शहाबगंज PHC में 10 बजे तक खाली रहती हैं डॉक्टरों की कुर्सियां, भीषण गर्मी और उमस में तड़पते रहते हैं ग्रामीण मरीज
चंदौली के शहाबगंज पीएचसी में सरकारी आदेशों को ठेंगा दिखाकर सवा 10 बजे तक ओपीडी शुरू नहीं हो सकी। भीषण उमस और गर्मी के बीच डॉक्टर नदारद रहे और मरीज फर्श पर तड़पने को मजबूर हुए। पूरी ग्राउंड रिपोर्ट पढ़ें।
शहाबगंज पीएचसी में डॉक्टर नदारद
सुबह 10 बजे तक बंद ओपीडी
भीषण उमस में तड़पते रहे मरीज
शासन के कड़े निर्देश हुए हवा-हवाई
सीएमओ के दावों पर उठे सवाल
उत्तर प्रदेश शासन द्वारा सूबे की स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ करने और सुदूर ग्रामीण अंचलों तक बेहतर इलाज पहुंचाने के दावों को जमीनी स्तर पर पलीता लगाया जा रहा है। सरकार द्वारा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सुबह ठीक 8 बजे से अनिवार्य रूप से ओपीडी संचालित करने के स्पष्ट और कड़े निर्देश दिए गए हैं। इसके बावजूद, शुक्रवार को चंदौली जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) शहाबगंज में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह बेपटरी और बेदम नजर आईं।
इससे भी हैरान करने वाली बात यह रही कि सुबह के सवा 10 बजे तक चिकित्सा अधिकारी और डॉक्टर अपनी कुर्सियों से नदारद रहे, जिसके कारण ओपीडी सेवा शुरू नहीं हो सकी। इस घोर लापरवाही के चलते दूर-दराज के गांवों से इलाज की उम्मीद लेकर आए मरीज और उनके तीमारदार भीषण गर्मी और उमस में तड़पने को मजबूर दिखे।
धूप, उमस और बीमारी के बीच फर्श पर बैठने को मजबूर हुए ग्रामीण
सुबह-सुबह सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों से अस्पताल पहुंचे मरीजों को इलाज मिलना तो दूर, तेज धूप और उमस भरे माहौल में घंटों इंतजार की प्रताड़ना झेलनी पड़ी। अस्पताल परिसर में मरीजों की भारी भीड़ एकत्र हो गई थी, लेकिन वहां केवल अव्यवस्था का बोलबाला था। हालत इस कदर बदतर हो गई कि कई कमजोर और गंभीर मरीज अस्पताल के बरामदे की तपती जमीन और फर्श पर लेटने व बैठने को विवश दिखे। कुछ मरीज अत्यधिक गर्मी, उमस और शारीरिक कमजोरी के कारण परिसर में ही बदहवास स्थिति में नजर आए, लेकिन उन्हें समय पर प्राथमिक उपचार तक नसीब नहीं हो सका।
अस्पताल पहुंचे पीड़ित मरीजों में से अर्चना पाल, देवनाथ, नीलम, फिरोज और प्रीतम साहनी समेत दर्जनों तीमारदारों ने स्वास्थ्य प्रशासन के खिलाफ गहरा आक्रोश व्यक्त किया। मरीजों का कहना था कि सरकारी अस्पतालों की इस बदहाली के कारण सबसे ज्यादा मार गरीब और लाचार ग्रामीणों पर पड़ती है। समय पर डॉक्टरों के न मिलने से मजबूर होकर उन्हें निजी क्लीनिकों और डॉक्टरों का रुख करना पड़ता है, जिससे गरीब परिवार कर्ज और भारी आर्थिक बोझ के तले दब जाते हैं।
शासन के निर्देश केवल कागजों तक सीमित
स्थानीय ग्रामीणों और प्रबुद्ध वर्ग ने अस्पताल की इस अकर्मण्य कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। लोगों का सीधा आरोप है कि डॉक्टरों की देरी से आना और अपनी मर्जी से अस्पताल संचालित करना यहां की स्थायी नियति बन चुकी है। यदि शासन के कड़े निर्देशों के बाद भी समय पर ओपीडी नहीं खुल सकती, तो यह साफ है कि सरकारी आदेश केवल फाइलों और कागजों तक ही सीमित होकर रह गए हैं। नियमित रूप से बिगड़ती इस लचर व्यवस्था के कारण अब सरकारी स्वास्थ्य तंत्र पर से आम जनता का भरोसा लगातार उठता जा रहा है।
इस पूरे मामले पर जब मुख्य चिकित्साधिकारी (CMO) डॉ. वाई के राय से बात की गई, तो उन्होंने हमेशा की तरह डॉक्टरों की कमी का रोना रोया। उन्होंने स्टाफ की कमी को मुख्य समस्या बताते हुए जल्द ही यहाँ वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करने का रटा-रटाया आश्वासन दिया।
हालांकि, अब जिला प्रशासन पर यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि जब विभाग को डॉक्टरों की कमी की जानकारी पहले से थी, तो समय रहते पुख्ता रोस्टर या वैकल्पिक इंतजाम क्यों नहीं किए गए? घंटों धूप और उमस में बदहवास होने वाले इन गरीब मरीजों की पीड़ा का जिम्मेदार आखिर कौन है? क्षेत्रीय जनता ने मांग की है कि जब तक उच्चाधिकारी नियमित रूप से औचक निरीक्षण और जवाबदेही तय नहीं करेंगे, तब तक शहाबगंज पीएचसी की यह मनमानी बंद नहीं होगी।