नव वर्ष 2026 में भी बदहाल है घुरहूपुर बौद्ध स्थल, मंत्रियों के आश्वासन के बाद भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव
चंदौली का ऐतिहासिक घुरहूपुर बौद्ध स्थल अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। अंतरराष्ट्रीय बौद्ध भिक्षुओं की आस्था और दुर्लभ शैल चित्रों के बावजूद, 17 सालों से यह स्थल केवल सरकारी फाइलों और अधूरे आश्वासनों में सिमट कर रह गया है।
घुरहूपुर बौद्ध गुफाओं की ऐतिहासिक खोज
अंतरराष्ट्रीय बौद्ध पर्यटन की अपार संभावनाएं
17 वर्षों से पर्यटन विकास की अनदेखी
विंध्य पर्वत श्रृंखला में प्राचीन शैलचित्र
रोजगार और स्थानीय विकास की उम्मीदें
नव वर्ष 2026 का सूरज जहां विकास के नए संकल्प लेकर आया है, वहीं चंदौली जनपद की विंध्य पर्वत श्रृंखला में स्थित घुरहूपुर बौद्ध स्थल आज भी अपनी दुर्दशा पर मौन है। इस गौरवशाली इतिहास की शुरुआत 4 अक्टूबर 2008 को हुई थी, जब वरिष्ठ पत्रकार सुशील त्रिपाठी ने घुरहूपुर पहाड़ी की कंदराओं में छिपे बौद्ध काल के दुर्लभ प्रमाणों की खोज की थी। इस खोज ने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि वैश्विक स्तर पर बौद्ध अनुयायियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। गुफाओं के भीतर मिले गौतम बुद्ध के पदचिन्ह, ध्यान लगाने के लिए विशाल शिला पर बने सिरहाने के निशान और प्राचीन जल स्रोतों ने इस स्थल को आध्यात्मिक साधना के केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया था।
अंतरराष्ट्रीय फलक पर पहचान, पर धरातल पर सन्नाटा
घुरहूपुर की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खोज के शुरुआती वर्षों में ही चीन, जापान, श्रीलंका और कोरिया जैसे बौद्ध देशों के भिक्षु यहां शीश नवाने पहुंचे थे। गुफाओं में मिले प्राचीन शैल चित्र और पाली भाषा के शिलालेख इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि यह स्थल प्राचीन काल में बौद्ध भिक्षुओं की तपोस्थली रहा होगा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की कई टीमों ने प्रारंभिक सर्वे भी किए, लेकिन विडंबना यह रही कि जिस स्थान को अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर चमकना चाहिए था, वह आज झाड़ियों और अंधेरे के बीच खोया हुआ है।
दावों की बौछार और आश्वासनों की हकीकत
पिछले 17 वर्षों में घुरहूपुर के विकास के लिए राजनेताओं की लंबी कतार लगी। तत्कालीन पर्यटन मंत्री ओमप्रकाश सिंह से लेकर पीडब्ल्यूडी मंत्री और समाज कल्याण मंत्रियों ने इस स्थल को 'बौद्ध सर्किट' से जोड़ने के बड़े-बड़े दावे किए। वर्ष 2009 में तत्कालीन जिलाधिकारी रिग्जियान सैम्फिल ने इस दुर्गम पहाड़ी का भ्रमण कर पर्यटन विकास का जो खाका खींचा था, वह आज भी फाइलों की धूल फांक रहा है। जिला पंचायत के सीमित फंड से कुछ सीढ़ियों और सीसी रोड का निर्माण तो हुआ, लेकिन पेयजल, विश्रामालय, सुरक्षा और सुगम परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाएं आज भी नदारद हैं।
क्षेत्रीय विकास और रोजगार की अधूरी उम्मीदें
घुरहूपुर के ग्रामीणों के लिए यह स्थल केवल एक आध्यात्मिक केंद्र नहीं, बल्कि उनके आर्थिक उत्थान की एक बड़ी उम्मीद भी है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि सरकार इस स्थल को सारनाथ की तर्ज पर विकसित करे, तो पूरे क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा होंगे और चंदौली को वैश्विक पहचान मिलेगी। 17 साल बीत जाने के बाद भी ग्रामीण इस उम्मीद में हैं कि शायद इस नए साल में सरकार की नजर इस उपेक्षित बौद्ध धरोहर पर पड़ेगी और घुरहूपुर का अंधकार दूर होगा।