सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी : अनुदेशकों को मिलेगा 17,000 मानदेय, अब नहीं जाएगी नौकरी

 

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अनुदेशकों के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ₹17,000 मानदेय और सेवा स्थायित्व को मंजूरी दे दी है। राज्य सरकार की याचिका खारिज होने से शिक्षा जगत में खुशी की लहर है।

 
 

सुप्रीम कोर्ट ने ₹17,000 मासिक मानदेय पर लगाई मुहर

10 साल की सेवा के बाद पद स्वतः सृजित माना जाएगा

अनुदेशकों की संविदा अब स्वतः समाप्त नहीं होगी

राज्य सरकार की चुनौती सुप्रीम कोर्ट में हुई खारिज

वाराणसी मंडल अध्यक्ष विकास यादव ने फैसले का किया स्वागत

चंदौली जिले के परिषदीय उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत हजारों अनुदेशकों के लिए न्याय की एक बड़ी किरण जगी है। सुप्रीम कोर्ट ने अनुदेशकों को नियमित माने जाने और उन्हें ₹17,000 मासिक मानदेय दिए जाने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इस निर्णय से वर्षों से संघर्ष कर रहे अनुदेशकों में खुशी की लहर दौड़ गई है और इसे उनके धैर्य की बड़ी जीत बताया जा रहा है।

नौकरी समाप्ति का डर हुआ खत्म
अनुदेशक संघ के वाराणसी मंडल अध्यक्ष विकास यादव ने फैसले का स्वागत करते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच ने बेहद महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। कोर्ट के अनुसार, संविदा की निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद भी अनुदेशकों की सेवाएं स्वतः समाप्त नहीं की जा सकतीं। लगातार दस वर्षों से संतोषजनक कार्य करने के कारण इन पदों को अब स्वतः सृजित माना जाएगा, जिससे अनुदेशकों के सिर पर लटक रही बेरोजगारी की तलवार हट गई है।

आर्थिक सशक्तिकरण और भविष्य की सुरक्षा
अनुदेशक संघ के जिलाध्यक्ष अभिनव सिंह ने कहा कि ₹17,000 मानदेय मिलने से अनुदेशक अब आर्थिक रूप से सशक्त होंगे। नियमितीकरण की दिशा में यह कदम उन्हें समाज में स्थायित्व और सम्मान प्रदान करेगा। उल्लेखनीय है कि अनुदेशक वर्ष 2013 से ही मानदेय बढ़ाने की मांग कर रहे थे। हाईकोर्ट ने पहले ही उनके पक्ष में फैसला दिया था, जिसे राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। अब शीर्ष अदालत ने सरकार की याचिका को खारिज कर अनुदेशकों के हक पर मुहर लगा दी है।

मिठाई खिलाकर मनाया जश्न
फैसले की सूचना मिलते ही शहाबगंज सहित पूरे जनपद के अनुदेशकों ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर बधाई दी। अनुदेशकों का कहना है कि यह केवल वेतन वृद्धि नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई थी जिसे न्यायपालिका ने स्वीकार किया है। इस फैसले से पूरे प्रदेश के हजारों अनुदेशकों का भविष्य अब सुरक्षित नजर आ रहा है।