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हिंदी पत्रकारिता दिवस: 'उदंत मार्तंड' से सोशल मीडिया युग तक, मिशन से फैशन बनने की पूरी कहानी डॉ. विनय कुमार वर्मा की कलम से

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर जानिए कैसे स्वतंत्रता आंदोलन का 'मिशन' आज डिजिटल युग का 'फैशन' बन गया है। सोशल मीडिया और सनसनी के इस दौर में विश्वसनीयता, गिरते भाषाई स्तर और पत्रकारिता के नैतिक संकट पर एक जरूरी आत्ममंथन।
 

उदंत मार्तंड से डिजिटल मीडिया का सफर

संपादकीय ढांचे और स्वयंभू पत्रकारिता का अंतर

सत्य की जगह लेती सनसनीखेज खबरें

लोकतंत्र में सूचित नागरिकों की बड़ी भूमिका

सोशल मीडिया पर सूचनाओं की बढ़ती अराजकता

कभी हमारे देश की सुबह चाय की गर्माहट और अखबार की सरसराहट के साथ शुरू होती थी। दरवाज़े पर आने वाला अखबार सिर्फ एक कागज का पुलिंदा नहीं था, बल्कि वह देश-दुनिया की धड़कन हुआ करता था। उसमें समाज का विवेक, देश की बेचैनी, राजनीति की उठापटक और आम जनमानस की आकांक्षाएं साफ दिखाई देती थीं। किसी गांव में जब पहला अखबार पहुंचता था, तो उसे एक व्यक्ति पढ़ता था और दसों लोग घेरकर सुनते थे। उन दिनों शब्दों में एक वजन होता था और समाचार सिर्फ सूचनाएं नहीं, बल्कि समाज में नए विचार पैदा करते थे।

मिशन से प्रोफेशन तक: 'उदंत मार्तंड' और गौरवशाली इतिहास
भारत में हिंदी पत्रकारिता का सफर 'उदंत मार्तंड' से शुरू हुआ, जो केवल एक समाचार पत्र का जन्म नहीं था बल्कि भाषाई चेतना का शंखनाद था। 30 मई 1826 को जब पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने इस पहले हिंदी पत्र का संपादन किया, तब पत्रकारिता एक पवित्र मिशन थी। गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे महान संपादकों के लिए यह एक साधना थी, जिन्होंने जेल जाना और आर्थिक संकट सहना स्वीकार किया पर कलम नहीं बेची। समय बदला और यह मिशन धीरे-धीरे प्रोफेशन में तब्दील हो गया, जिससे तकनीक और संसाधन तो बढ़े लेकिन पत्रकारिता की नैतिक आत्मा कहीं कमजोर होने लगी।

सोशल मीडिया का विस्फोट और स्वयंभू पत्रकारिता का उदय
आज के दौर में सोशल मीडिया के विस्फोट ने सूचना तंत्र की पूरी परिभाषा और संरचना को ही बदलकर रख दिया है। अब खबरें जानने के लिए अगले दिन के अखबार का इंतजार नहीं करना पड़ता, बल्कि हर हाथ में मौजूद मोबाइल खुद में एक मीडिया हाउस बन चुका है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर) और यूट्यूब ने सूचनाओं के प्रसारण को लोकतांत्रिक और बेहद तेज तो बना दिया है, लेकिन इसके साथ ही एक गंभीर संकट भी खड़ा हो गया है। आज बिना किसी प्रशिक्षण, भाषाई मर्यादा और तथ्यों की पुष्टि के कैमरे के सामने खड़े हो जाना ही पत्रकारिता मान लिया गया है, जिससे सूचनाओं में अराजकता बढ़ गई है।

संपादकीय ढांचा बनाम बिना फिल्टर की डिजिटल दुनिया
संस्थागत मीडिया और आज की स्वयंभू डिजिटल पत्रकारिता के बीच सबसे बड़ा अंतर जिम्मेदारी और जवाबदेही के स्तर पर दिखाई देता है। पारंपरिक अखबारों और बड़े चैनलों के पास एक सुदृढ़ संपादकीय ढांचा, रिपोर्टर्स, डेस्क और फैक्ट-चेक टीम होती है, जहां खबरें कई फिल्टर से गुजरकर जिम्मेदारी के साथ सामने आती हैं। इसके विपरीत, सोशल मीडिया आधारित पत्रकारिता में कोई फिल्टर नहीं होता; वहां व्यक्ति खुद ही रिपोर्टर, संपादक और न्यायाधीश बन बैठता है। नतीजा यह होता है कि आधी-अधूरी जानकारियां और अफवाहें बहुत आसानी से समाज में सच बनकर तैरने लगती हैं।

भाषा का गिरता स्तर और मानवीय संवेदनाओं का बाजारीकरण
मौजूदा दौर में सबसे ज्यादा नुकसान पत्रकारिता की भाषा और मानवीय संवेदनाओं को उठाना पड़ा है। जो पत्रकारिता कभी भाषा की संरक्षक हुआ करती थी, आज वहां उत्तेजना फैलाने वाले शब्दों और अपमानजनक शैली का प्रयोग आम हो चुका है। किसी हादसे में घायल तड़पता हुआ व्यक्ति भी आज कई डिजिटल मंचों के लिए केवल एक 'कंटेंट' बनकर रह गया है। मानवीय त्रासदियों और लोगों के दुखों को व्यूज व लाइक्स में बदला जा रहा है, जो पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के बिल्कुल खिलाफ है।

विवेक की आवश्यकता: क्या होगा पत्रकारिता का भविष्य?
यह भी सच है कि नागरिक पत्रकारिता और सोशल मीडिया ने उन आवाजों को मंच दिया है जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया दबा देता था। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जब तक जिम्मेदारी नहीं जुड़ेगी, तब तक यह स्वतंत्रता अराजकता फैलाती रहेगी। आज पत्रकारिता मिशन, प्रोफेशन, पैशन और फैशन के एक अजीब त्रिकोण में फंस चुकी है, जहां लोग सिर्फ फॉलोअर्स बढ़ाने और वायरल होने के लिए पत्रकार बन रहे हैं। पत्रकारिता का भविष्य मशीनों या आधुनिक कैमरों से नहीं, बल्कि इंसानी विवेक, सत्य की खोज और समाज के प्रति अटूट जवाबदेही से ही सुरक्षित रह सकता है।

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