चकिया कजरी महोत्सव: 113 साल पुरानी ऐतिहासिक परंपरा टूटी, SDM की जगह EO बने संरक्षक तो भड़के बुजुर्ग
चंदौली के चकिया में 113 वर्षों से चली आ रही कजरी महोत्सव की ऐतिहासिक परंपरा बदल गई है। इस बार एसडीएम की जगह नगर पंचायत के ईओ को संरक्षक बनाए जाने पर नगर के बुजुर्गों ने सवाल खड़े कर दिए हैं।
चकिया कजरी महोत्सव की 113 साल पुरानी परंपरा टूटी
उपजिलाधिकारी की जगह नगर पंचायत ईओ बनाए गए संरक्षक
काशी नरेश के दौर से चली आ रही थी संरक्षकता की प्रथा
ऐतिहासिक परंपरा में बदलाव को लेकर बुजुर्गों ने जताई नाराजगी
एसडीएम आवास के वटवृक्ष नीचे कजरी गायन की रही है परंपरा
चंदौली जिले के चकिया की सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले 113 वर्षों पुराने ऐतिहासिक कजरी महोत्सव में इस बार बड़ा बदलाव देखने को मिला। वर्ष 1913 से लगातार चली आ रही इस परंपरा में इस बार पहली बार व्यवस्था बदली गई। इस बदलाव के बाद से ही नगर में प्रशासनिक भूमिका और पारंपरिक मर्यादा को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
काशी नरेश और एसडीएम की संरक्षकता का इतिहास
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, ब्रिटिश काल में शुरू हुई इस परंपरा के पहले संरक्षक काशी नरेश हुआ करते थे। देश की आजादी के बाद वर्ष 1947 से इस आयोजन की संरक्षकता की जिम्मेदारी उपजिलाधिकारी (एसडीएम) को सौंपी गई थी। तभी से एसडीएम की सीधी निगरानी और मार्गदर्शन में कजरी महोत्सव का भव्य आयोजन होता आ रहा था।
वटवृक्ष के नीचे कजरी गायन और नई व्यवस्था
एसडीएम आवास परिसर में स्थित वटवृक्ष के नीचे पारंपरिक कजरी गायन की दशकों पुरानी परंपरा रही है। यहां एसडीएम की मौजूदगी में नगर और आसपास के लोग पारंपरिक कजरी गीतों का लुत्फ उठाते थे। हालांकि, इस बार नगर पंचायत की ओर से जारी निमंत्रण पत्र में एसडीएम की जगह नगर पंचायत के अधिशासी अधिकारी (ईओ) को संरक्षक बनाया गया, जिससे लोग हैरान रह गए।
परंपरा में फेरबदल पर बुजुर्गों ने उठाए गंभीर सवाल
आयोजन की निमंत्रण पत्रिका में एसडीएम का नाम संरक्षक के रूप में न देखकर नगर के बुजुर्गों और प्रबुद्धजनों ने नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि 113 साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत से छेड़छाड़ करने से पहले इसके ऐतिहासिक महत्व का ध्यान रखा जाना चाहिए था। लोगों का कहना है कि आयोजन भले ही नगर पंचायत कराए, लेकिन संरक्षक की तय परंपरा बदलना सही नहीं है।
परंपरा बनाम नई व्यवस्था की बहस तेज
कजरी महोत्सव में हुए इस अचानक बदलाव ने पूरे इलाके में 'परंपरा बनाम नई व्यवस्था' का विवाद खड़ा कर दिया है। नगरवासियों का कहना है कि प्रशासन को इस बदलाव की वजह स्पष्ट करनी चाहिए। अब देखना यह होगा कि आने वाले सालों में कजरी महोत्सव की 113 साल पुरानी परंपरा फिर से बहाल होती है या फिर इस बार का बदलाव ही नई व्यवस्था बन जाएगा।