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डॉ. विनय कुमार वर्मा की कलम से: केवल रंगों का खेल नहीं, अहंकार की राख से 'स्व' को जगाने का महापर्व है होली

फाल्गुन की विदाई और वसंत के आगमन के बीच होली का पर्व मानवीय चेतना के पुनर्जन्म का उत्सव है। असुरराज हिरण्यकशिपु के अहंकार के अंत और प्रह्लाद की अटूट भक्ति की यह विजय गाथा हमें सिखाती है कि कैसे बुराई को जलाकर ही सद्भाव के रंग खिलते हैं।

 
 

शीत की विदाई और वसंत का अद्भुत संगम

असुरराज हिरण्यकशिपु के अहंकार का अंत

होलिका दहन यानी बुराई पर अच्छाई की जीत

विज्ञान और संस्कृति का अनोखा समन्वय

धर्म और लोक चेतना को जोड़ता महापर्व

फाल्गुन की अंतिम साँसों में जब शीत ऋतु की ठिठुरन ढलती है और वसंत अपनी कोमल उँगलियों से पृथ्वी का मुख सहलाता है, तब भारतीय जीवन में एक ऐसा पर्व आता है जो केवल तिथि नहीं, बल्कि मनुष्य की संपूर्ण चेतना का उत्सव बन जाता है- होली। यह केवल रंगों का खेल नहीं, यह समय की राख से उठती हुई अग्नि है; यह खेतों की बालियों की हँसी है; यह पुराणों की कथाओं का जीवंत अभिनय है; यह समाज की जड़ताओं को पिघलाने वाली ऊष्मा है; यह विज्ञान, इतिहास और संस्कृति का अद्भुत समन्वय है। होली भारतीय सभ्यता के उन कुछ पर्वों में है जो धर्म, लोक, विज्ञान और मनोविज्ञान- सभी को एक साथ बाँधते हैं।
          
 होली का पौराणिक आधार हमें सीधे ले जाता है उस कथा की ओर जिसमें असत्य की जिद और सत्य की निष्ठा आमने-सामने खड़ी होती है। असुरराज हिरण्यकशिपु की कथा केवल एक दैत्य की कथा नहीं, वह अहंकार की पराकाष्ठा का प्रतीक है। उसने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया, और अपने ही पुत्र प्रह्लाद की भक्ति को विद्रोह मान लिया। जब सभी प्रयास विफल हुए तो उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह अग्नि में बैठकर प्रह्लाद को जला दे। किंतु नियति ने उलट दिया समीकरण- अग्नि ने भक्त को बचा लिया और दुरभिमान की राख उड़ गई। इसीलिए होली की पूर्व संध्या पर ‘होलिका दहन’ होता है- यह केवल लकड़ियों का दहन नहीं, बल्कि अहंकार, अन्याय और अत्याचार का दहन है।

इस कथा का आध्यात्मिक संकेत यह है कि अग्नि केवल जलाती नहीं, वह शुद्ध भी करती है। भारतीय चिंतन में अग्नि साक्षी है, यज्ञ का माध्यम है, संस्कार का आधार है। होलिका दहन उस वैदिक परंपरा का भी विस्तार है जिसमें अग्नि के माध्यम से नकारात्मकता का विसर्जन किया जाता है।
            
होली का एक अन्य पौराणिक आयाम वृंदावन और ब्रजभूमि की गलियों में खिलता है। जब कृष्ण की श्यामल छवि और राधा की गौरिमा मिलती है, तब रंग केवल गुलाल नहीं रहता, वह प्रेम का प्रतीक बन जाता है। ब्रज की लठमार होली, बरसाने की फाग, नंदगाँव की हँसी- ये सब उस दिव्य प्रेम की लोक-अभिव्यक्तियाँ हैं जिसमें संकोच नहीं, सहजता है। यहाँ रंग देह पर नहीं, मन पर चढ़ता है।
              
इतिहास के पन्नों में देखें तो होली का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों और अभिलेखों में मिलता है। गुप्तकालीन शिलालेखों में ‘वसंतोत्सव’ का वर्णन है। मध्यकालीन भक्ति साहित्य में सूर, मीराँ, विद्यापति और रसखान ने होली को प्रेम और भक्ति का रंग दिया। मुगल काल में भी होली का उल्लास दरबार तक पहुँचा। कहा जाता है कि अकबर ने जोधा बाई के साथ रंग खेला और जहाँगीर के समय होली का चित्रांकन हुआ। यह पर्व केवल किसी एक मत का नहीं रहा;  यह सामाजिक समन्वय का उत्सव बना।
         
सिख परंपरा में भी होली का विशेष स्थान है। गुरु गोविंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में ‘होला मोहल्ला’ की परंपरा आरंभ की, जहाँ वीरता, शौर्य और आध्यात्मिकता का संगम हुआ। इस प्रकार होली केवल रंगों की उछाल नहीं, आत्मबल का भी उत्सव है।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो होली का समय अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह वह काल है जब ऋतु परिवर्तन के कारण शरीर में संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है। सरसों का उबटन देह पर लगाया जाता है। उसकी उष्ण सुवास रक्त को जगाती है, कफ को पिघलाती है, और जब वह होलिका की ज्वाला में समर्पित होता है, तो मानो भीतर की जड़ता, रोग अग्नि को अर्पित हो जाते हैं।

परंपरागत रूप से होलिका दहन की अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करने और उसकी राख को लगाने की परंपरा रही है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अग्नि की ऊष्मा वातावरण में उपस्थित कुछ हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करती है। पुरानी ग्रामीण परंपराओं में प्राकृतिक रंग- टेसू के फूल, हल्दी, चंदन, नीम, कचनार का प्रयोग होता था। ये रंग त्वचा के लिए औषधीय थे। टेसू के फूलों में त्वचा रोगों से बचाव के गुण हैं, हल्दी एंटीसेप्टिक है, नीम जीवाणुनाशक है।
       
मनोवैज्ञानिक रूप से भी होली अत्यंत अर्थपूर्ण है। वर्ष भर संचित तनाव, सामाजिक दूरी, वर्ग-भेद- इन सबको तोड़ने का अवसर होली देती है। जब कोई व्यक्ति अपने वरिष्ठ पर भी रंग डाल सकता है और वह मुस्कराकर स्वीकार करता है, तब सामाजिक संरचनाओं में लचीलापन आता है। रंग मनुष्य के भीतर छिपे बालक को बाहर लाते हैं।
          
समाजशास्त्रीय दृष्टि से होली सामूहिकता का पर्व है। गाँवों में होलिका दहन के लिए सभी घरों से लकड़ी इकट्ठी होती है- यह सामूहिक भागीदारी का प्रतीक है। होली के गीतों में व्यंग्य, हास्य, यहाँ तक कि सामाजिक आलोचना भी होती है। फाग और होरियों में राजा से लेकर साधारण व्यक्ति तक सब पर कटाक्ष होता है। यह एक ऐसा दिन है जब समाज अपनी आंतरिक गाँठों को हँसी के माध्यम से खोलता है।
          
कृषि से जुड़ा इसका आयाम भी महत्वपूर्ण है। फाल्गुन और चैत्र के बीच रबी की फसल पकने लगती है। किसान के लिए यह परिश्रम के फल का समय है। नई बालियों को अग्नि में भूनकर खाने की परंपरा- ‘नई फसल का स्वागत’, कृषि संस्कृति की स्मृति है। होली इसीलिए ग्रामीण भारत में अधिक आत्मीय लगती है, क्योंकि वहाँ यह सीधे खेतों की धड़कन से जुड़ी है।
            
साहित्य में होली का वर्णन केवल उल्लास का नहीं, विरह का भी है। मीराँ की होली में कृष्ण की प्रतीक्षा है; सूरदास की होली में राधा-कृष्ण का रंग है; कबीर की होली में आत्मा और परमात्मा का मिलन है। “होली खेलूँगी कहि बिनु पिया” जैसे पदों में विरह और मिलन का अद्भुत संगम है। 

आधुनिक युग में होली ने अनेक रूप बदले हैं। शहरीकरण ने इसे पानी की पिचकारियों और रासायनिक रंगों तक सीमित करने का प्रयास किया, किंतु धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ी है। आज लोग फिर से प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं। जल-संरक्षण की चिंता भी होली को संयम सिखा रही है। राजनीतिक और राष्ट्रीय आंदोलनों में भी होली का प्रयोग प्रतीक के रूप में हुआ। स्वतंत्रता संग्राम के समय कई कवियों ने विदेशी शासन को ‘होलिका’ कहा और स्वराज को ‘प्रह्लाद’। होली का रंग तब राष्ट्रीय चेतना का रंग बन गया।
         
होली का एक सूक्ष्म आध्यात्मिक पक्ष भी है। यह हमें सिखाती है कि जीवन रंगों का मिश्रण है- केवल श्वेत या श्याम नहीं। सुख-दुख, हानि-लाभ, जय-पराजय- सब मिलकर जीवन का इंद्रधनुष बनाते हैं। होली का संदेश है कि यदि भीतर प्रेम है तो हर रंग सुंदर है; यदि भीतर द्वेष है तो हर रंग मैला है।
                  
भारत के विभिन्न प्रदेशों में होली के विविध रूप हैं- मथुरा की फूलों की होली, कुमाऊँ की बैठकी होली, बंगाल की डोल पूर्णिमा, महाराष्ट्र की रंगपंचमी, दक्षिण भारत में कामदेव-दहन की स्मृति। इन सबमें एक सूत्र है- नवजीवन का स्वागत।
                    
 होली यह भी सिखाती है कि अग्नि के बिना रंग नहीं। पहले होलिका दहन, फिर रंगोत्सव। पहले भीतर की अशुद्धि का त्याग, फिर बाहर की प्रसन्नता। यह क्रम अत्यंत अर्थपूर्ण है।
           
आज जब समाज अनेक प्रकार के तनावों से गुजर रहा है- धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक- तब होली हमें स्मरण कराती है कि  मनुष्य का मूल स्वभाव उत्सवधर्मी है। रंगों से भीगा चेहरा पहचान नहीं पूछता; वह केवल मुस्कान पहचानता है। होली के दिन जब बच्चे उन्मुक्त हँसी हँसते हैं, जब वृद्ध भी स्मृतियों में भीगते हैं, जब लोग फाग गाते हैं, जब ढोलक की थाप पर कदम थिरकते हैं- तब लगता है कि यह पर्व केवल कैलेंडर का नहीं, आत्मा का है।
            
होली एक प्रश्न भी है- क्या हमने सचमुच अपने भीतर की होलिका को जला दिया? क्या हमने अपने अहंकार, अपने क्रोध, अपने संकीर्ण विचारों को अग्नि में समर्पित किया? यदि नहीं, तो रंग केवल बाहरी आडंबर रह जाएगा।
      
होली का सच्चा अर्थ है- अग्नि से शुद्धि, रंग से प्रेम, हँसी से मुक्ति और समर्पण से शांति। यही कारण है कि सदियों से यह पर्व भारतीय मानस में जीवित है और आगे भी रहेगा।
             
जब तक पृथ्वी पर वसंत आएगा, जब तक खेतों में नई बालियाँ झूमेंगी, जब तक मनुष्य प्रेम और प्रकाश की खोज करेगा- तब तक होली केवल एक त्योहार नहीं, जीवन का घोष रहेगी।

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