सैदूपुर में गूँजे सावित्रीबाई के विचार: बुद्ध विहार में जुटे सैकड़ों लोग, समाज सुधारक माता सावित्रीबाई फुले के संघर्षों को किया याद
चंदौली के चकिया में भारत की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की जयंती गौरवपूर्ण तरीके से मनाई गई। सैदूपुर के बुद्ध विहार में आयोजित इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने नारी शिक्षा और सामाजिक समानता के लिए उनके संघर्षों को याद करते हुए युवाओं से उनके पदचिन्हों पर चलने का आह्वान किया।
थम महिला शिक्षिका की जयंती
सैदूपुर बुद्ध विहार में कार्यक्रम
नारी शिक्षा और सामाजिक समानता
सावित्रीबाई फुले का महान संघर्ष
शिक्षा से सामाजिक परिवर्तन का संदेश
चंदौली जनपद की चकिया तहसील अंतर्गत सैदूपुर स्थित बुद्ध विहार महामाया सरोवर सेवा संस्थान के तत्वावधान में प्रथम महिला शिक्षिका और प्रखर समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले की जयंती अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई। बौद्ध मंदिर परिसर में आयोजित इस गरिमामयी कार्यक्रम में क्षेत्रीय महिलाओं और पुरुषों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की। कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ सावित्रीबाई फुले के चित्र पर माल्यार्पण और पुष्प अर्पित कर किया गया। इस दौरान उपस्थित जनसमूह ने उन्हें नारी शिक्षा की जननी बताते हुए उनके द्वारा समाज के लिए किए गए अतुलनीय योगदान को याद किया।
नारी शिक्षा और सामाजिक न्याय पर विचार
मुख्य वक्ता डॉ. बुद्ध प्रताप मौर्य ने सावित्रीबाई फुले के जीवन संघर्षों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने उस दौर में दलितों और महिलाओं की शिक्षा के लिए आवाज उठाई, जब समाज में शिक्षा प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती थी। उन्होंने माता सावित्रीबाई को सामाजिक समानता की नींव रखने वाली महान विभूति बताया। वहीं, संस्था के अध्यक्ष बलवंत कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली हथियार माना। उन्होंने महिलाओं को न केवल साक्षर बनाया बल्कि उन्हें आत्मनिर्भरता की नई दिशा भी प्रदान की, जिसका परिणाम आज समाज की हर शिक्षित महिला के रूप में दिखता है।
कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष की प्रेरणा
संदीप कुमार सिंह और रमेश कुमार ने युवा पीढ़ी को संबोधित करते हुए कहा कि सावित्रीबाई फुले का जीवन हमें अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। उन्होंने केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि उस समय व्याप्त छुआछूत और पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों के विरुद्ध भी सफल लड़ाई लड़ी। लालजी मौर्य ने कहा कि उनके द्वारा जलाई गई ज्ञान की ज्योति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी वह 19वीं शताब्दी में थी। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि उनके विचारों को केवल जयंती तक सीमित न रखकर जन-जन तक पहुँचाना अनिवार्य है ताकि समाज के वंचित वर्गों का वास्तविक उत्थान हो सके।
महिला वक्ताओं ने किया बदलाव का आह्वान
कार्यक्रम में मौजूद महिला वक्ताओं शकुंतला देवी, संगीता यादव और ज्योत्सना देवी ने सावित्रीबाई फुले को महिलाओं के सम्मान और अधिकारों का प्रतीक बताया। उन्होंने उपस्थित महिलाओं से अपील की कि वे शिक्षा को अपना सबसे मजबूत कवच बनाएं और समाज में व्याप्त भेदभाव के विरुद्ध एकजुट होकर आगे बढ़ें। कार्यक्रम के अंत में नंदलाल, पारस, दशरथ और बृजेश सहित कई अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। सभी ने एक स्वर में शिक्षा के माध्यम से सामाजिक समरसता स्थापित करने और सावित्रीबाई फुले के आदर्शों को दैनिक जीवन में उतारने का संकल्प लिया।