सपा नेता महेंद्र राव को बड़ी राहत, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी सहित अन्य कार्रवाई पर लगायी रोक
सपा नेता महेंद्र राव को हाईकोर्ट से राहत
याचिकाकर्ताओं के खिलाफ जबरन कार्रवाई पर रोक
एफआईआर के आरोप अत्यंत अस्पष्ट और सामान्य
राज्य सरकार को जवाब हेतु दो हफ्ते का समय
भारतीय वन अधिनियम के तहत दर्ज था मुकदमा
चंदौली जनपद के चकिया थाना क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के नेता महेंद्र राव व अन्य सहयोगियों पर दर्ज मुकदमे को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने महेंद्र राव उर्फ महेंद्र कुमार राव समेत सभी याचिकाकर्ताओं को बड़ी अंतरिम राहत प्रदान की है। न्यायालय ने मामले की प्राथमिक समीक्षा करते हुए प्रथम दृष्टया कोई ठोस आधार न पाते हुए याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध किसी भी प्रकार की दंडात्मक या जबरन पुलिसिया कार्रवाई पर पूरी तरह रोक लगा दी है।
एफआईआर के आरोप अस्पष्ट और काल्पनिक
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह एवं न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की खंडपीठ में हुई। खंडपीठ ने केस की बारीकियों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों का अध्ययन करने के बाद कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला बनता हुआ दिखाई नहीं देता। माननीय न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि एफआईआर में 21 नामजद और 100 अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध जो आरोप लगाए गए हैं, वे अत्यंत सामान्य और अस्पष्ट प्रकृति के हैं। अदालत ने याचिकाकर्ताओं के इस तर्क को भी दर्ज किया कि दुर्भावनावश आरोपों को काफी बढ़ा-चढ़ाकर और काल्पनिक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
मेडिकल रिपोर्ट और गंभीर साक्ष्यों के अभाव पर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इस बात को रेखांकित किया कि एफआईआर के आरोपों के समर्थन में कोई गंभीर चोट या ऐसा कोई ठोस साक्ष्य तत्काल दृष्टिगत नहीं होता, जिसके आधार पर इस अभियोजन की कार्रवाई को पूरी तरह उचित ठहराया जा सके। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से इस मामले में अपना पक्ष रखने और जवाब दाखिल करने के लिए समय की मांग की गई, जिस पर कोर्ट ने सरकार को दो सप्ताह का समय प्रदान किया। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं को सरकार के जवाब पर अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया गया है।
जांच में सहयोग की शर्त पर दंडात्मक कार्रवाई (Coercive Action) पर रोक
उच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में साफ कर दिया है कि मामले की अगली सुनवाई होने या पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल होने तक (जो भी पहले हो), याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई भी दंडात्मक या जबरन कार्रवाई (जैसे गिरफ्तारी) नहीं की जाएगी। हालांकि, इसके लिए कोर्ट ने यह शर्त भी रखी है कि सभी याचिकाकर्ता पुलिस जांच में पूरी तरह सहयोग करते रहेंगे। गौरतलब है कि चकिया थाने में दर्ज इस मुकदमे में भारतीय वन अधिनियम 1927, क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट 1932 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था, जिसमें अब हाईकोर्ट का यह आदेश याचिकाकर्ताओं के लिए संजीवनी साबित हुआ है।