सावधान हो जाइए : चंदौली में लंपी बीमारी का खतरा बढ़ा, पशुपालकों को सतर्क रहने की चेतावनी
चंदौली में बढ़ रहा लंपी बीमारी का प्रकोप
पशुपालकों के लिए सतर्कता का अलर्ट
समय रहते पशु चिकित्सक से परामर्श अनिवार्य
चंदौली जिले में पशुओं में लंपी स्किन डिजीज के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। यह बीमारी एक विषाणु जनित संक्रामक रोग है, जो मुख्य रूप से गौवंशीय और महिष वंशीय पशुओं को प्रभावित करती है। पशु चिकित्सा विभाग ने सभी पशुपालकों से सतर्क रहने और समय रहते उचित उपचार कराने की अपील की है।
लक्षण और संक्रमण का तरीका
आपको बता दें कि पशुओं में लंपी स्किन डिजीज के लक्षण काफी स्पष्ट होते हैं। बीमार पशुओं में हल्का बुखार, पूरे शरीर पर गांठें या नोड्यूल्स, आंख और नाक से पानी गिरना आम हैं। इसके अलावा, कुछ पशुओं में शरीर पर सूजन और लाल चकत्ते दिखाई दे सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इस बीमारी की मृत्युदर 1 से 5 प्रतिशत तक हो सकती है।
बताते चलें कि रोग का फैलाव मुख्य रूप से मक्खी, चिचड़ी और मच्छर के काटने से होता है। संक्रमित पशु और उनके संपर्क में आने वाले उपकरण भी बीमारी के प्रसार में भूमिका निभाते हैं। इसलिए, पशुपालकों को अपने पशुओं को साफ-सुथरी और सुरक्षित वातावरण प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है।
देसी उपचार और सावधानियां
पशु चिकित्सक और ग्रामीण औषधि विशेषज्ञों ने देसी उपचार के विकल्प भी सुझाए हैं। इसमें नीम के पत्ते, तुलसी के पत्ते, लहसुन, हल्दी, लौंग, काली मिर्च, जीरा, पान के पत्ते और छोटे प्याज को पीसकर गुड़ में मिलाकर 10-14 दिन तक सुबह और शाम पशुओं को खिलाने की सलाह दी जाती है।
खुले घाव वाले पशुओं के लिए नीम, तुलसी, मोहदी के पत्ते, लहसुन, हल्दी और नारियल तेल का मिश्रण तैयार कर घाव पर लगाया जा सकता है। इसके अलावा, नीम की पत्तियों का पानी उबालकर घाव को धोना और जख्म पर लेप लगाना लाभकारी माना गया है।
हालांकि, अधिकारी जोर देते हैं कि किसी भी उपचार को बिना पशु चिकित्सक की सलाह के स्वयं न करें। समय रहते पेशेवर उपचार न कराने पर पशुओं की सेहत पर गंभीर असर पड़ सकता है।
रोकथाम और नियंत्रण
पशुपालकों को सलाह दी जाती है कि बीमार पशुओं को तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग करें। पशुशाला की दैनिक सफाई और कीटाणु नाशक उपायों का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण है। संक्रमित स्थानों की फार्मलिन, क्लोरोफार्म या एल्कोहल से कई बार सफाई करना बीमारी के प्रसार को रोकने में मदद करता है।
मृत पशुओं को गहरे गड्ढे में दफन करना चाहिए। संक्रमण से बचाव के लिए आंवला, अश्वगंधा, गिलोय या मुलेठी में से किसी एक को गुड़ के साथ लड्डू बनाकर सुबह और शाम खिलाना भी लाभकारी है। इसके अलावा, पशुशाला में गोबर के कड़े, कपूर, नीम के सूखे पत्ते और लोहबान जलाकर धुआँ करना कीटाणु कम करने में सहायक है।
पशुओं के स्नान के लिए नीम पेस्ट और फिटकरी का घोल बनाकर नहलाना भी संक्रमण को रोकने का प्रभावी उपाय है। इसके बाद सादे पानी से पशुओं को नहलाना चाहिए।
पशु चिकित्सा अधिकारी की चेतावनी
शहाबगंज के पशु चिकित्सा अधिकारी डा. सुनीत सिंह ने बताया कि बदलते मौसम में पशुओं में गलाघोंटू, लंगड़ा बुखार, दस्त, खुरपकत्र-मुंहपका समेत लंपी स्किन रोग का खतरा और बढ़ जाता है। उन्होंने पशुपालकों से अपील की कि जैसे ही लक्षण दिखाई दें, तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सालय से संपर्क करें।
डा. सुनीत सिंह ने कहा कि संक्रमण रोकने और पशुओं की सेहत बनाए रखने के लिए साफ-सफाई, कीट नियंत्रण और समय पर उपचार आवश्यक हैं। किसी भी स्थिति में स्वयं उपचार करना जानलेवा हो सकता है।