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जानें आखिर पहली बार किसने रखा था हरतालिका तीज का व्रत, अखंड सौभाग्य प्राप्ति के लिए की जाती है पूजा

भाद्रपद माह में कई महत्वपूर्ण व्रत-त्यौहार आते हैं जिनमें से एक है हरतालिका तीज का व्रत जो सुहागिन महिलाओं के लिए किसी पर्व से कम नहीं है।

 

भाद्रपद माह में कई महत्वपूर्ण व्रत-त्यौहार आते हैं जिनमें से एक है हरतालिका तीज का व्रत जो सुहागिन महिलाओं के लिए किसी पर्व से कम नहीं है। इस दिन वे अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती है और माना जाता है कि ऐसा करने से उन्हें अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है। कुंवारी लड़कियां ये व्रत मनचाहे पति का वरदान पाने के लिए करती है। इस बार हरतालिका तीज का ये पावन पर्व 9 सितंबर  गुरुवार को रखा जाएगा।

भाद्रपद माह में कई महत्वपूर्ण व्रत-त्यौहार आते हैं जिनमें से एक है हरतालिका तीज का व्रत जो सुहागिन महिलाओं के लिए किसी पर्व से कम नहीं है। इस दिन वे अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती है और माना जाता है कि ऐसा करने से उन्हें अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है। कुंवारी लड़कियां ये व्रत मनचाहे पति का वरदान पाने के लिए करती है। 

इस बार हरतालिका तीज का ये पावन पर्व 9 सितंबर  गुरुवार को रखा जाएगा। इस दिन व्रती महिलाएं सौलह श्रृंगार करेंगी साथ ही माता पार्वती को भी सुहाग की चीजें चढ़ाएंगी। इसके अलावा इस दिन सुहाग की चीजों का दान भी किया जाता है जिससे कि शुभ फल की प्राप्ति हो सके। 

ये तो हो गई हरतालिका तीज से जुड़ी कुछ बातें पर यहां सवाल यह उठता है कि आखिर किसने पहली बार ये व्रत रखा था ? कैसे इस व्रत की शुरुआत हुई और क्या है इसकी महिमा ? 

hartalika teej puja

तो आइये यहां यही जानते हैं ....

पहली बार मां पार्वती ने रखा था ये व्रत 

जब हम हरतालिका तीज व्रत का इतिहास जानने की कोशिश करते हैं तो हमारे सामने आती है इससे जुड़ी ये पौराणिक कथा जिसके अनुसार  देवी सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव ने वैराग्य ले लिया और वे साधना में लीन हो गए थे। वहीं, दूसरी ओर सती ने माता पार्वती के रूप में हिमालयराज की पुत्री के रूप में जन्म लिया था।

समय के साथ जब वह विवाह योग्य हुईं तो नारद जी के सुझाव पर हिमालयराज ने पार्वती जी का विवाह विष्णु जी से करने का निर्णय लिया लेकिन पार्वती जी को भगवान शिव प्रिय थे। वे शिव जी को पति स्वरुप में पाना चाहती थीं, तब उनकी सहेलियों ने उनका हरण कर हिमालय में ​छिपा दिया। जहां माता पार्वती ने शिव जी को पति स्वरुप में पाने के लिए कठोर तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने वैराग्य छोड़कर फिर से गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने का निर्णय लिया। शिव जी ने माता पार्वती को अर्धांगिनी के रुप में स्वीकार किया।

यह शुभ संयोग भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ था इसलिए इस तिथि को हरतालिका तीज मनाई जाने लगी। अविवाहित कन्याएं माता पार्वती की तरह ही मनचाहा वर प्राप्त करने के लिए हरतालिका तीज व्रत रखने लगीं। यह व्रत सबसे ​कठिन व्रतों में से एक है।

hartalika teej vrat puj

निर्जला रखा जाता है हरतालिका तीज का व्रत 

माता पार्वती ने शिव जी को प्राप्त करने के लिए कई वर्षों तक कठोर तपस्या ​कीं। इसी तपस्या के चलते  हरतालिका तीज व्रत भी कठिन होता है। इसमें बिना अन्न और जल ग्रहण किए पूरे एक दिन का व्रत रखना होता है। माता पार्वती ने सबसे पहले तप किया और व्रत रखा था, जिसके बाद से हरतालिका तीज व्रत सुहागन महिलाएं और कुंवारी कंन्याएं करने लगीं। 

हरतालिका का अर्थ

हरतालिका दो शब्दों से बना है। हर और तालिका। हर का अर्थ हरण और तालिका का अर्थ सखी है। यह व्रत तृतीया तिथि को रखते हैं, इसलिए इसका पूरा नाम हरतालिका तीज है।