सपा के 5 और भाजपा के 10 साल में भी नहीं बदली शहाबगंज CHC की तस्वीर, 15 साल से अधूरा है 30 बेड का अस्पताल

 

चंदौली के शहाबगंज में 2 लाख की आबादी आज भी बदहाल स्वास्थ्य सुविधाओं से जूझ रही है। बसपा शासन में शुरू हुआ 30 बेड का अस्पताल 15 साल बाद भी अधूरा है, जिससे गंभीर मरीजों को रेफर होना पड़ता है।

 
 

शहाबगंज CHC का 15 साल से निर्माण अधूरा

2 लाख की आबादी को नहीं मिल रहा इलाज

गंभीर मरीज चकिया और वाराणसी जाने को मजबूर

सपा और भाजपा सरकार में नहीं हुआ सुधार

नेताओं के चुनावी वादे निकले पूरी तरह खोखले

चंदौली जिले में विकास के भले ही बड़े-बड़े दावे किए जाते हों, लेकिन शहाबगंज क्षेत्र का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) आज भी आधुनिक इलाज के लिए तरस रहा है। लगभग दो लाख की आबादी वाले इस पूरे इलाके के लोगों को छोटी-बड़ी बीमारियों के इलाज के लिए चकिया, जिला अस्पताल चंदौली या फिर बनारस भागना पड़ता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि समाजवादी पार्टी के 5 साल और भारतीय जनता पार्टी के 10 साल के शासन में भी इस अस्पताल की सूरत नहीं बदली।

15 साल से अधूरा लटका है 30 बेड का अस्पताल
शहाबगंज में 30 बेड के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का निर्माण बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के शासनकाल में शुरू हुआ था। लेकिन दुख की बात यह है कि 15 साल बीत जाने के बाद भी यह अस्पताल आज तक अधूरा पड़ा है। लोगों को उम्मीद थी कि भवन पूरा होने पर यहाँ विशेषज्ञ डॉक्टर बैठेंगे, आधुनिक जांच मशीनें आएंगी और गंभीर मरीजों का इलाज यहीं हो सकेगा। लेकिन वर्षों बाद भी यह उम्मीद सिर्फ एक सपना बनी हुई है।

धरना-प्रदर्शन के बाद भी सिर्फ मिले खोखले आश्वासन
अस्पताल के निर्माण को पूरा कराने के लिए स्थानीय जनता ने पहले कई बार धरना-प्रदर्शन भी किया। उस समय क्षेत्रीय नेताओं ने मंच से बड़े-बड़े आश्वासन दिए थे कि जल्द ही काम पूरा कराकर सभी सुविधाएं चालू कराई जाएंगी। हालांकि, चुनाव खत्म होते ही नेताओं के सारे वादे हवा में उड़ गए और अस्पताल की स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है।

रेफरल सेंटर बनकर रह गया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
अस्पताल अधूरा होने के कारण लोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के भरोसे रहना पड़ता है। किसी मरीज को गंभीर चोट लगे या कोई बड़ी बीमारी हो, यहाँ के डॉक्टर तुरंत हाथ खड़े करके मरीज को आगे के लिए रेफर कर देते हैं। आधुनिक जांच और लैब की सुविधा न होने के कारण गरीब मरीजों को प्राइवेट अस्पतालों में जाना पड़ता है, जिससे उन पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है।

मौसम बदलते ही बढ़ जाती है मरीजों की मुसीबत
बरसात और अन्य मौसम में जब डेंगू, मलेरिया और वायरल बुखार जैसी संक्रामक बीमारियां फैलती हैं, तब इस अस्पताल पर मरीजों का दबाव बहुत बढ़ जाता है। पर्याप्त डॉक्टर, दवाएं और जांच किट न होने से हर दिन सैकड़ों मरीज परेशान होते हैं। क्षेत्रवासियों की मांग है कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग तुरंत ध्यान देकर इस अस्पताल को सभी आधुनिक संसाधनों से लैस करे, ताकि दो लाख लोगों को भटकना न पड़े।