ण धरने-प्रदर्शनों का बहरी हो चुकी सरकार पर कोई असर नहीं हुआ, तो अब चंदौली के किसानों और आम नागरिकों ने आर-पार की लड़ाई का पूरा मन बना लिया है। अब यहाँ के लोग सीधे तौर पर 'सड़क पर उतरकर प्रत्यक्ष संघर्ष' की रणनीति तैयार कर रहे हैं।

किसानों का साफ कहना है कि वे अपनी पुश्तैनी जमीन, अपनी आजीविका और अपने बच्चों के अस्तित्व को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। इस हक की लड़ाई में अगर सरकार उन पर मुकदमे लिखती है या उन्हें जेल भेजती है, तो वे पीछे नहीं हटेंगे। यहाँ का किसान अब अपनी जमीन की रक्षा के लिए अपनी जान तक दांव पर लगाने को मानसिक रूप से तैयार हो चुका है।

फाइलों का 'साइनिंग इंडिया' बनाम चंदौली की सिसकती आवाज

आज चंदौली जिले को सिर्फ कंक्रीट की सड़कों, हाईवे और बड़े-बड़े पुलों की ही जरूरत नहीं है। इस जिले को जरूरत है यहाँ की बंद पड़ी ऐतिहासिक फैक्ट्रियों को दोबारा चलाने की, ताकि यहाँ के बेरोजगार नौजवानों को रोजगार मिल सके। यहाँ की जनता को जरूरत है खेतों के लिए पानी, सिंचाई की पक्की व्यवस्था और चौबीस घंटे बिजली की ठोस सुविधा की।

यहाँ के गरीब बच्चों को जरूरत है महंगे स्कूलों के मकड़जाल से निकलकर एक अच्छी और मुफ्त शिक्षा पाने की। अब देखना यह है कि क्या लखनऊ और दिल्ली में बैठी सरकारें चंदौली की इस सिसकती और हक मांगती आवाज को सच में सुनेंगी, या फिर यह 'धान का कटोरा' कहा जाने वाला जिला सिर्फ सरकारी फाइलों और चुनावी भाषणों में ही 'साइनिंग इंडिया' का मुखौटा पहने रहेगा।