सरकारी कागजों के फेर में फंसी सिकठा गांव के किसानों की जमीन, रेलवे और चकबंदी विभाग के अलग-अलग नक्शों से परेशानी
चंदौली के सिकठा गांव में रेलवे और चकबंदी विभाग के सरकारी कागजात आपस में मेल नहीं खा रहे हैं। नक्शों में भारी अंतर होने के कारण किसानों की खेती की जमीन पर संकट मंडराने लगा है।
सिकठा गांव के किसानों की बढ़ी चिंता
दोनों विभागों के नक्शों में भारी विसंगति
रेलवे और चकबंदी टीम ने किया मिलान
पुराने भूमि अधिग्रहण पर उठे गंभीर सवाल
न्याय के लिए कोर्ट जाएंगे परेशान किसान
चंदौली जिले के सैयदराजा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सिकठा गांव से एक बेहद हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ रेलवे और चकबंदी विभाग के सरकारी दस्तावेजों में पाई गई बड़ी गड़बड़ी के कारण स्थानीय किसानों की रातों की नींद उड़ गई है। किसानों का सीधा आरोप है कि दोनों विभागों के सीमांकन और चक निर्धारण के कागजात आपस में मेल नहीं खा रहे हैं, जिसकी वजह से उनकी उपजाऊ कृषि भूमि बेवजह विवादों के घेरे में आ गई है।
इस गंभीर समस्या को लेकर सिकठा गांव के रहने वाले और प्रगतिशील किसान रतन कुमार सिंह ने एडीएम (वित्त एवं राजस्व) राजेश कुमार सिंह और रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों से लिखित शिकायत की थी। इस शिकायत का संज्ञान लेते हुए गुरुवार को रेलवे के बक्सर सेक्शन के अधिशासी अभियंता श्याम प्रकाश, उनके सहयोगी शौरभ कुमार, चकबंदी विभाग के कानूनगो अविनाश कुमार और लेखपाल छोटेलाल गुप्ता अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने गाँव में आकर दोनों विभागों के नक्शों का मिलान किया।
नक्शों में भारी अंतर, 51 मीटर बनाम 18 मीटर का फंसा पेंच
मौके पर जब सरकारी नक्शों को खोला गया तो हैरान करने वाली विसंगति सामने आई। किसानों के मुताबिक, रेलवे के नक्शे में संबंधित रेल भूमि की चौड़ाई 51 मीटर दिखाई जा रही है, जबकि इसके उलट चकबंदी विभाग के सरकारी रिकॉर्ड में यही जमीन महज 18 मीटर दर्ज है। नक्शों में मौजूद इसी बड़े अंतर के कारण अब किसानों को यह डर सता रहा है कि उनकी पुश्तैनी जमीनों के चक बुरी तरह प्रभावित हो जाएंगे और उनके हाथ से खेती की जमीन निकल जाएगी।
इस मामले पर चकबंदी विभाग के कानूनगो अविनाश कुमार ने अपनी बात रखते हुए कहा कि रेलवे विभाग की तरफ से अभी तक उनके द्वारा अधिग्रहित की गई जमीन के पुख्ता और आधिकारिक दस्तावेज चकबंदी टीम को उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। ऐसे में चकबंदी विभाग के पास जो भी पुराने राजस्व रिकॉर्ड मौजूद हैं, विभाग उसी को आधार मानकर अपना चक निर्धारण का काम आगे बढ़ा रहा है।
1861 के दस्तावेज दिखाने की मांग, कोर्ट जाएंगे किसान
किसान रतन कुमार सिंह का कहना है कि अगर रेलवे विभाग का यह दावा है कि उसने साल 1861 में ब्रिटिश काल के दौरान इस जमीन का अधिग्रहण किया था, तो उसे उस समय के अधिग्रहण से जुड़े असली कागजात सबके सामने पेश करने चाहिए। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर दोनों ही जिम्मेदार विभाग मिलकर इस विसंगति को दूर नहीं कर पाते हैं और जरूरी दस्तावेज नहीं दिखाते हैं, तो देश के अन्नदाता न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने को मजबूर होंगे।
किसानों ने आरोप लगाया कि सरकारी विभागों की इस आपसी लापरवाही और कागजी स्पष्टता न होने के चलते सैकड़ों किसानों का भविष्य अधर में लटक गया है। उन्होंने राज्य सरकार और जिला प्रशासन से मांग की है कि दोनों विभागों के अभिलेखों की संयुक्त जांच (जॉइंट वेरिफिकेशन) कराई जाए और दोबारा निष्पक्ष पैमाइश कराकर किसानों के अधिकारों की रक्षा की जाए। दूसरी तरफ, इस पूरे विवाद पर रेलवे विभाग के पटना सेक्शन के अधिशासी अभियंता महेंद्र रजत का कहना है कि बहुत पहले अधिग्रहित की गई जमीनों के असली कागजात को ढूंढने के लिए उन्हें अपने मुख्यालय के रिकॉर्ड को खंगालना पड़ेगा।