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विधानसभा चुनाव 2022 स्पेशल : इन सीटों पर मामूली वोटों से हार गए थे दिग्गज, सुशील ही नहीं कमलापति भी हारे
चंदौली विधानसभा के चुनाव में कई दिलचस्प किस्से हैं। कई नेता अपने चुनाव क्षेत्र में हल्की फुल्की असावधानी की वजह से चुनाव हार गए
 

विधानसभा चुनाव 2022 स्पेशल

इन सीटों पर मामूली वोटों से हार गए थे दिग्गज

सुशील ही नहीं कमलापति भी हारे

चंदौली विधानसभा के चुनाव में कई दिलचस्प किस्से हैं। कई नेता अपने चुनाव क्षेत्र में हल्की फुल्की असावधानी की वजह से चुनाव हार गए और उनकी पांच साल की मेहनत पर पानी फिर गया। चंदौली जिले में लगभग आधे दर्जन ऐसे मामले हैं, जहां पर हारजीत का फैसला नजदीकी अंतर वाला रहा है। इन आंकड़ों को देख कर लगता है कि चुनाव के समय थोड़ी सी सावधानी हटी को दुर्घटना घटी। 

कहा जाता है कि सबसे कम वोट से हार-जीत का फैसला देने वाली विधानसभा सीटों धानापुर और मुगलसराय विधानसभा सीट का नाम शामिल है, जहां पर हार जीत का फैसला बहुत ही काम था। धानापुर में 50 से कम तो मुगलसराय में 100 वोट से भी कम का था। वहीं जिले की कई सीटों पर 500 वोटों से भी कम की हार जीत का फैसला कई बार देखने को मिला है। 

Chandauli Assembly Election

चंदौली और चकिया विधानसभा सीट पर नजदीकी अंतर से हार जीत का रिकॉर्ड देखा गया है। इसीलिए चंदौली जिले में विधानसभा के चुनाव की तैयारी कर रहे राजनेताओं को काफी सतर्क रहने की जरूरत है। 

ये है चंदौली की पहली नजदीकी हार-जीत

 नजदीकी अंतर से हार जीत वाले चुनाव का अगर इतिहास देखा जाए तो चंदौली जिले में सबसे पहले नजदीकी हार जीत का फैसला 1967 के चुनाव में हुआ जब मुगलसराय विधानसभा सीट के चुनाव में कांग्रेस पार्टी के श्याम लाल यादव ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार उमाशंकर तिवारी को करारी टक्कर देते हुए मात्र 82 वोटों से हरा दिया था। इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी के श्याम लाल यादव को 15,054 वोट मिले थे, जबकि संघटा सोशलिस्ट पार्टी के उमाशंकर तिवारी को 14,972 वोट ही मिल पाए थे और वह चुनाव हार गए थे। इस तरह से श्यामलाल यादव ने पिछले चुनाव में हार का अपना बदला ले लिया था। लेकिन उसके बाद के चुनाव में वह फिर हार गए थे।

kamalapati

कमलापति भी हार गए थे

इसी साल 1967 में चंदौली विधानसभा सीट पर पंडित कमलापति त्रिपाठी को संघटा सोशलिस्ट पार्टी के चंद्रशेखर सिंह ने 397 वोटों से हरा दिया था। उस चुनाव में संघटा सोशलिस्ट पार्टी के चंद्रशेखर सिंह को  22,916 वोट मिले थे जबकि पंडित कमलापति त्रिपाठी 22,519 वोट पाकर चुनाव हार गए थे। यह चंदौली जिले में पंडित कमलापति त्रिपाठी की पहली हार थी। इससे पंडित जी को करारा झटका लगा था।

ganji prasad

गंजी प्रसाद के नाम है कांटे की जीत

 इसके बाद 1974 के चुनाव में भारतीय किसान दल के गंजी प्रसाद ने कांग्रेस के प्रत्याशी यदुनाथ सिंह को 428 वोटों से हराने का काम किया था। मुगलसराय सीट पर एक और करारी टक्कर में गंजी प्रसाद को 17,216 वोट मिले थे, जबकि यदुनाथ को 16,788 वोटों मिलने के कारण वह 428 वोट से अपना चुनाव हार गए थे। इसके बाद अगले चुनाव में गंजी प्रसाद ने और भी भारी मतों से चुनाव जीता था।

दीनानाथ भास्कर को हराकर खोला था खाता

 उसके बाद 1991 में चंदौली (सु.) विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी के शिवपूजन राम ने बसपा के उम्मीदवार दीनानाथ भास्कर को 229 वोट से हराकर विधानसभा में पहुंचने का कार्य किया था। इस करारी टक्कर में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी शिवपूजन राम को 26,604 वोट मिले थे, जबकि दीनानाथ भास्कर को 26,366 वोट ही मिल पाए थे। इस तरह से दीनानाथ भाष्कर यह चुनाव 238 वोट से हार गए थे।

नहीं चला था बसपा का जादू

 कुछ ऐसा ही कारनामा 1993 में चकिया विधानसभा सीट भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे राजेश कुमार बहेलिया ने बहुजन समाज पार्टी के नंदलाल को 369 वोटों से हराने का काम करते हुए कर दिखाया था। भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी राजेश कुमार बहेलिया को 32,478 वोट मिले जबकि नंदलाल को केवल 32,109 वोट ही मिल पाए थे। इस तरह से बहुजन समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी कांटे की टक्कर में भाजपा के प्रत्याशी से हार गया था।

 prabhu aur sushil

हारे सुशील तो चले गए कोर्ट

 यह सिलसिला 2002 में भी चलता रहा और धनापुर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के प्रभु नारायण सिंह यादव ने बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे सुशील सिंह को मात्र 26 वोटों से हरा दिया था। यह चंदौली जिले की सबसे कम अंतर से होने वाली हार जीत है। इस कांटे की टक्कर में प्रभु नारायण सिंह यादव को 45,410 वोट मिले थे, जबकि सुशील सिंह को 45,384 वोट ही मिल पाए थे। इस तरह से सुशील सिंह की मात्र 26 वोट से नजदीकी हार हुई थी। इसके बाद मामला कोर्ट तक भी गया था, लेकिन 5 साल तक इसका कोई फैसला नहीं हो पाया और प्रभु नारायण सिंह यादव पांच सालों तक विधायक बने रहे। लेकिन अगले विधानसभा के चुनाव में सुशील सिंह ने 17 हजार से अधिक मतों से हराकर जेल से चुनाव जीतने का काम किया था।