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जानें आखिर इस अमावस्या को क्यों कहते हैं कुशग्रहणी अमावस्या, पूजा-अनुष्ठान में क्यों धारण किया जाता है कुश

भाद्रपद की अमावस्या को कुशग्रहणी अमावस्या व पिठोरी अमावस्या कहते हैं। इस वर्ष ये अमावस्या 7 सितंबर मंगलवार को मनाई जाएगी।

 

भाद्रपद की अमावस्या को कुशग्रहणी अमावस्या व पिठोरी अमावस्या कहते हैं। इस वर्ष ये अमावस्या 7 सितंबर मंगलवार को मनाई जाएगी। वैसे तो अमावस्या तिथि की शुरुआत 6 सितंबर से ही हो रही है पर उदया तिथि 7 सितंबर को होने से यह इस दिन मनाई जाएगी। अमावस्या के दिन स्नान-दान के साथ ही व्रत व अन्य पूजन कार्य किये जाते हैं साथ ही इस दिन पितरों की आत्मा की शांति के लिए भी तर्पण आदि किया जाता है। 

भाद्रपद की अमावस्या को कुशग्रहणी अमावस्या व पिठोरी अमावस्या कहते हैं। इस वर्ष ये अमावस्या 7 सितंबर मंगलवार को मनाई जाएगी। वैसे तो अमावस्या तिथि की शुरुआत 6 सितंबर से ही हो रही है पर उदया तिथि 7 सितंबर को होने से यह इस दिन मनाई जाएगी। अमावस्या के दिन स्नान-दान के साथ ही व्रत व अन्य पूजन कार्य किये जाते हैं साथ ही इस दिन पितरों की आत्मा की शांति के लिए भी तर्पण आदि किया जाता है। 

शास्त्रों के अनुसार अमावस्या तिथि के स्वामी पितृदेव होते हैं इसीलिए इस दिन पितरों के तृप्ति के लिए तर्पण और दान-पुण्य किया जाता है। इस अमावस्या को कुश ग्रहण करने एवं पूजा में कुश के प्रयोग का विशेष महत्व है। इस दिन नदी और पोखर किनारे निकलकर कुशा को एकत्रित किया जाता है तथा आने वाले दिनों और पितृ पक्ष में इसका प्रयोग पूजन और तर्पण आदि कार्यों में किया जाता है।

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इसे कुशग्रहणी अमावस्या क्यों कहते हैं 

कुशग्रहणी अमावस्या के दिन वर्ष भर पूजा, अनुष्ठान या श्राद्ध कराने के लिए नदी, मैदानों आदि जगहों से कुशा नामक घास ग्रहण की जाती है यानी कुशा को उखाड़कर घर लाते हैं। इस कुशा का उपयोग धार्मिक कार्यों में किया जाता है और माना जाता है कि यदि इस दिन कुशा एकत्रित की जाए तो वह वर्ष भर तक पुण्य फलदायी होती है। वहीं बिना कुशा घास के कोई भी धार्मिक पूजा निष्फल मानी जाती है इसलिए कुशा घास का उपयोग हिंदू पूजा पद्धति में प्रमुखता से किया जाता है। इस दिन तोड़ी गई कोई भी कुशा वर्ष भर तक पवित्र मानी जाती हैं। अत्यंत पवित्र होने के कारण इसका एक नाम पवित्री भी है।

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आखिर कुशा इतनी पवित्र क्यों है ? 

कोई धार्मिक कार्य या फिर श्राद्ध या तर्पण कुशा के बगैर पूरा नहीं होता तो यहां सवाल ये उठता है कि आखिर ये कुशा इतनी पवित्र क्यों है। तो इस बारे में मत्स्य पुराण के एक प्रसंग का जिक्र किया जा सकता है जिसके अनुसार जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को पुनः स्थापित किया। उसके बाद उन्होंने अपने शरीर पर लगे पानी को झाड़ा तब उनके शरीर से बाल पृथ्वी पर गिरे और कुशा के रूप में बदल गए। इसके बाद कुशा को पवित्र माना जाने लगा।

एक अन्य पौराणिक प्रसंग के अनुसार जब सीता जी पृथ्वी में समाई थीं तो श्री रामजी ने जल्दी से दौड़ कर उन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु उनके हाथ में केवल सीता जी के केश ही आ पाए। यह केशराशि ही कुशा के रूप में परिणत हो गई।

धार्मिक कार्यों में क्यों होता है कुशा का प्रयोग 

हमारे वेदों व पुराणों में कुश घास को पवित्र माना गया है। इसे कुशा, दर्भ या डाभ भी कहा गया है। आमतौर पर सभी धार्मिक कार्यों में कुश से बना आसान बिछाया जाता है या कुश से बनी हुई पवित्री को अनामिका अंगुली में धारण किया जाता है। अथर्ववेद, मत्स्य पुराण और महाभारत में इसका महत्व बताया गया है। 
माना जाता है कि पूजा-पाठ और ध्यान के दौरान हमारे शरीर में ऊर्जा पैदा होती है। कुश के आसन पर बैठकर पूजा-पाठ और ध्यान किया जाए तो शरीर में संचित उर्जा जमीन में नहीं जा पाती। इसके अलावा धार्मिक कार्यों में कुश की अंगूठी इसलिए पहनते हैं ताकि आध्यात्मिक शक्ति पुंज दूसरी उंगलियों में न जाए। रिंग फिंगर यानी अनामिका के नीचे सूर्य का स्थान होने के कारण यह सूर्य की उंगली है। सूर्य से हमें जीवनी शक्ति, तेज और यश मिलता है। दूसरा कारण इस ऊर्जा को पृथ्वी में जाने से रोकना भी है। पूजा-पाठ के दौरान यदि भूल से हाथ जमीन पर लग जाए, तो बीच में कुशा आ जाएगी और ऊर्जा की रक्षा होगी। इसलिए कुशा की अंगूठी बनाकर हाथ में पहनी जाती है।  

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ये है कुशा घास को तोड़ने का सही तरीका 

कुशा घास इतनी पवित्र मानी जाती है तो इसे तोड़ना भी सही तरीके से चाहिए वरना इसे उपयोग करने पर भी इसका शुभ फल नहीं मिलता है। कुशा को निकलते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि इसको किसी भी औजार से ना काटा जाये, इसे केवल हाथों से ही निकालना चाहिए और कुशा घास खंडित नहीं होनी चाहिए अर्थात घास का अग्रभाग टूटा हुआ नहीं होना चाहिए। कुशा एकत्रित करने के लिए सूर्योदय का समय सर्वश्रेष्ठ माना गया है। दाहिने हाथ से एक बार में ही कुशा को निकाला जाना चाहिए। 

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पूजा-अनुष्ठान में कुशा का महत्व 

- कुशा के बने हुए आसन पर बैठ कर जप और तप करने का विधान है। मान्यता है कि ऐसा करने से जप और तप पूर्ण फलदायी होता है।

- कुशा को उखाड़ते समय ध्यान रखें कि कुशा को ऐसे स्थान से ही उखाड़े जो साफ-सुथरा हो और अपना मुहं उत्तर या पूर्व की दिशा में रखें।

- कुशा निकालने के लिए लोहे का प्रयोग न करें, लकड़ी से ढीली की हुई कुशा को एक बार में निकाल लेना चाहिए।

- खण्डित या टूटी-फूटी कुशा का प्रयोग पूजा में नहीं किया जाता है, इसलिए ध्यान दे कि ऐसी कुशा एकत्रित न करें।

- कुशा उखाड़ते समय ऊँ के उच्चारण के बाद 'विरंचिना सहोत्पन्न परमेष्ठिनिसर्जन। नुद सर्वाणि पापानि दर्भ! स्वस्तिकरो भव॥' मंत्र का उच्चारण करना चाहिए, और अंत में 'हुं फ़ट्' कहें।