घुरहूपुर में उमड़ा चीन, वियतनाम और श्रीलंका के बौद्ध भिक्षुओं का जत्था, उठाई अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल बनाने की मांग

 

चंदौली के घुरहूपुर की पहाड़ियों पर वियतनाम, चीन और श्रीलंका के बौद्ध भिक्षुओं की टीम ने दौरा किया। गुफाओं में बने भगवान बुद्ध के पदचिह्नों की पूजा-अर्चना के साथ प्राचीन शैल चित्रों को देखा और इसे वैश्विक बौद्ध सर्किट से जोड़ने की मांग की।

 
 

घुरहूपुर पहाड़ी पर वियतनामी बौद्ध दल

बुद्ध के प्राचीन पदचिह्नों की पूजा

तीन देशों के बौद्ध भिक्षुओं का संगम

घुरहूपुर को बौद्ध पर्यटन से जोड़ने की मांग

साल 2008 में हुई थी इस स्थल की खोज

चंदौली जिले की चकिया तहसील के छोटे से गांव घुरहूपुर की पहाड़ियां इन दिनों सुर्खियों में हैं। सोमवार को वियतनाम से 13 सदस्यों का एक दल इस ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल के दर्शन के लिए पहुंचा। थिच मिंच क्यूंग के नेतृत्व में आई इस अंतरराष्ट्रीय टीम के साथ चीन और श्रीलंका के बौद्ध भिक्षु भी शामिल रहे। विदेशी मेहमानों के आगमन से पूरे क्षेत्र में खासा उत्साह देखने को मिला।

गुफाओं में की विशेष पूजा-अर्चना
पहाड़ी पर पहुंचकर बौद्ध अनुयायियों ने वहां मौजूद गुफाओं का रुख किया। गुफा के भीतर स्थापित भगवान बुद्ध की प्रतिमा और उनके पवित्र पदचिह्नों के दर्शन किए। सभी भिक्षुओं ने बुद्ध के पदचिह्नों के सामने नतमस्तक होकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इसके साथ ही उन्होंने वहां की चट्टानों पर उकेरे गए प्राचीन शैल चित्रों और पुरातात्विक अवशेषों को भी बहुत करीब से देखा।

विश्व शांति का दिया संदेश
भ्रमण के दौरान बौद्ध भिक्षुओं ने कहा कि घुरहूपुर का यह क्षेत्र केवल एक पहाड़ी नहीं, बल्कि हमारी ऐतिहासिक और धार्मिक आस्था का एक अनमोल केंद्र है। उन्होंने बताया कि यहां मौजूद अवशेष बुद्ध के दया, शांति और करुणा के संदेश को दर्शाते हैं। ऐसी जगहों पर आकर बुद्ध कालीन संस्कृति और इतिहास को गहराई से समझने का मौका मिलता है।

2008 में हुई थी इस जगह की पहचान
इस ऐतिहासिक स्थल का इतिहास बेहद दिलचस्प है। 30 सितंबर 2008 को वरिष्ठ पत्रकार सुशील त्रिपाठी ने सबसे पहले इस प्राचीन बौद्ध स्थल की खोज की थी। इसके बाद से ही यह जगह दुनिया भर के बौद्ध धर्मावलंबियों के बीच मशहूर होने लगी। अब तक श्रीलंका, चीन, कोरिया, जापान और वियतनाम जैसे कई देशों के भिक्षु यहां दर्शन के लिए आ चुके हैं।

अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल बनाने की उठी मांग
विदेशी मेहमानों ने इस बात पर जोर दिया कि इस अनमोल धरोहर को सहेजने की सख्त जरूरत है। अगर सरकार इसका संरक्षण करे और वैज्ञानिक अध्ययन कराए, तो इसे बड़ा पर्यटन केंद्र बनाया जा सकता है। इससे न केवल विदेश से आने वाले बौद्ध धर्मावलंबियों की संख्या बढ़ेगी, बल्कि इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले लोग भी बड़ी संख्या में यहां पहुंचेंगे।

ग्रामीणों ने किया स्वागत
इस मौके पर चीन से तंग थी लाई, श्रीलंका से अशोक वंश, स्थानीय भिक्खु धम्म प्रकाश और चंदन धम्म सेवक मौजूद रहे। इनके अलावा गांव के महेंद्र राजभर, दया राजभर, रमाशंकर, झारखंडे और अदालत समेत कई ग्रामीण भी उपस्थित रहे। सबने एक सुर में इस धरोहर के संरक्षण और प्रचार-प्रसार की मांग दोहराई।