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क्या आपकी खुशियों को खा रहा है बीता हुआ कल? तनाव मुक्त जीवन जीने के लिए बदलें अपना नजरिया

क्या आप भी "मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?" सोचकर परेशान रहते हैं? जानिए डॉ. विनय कुमार वर्मा का वह जादुई जीवन सूत्र जो आपके मन की सारी शिकायतों को दूर कर जीवन में सच्ची शांति और नया सवेरा ला सकता है।

 
 

परिस्थितियों को स्वीकार करना सीखें

अतीत से लड़ना छोड़ दे मनुष्य

नदी की तरह बहना सीखें आप

चोट से ही बनती है मूर्ति

दृष्टिकोण बदलने से बदलेगा संसार

हम सब अपने जीवन में किसी न किसी बात को लेकर परेशान रहते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे दुखों की असली वजह क्या है? असल में मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा और कठिन संघर्ष सामने खड़ी परिस्थितियों से नहीं होता, बल्कि उन परिस्थितियों को दिल से स्वीकार करने में होता है. हम असल जिंदगी में घटने वाली घटनाओं से उतना दुखी नहीं होते, जितना उनके बारे में सोच-सोचकर और कल्पना कर-करके खुद को परेशान करते रहते हैं।

हमारा मन आज में जीने के बजाय हमेशा इस उलझन में फंसा रहता है कि "आखिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?" या "ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए था"। ये सवाल हमारे दिमाग में चौबीसों घंटे चलते रहते हैं और हमें अंदर ही अंदर कमजोर करते हैं। अगर हम गहराई से सोचें, तो हमारे जीवन की सबसे बड़ी साधना और सुख बस इसी एक छोटे से वाक्य में छिपा है कि "जो घट रहा है, वही घटित होना था"।

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भाग्यवाद नहीं, यह तो समझदारी की बात है
जब कोई पहली बार इस बात को सुनता है, तो उसे लग सकता है कि यह तो भाग्य के भरोसे बैठने वाली बात है। लेकिन ठहरिए, यह भाग्यवाद बिल्कुल नहीं है। यह तो जीवन को देखने का एक बहुत ही परिपक्व और समझदारी भरा नजरिया है। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि आप मेहनत करना छोड़ दें, कोशिश करना बंद कर दें या किसी गलत बात के आगे चुपचाप घुटने टेक दें।

इसका सीधा और साफ मतलब सिर्फ इतना है कि जो पल बीत चुका है, जो बात कल हो चुकी है, उसे आप आज बैठकर बदल नहीं सकते। बीती हुई घटना के साथ मन ही मन युद्ध करने के बजाय समझदारी इसी में है कि हम उससे एक अच्छी सीख लें और अपने आने वाले कल को बेहतर बनाने में अपनी पूरी ताकत लगा दें।

अतीत के बोझ को कब तक ढोएंगे?
हमारा असली दुर्भाग्य यह है कि हम बीती हुई बुरी बातों को अपने दिमाग में बार-बार याद करके जिंदा रखते हैं। हम उस बीते हुए समय को बदलने की जिद पर अड़े रहते हैं, जिसे खुद समय का पहिया भी कभी पीछे घुमाकर बदल नहीं सकता। जरा सोचिए, एक किसान अपने खेत में बीज बोता है। अगर समय पर बारिश हो जाए तो वह बहुत खुश होता है और अगर सूखा पड़ जाए तो वह परेशान हो जाता है। लेकिन वह किसान अच्छी तरह जानता है कि खेत पर बैठकर रोने से सूखी फसल फिर से हरी नहीं होने वाली। इसलिए वह बिना समय गंवाए अगले मौसम की नई तैयारी में जुट जाता है। हमें भी उस किसान से यह बात सीखनी चाहिए कि नुकसान पर आंसू बहाने से बेहतर है कि आगे बढ़ा जाए।

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प्रकृति से सीखें आगे बढ़ने का हुनर
प्रकृति का हर एक तत्व हमें आगे बढ़ना सिखाता है। बहती हुई नदी को ही देख लीजिए। उसके रास्ते में जब कोई बड़ी चट्टान या पत्थर आता है, तो वह उससे लड़ने में अपना समय बर्बाद नहीं करती। वह चुपचाप उस चट्टान से टकराकर बगल से अपना नया रास्ता बना लेती है और आगे बढ़ जाती है। वह कभी इस बात की शिकायत नहीं करती कि मेरे सुंदर रास्ते में यह पत्थर क्यों आ गया। वह बहना नहीं छोड़ती और इसी वजह से एक दिन वह सागर से जाकर मिल जाती है।

प्रकृति की कोई भी चीज अपने अतीत से कभी लड़ाई नहीं करती, केवल एक इंसान ही है जो सालों पुरानी बातों को लेकर बैठा रहता है। हममें से कितने लोग ऐसे हैं जो सालों पुरानी किसी कड़वी बात को आज भी अपने सीने से लगाए बैठे हैं। किसी ने कभी हमारा अपमान किया था, किसी ने हमारा भरोसा तोड़ा था, या कभी हमें किसी काम में असफलता मिली थी। वह घटना कब की खत्म हो गई, दुनिया आगे निकल गई, लेकिन हम आज भी मन से उसी पुरानी जगह पर खड़े हैं। हमारा शरीर तो आज में रहता है, पर हमारा मन अतीत की गलियों में भटकता रहता है और यही हमारे सारे दुखों की जड़ है।

भगवद्गीता और भगवान श्रीकृष्ण का संदेश
जब हम धर्मग्रंथों को देखते हैं, तो भगवद्गीता में भी यही बात बहुत ही सुंदर तरीके से समझाई गई है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध के मैदान में कर्म करने के लिए कहते हैं, लेकिन उससे पहले वे अर्जुन के मन में बैठे मोह और डर को पूरी तरह खत्म करते हैं। वे अर्जुन को काम करने से नहीं रोकते, बल्कि काम के बाद मिलने वाले परिणाम की चिंता से मुक्त करते हैं।

श्रीकृष्ण का संदेश बिल्कुल साफ है कि कर्म करना पूरी तरह से तुम्हारे हाथ में है, लेकिन उसका नतीजा क्या होगा, यह तुम्हारे हाथ में नहीं है। और जो भी परिणाम हमारे सामने आता है, वह उस समय के सारे हालातों का एक स्वाभाविक निचोड़ होता है। जीवन का भी यही नियम है, हम अपनी तरफ से अच्छे कर्म तो चुन सकते हैं, लेकिन अपनी मर्जी का परिणाम नहीं चुन सकते।

टूटना भी कई बार नई शुरुआत का कारण बनता है
महात्मा बुद्ध ने भी इसी बात को समझाते हुए कहा था कि यह संसार अनित्य है, यानी यहाँ कुछ भी हमेशा के लिए टिकने वाला नहीं है। न आज का सुख हमेशा रहेगा और न ही आज का दुख हमेशा टिकेगा। जब सफलता और असफलता दोनों ही स्थायी नहीं हैं, तो फिर हम किसी एक मोड़ या एक घटना को ही अपने जीवन का आखिरी सच क्यों मान बैठते हैं? कबीरदास जी ने भी एक जगह कहा था कि जो अपना पुराना घर फूंकने को तैयार हो, वही सच्चे ज्ञान के रास्ते पर हमारे साथ चल सकता है।

यहाँ घर का मतलब मिट्टी-ईंट की दीवारों से नहीं है, बल्कि हमारे भीतर बने अहंकार, उम्मीदों और झूठी कल्पनाओं के घर से है। जब जिंदगी की परिस्थितियां हमारे इन झूठे घरों को तोड़ती हैं, तो हमें लगता है कि सब कुछ लुट गया। लेकिन कई बार वही टूटन हमें उस कड़वे सच से मिलाती है, जहाँ से हमारे असली और सच्चे जीवन की शुरुआत होती है।

बीते दिनों के दुख आज क्यों लगते हैं वरदान?
जरा ठहरिए और शांति से अपने गुजरे हुए कल को याद कीजिए। जीवन की ऐसी कितनी घटनाएं होंगी जो उस समय आपको बेहद दुखद और दर्दनाक लगी थीं, लेकिन आज जब आप उनके बारे में सोचते हैं, तो वे आपको एक वरदान जैसी लगती हैं। किसी नौकरी का न मिलना कभी आपके लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप जैसा लगा था, लेकिन आज आप देखते हैं कि उसी वजह से आपके लिए किसी बहुत बेहतर काम का रास्ता खुला।

किसी इंसान का साथ छूटना कभी ऐसा लगा था जैसे अब जिंदगी ही खत्म हो गई, लेकिन आज आप समझ पाते हैं कि उसी जुदाई ने आपको अपने पैरों पर खड़ा होना और आत्मनिर्भर बनना सिखाया। जिस हार ने कभी आपको पूरी तरह रुला दिया था, उसी हार ने आगे चलकर आपको बड़ी जीत का रास्ता दिखाया। तब जाकर हमें समझ आता है कि उस वक्त जो कुछ भी हमारे साथ घटा था, शायद वही होना हमारे भविष्य के लिए सबसे ज्यादा जरूरी था।

हर फैसले का तुरंत न्याय करना जरूरी नहीं
समय की जो नजर होती है, वह हम इंसानों की छोटी सोच से कहीं ज्यादा बड़ी और व्यापक होती है। इसलिए जीवन में घटने वाली हर एक घटना का तुरंत फैसला करने की कोशिश मत कीजिए। कुछ फैसलों को वक्त की अदालत पर छोड़ देना चाहिए। जिंदगी अपने बहुत से सवालों के जवाब खुद ब खुद समय आने पर दे देती है। कुछ बातों के गहरे मतलब सालों बाद समझ आते हैं और आज का जो दर्द है, वह कई बार भविष्य में एक बड़ा आशीर्वाद बनकर सामने आता है।

हम इंसानों का काम सिर्फ इतना है कि हम अपनी तरफ से पूरी ईमानदारी के साथ श्रेष्ठ कर्म करते रहें। परिणाम को गढ़ने का काम समय का है। जब हमारे कर्म और समय के बीच एक अटूट विश्वास बन जाता है, तो हमारे मन के अंदर एक कमाल की शांति का जन्म होता है। फिर जिंदगी से हमारी शिकायतें धीरे-धीरे कम होने लगती हैं और जो जैसा है, उसे स्वीकार करने की हमारी ताकत बढ़ने लगती है।

क्या हम वाकई अपनी परिस्थितियों के मालिक हैं?
इंसान का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह खुद को अपनी जिंदगी की हर एक घटना का मालिक समझ लेता है। हमें लगता है कि जैसी प्लानिंग हमने कागज पर की है, बिल्कुल वैसा ही होगा। जो हम चाहेंगे, वही हमें मिलकर रहेगा और जिसे हम रोकना चाहेंगे, उसे हम अपनी मर्जी से रोक लेंगे। लेकिन जिंदगी हमें हर मोड़ पर यह सिखाती है कि इंसान को सिर्फ कोशिश करने का अधिकार है, वह परिस्थितियों को अपनी उंगलियों पर नचाने वाला निर्माता नहीं बन सकता।

कितनी ही बार ऐसा हुआ है कि हमने जिस रास्ते को अपनी जिंदगी की आखिरी मंजिल मान लिया था, समय ने हमें वहां से हटाकर किसी बिल्कुल नए रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया। उस समय हम बहुत रोए, भगवान से शिकायतें कीं और अपनी किस्मत को कोसा। लेकिन सालों बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो दिल से आवाज आती है कि अगर उस दिन वह बुरी घटना न घटी होती, तो आज हम इस खूबसूरत मुकाम पर कभी नहीं पहुंच पाते।

मूर्तिकार की चोट और पत्थर का दर्द
एक मूर्तिकार जब किसी साधारण पत्थर को सुंदर मूर्ति बनाने के लिए उस पर हथौड़े से चोट करता है, तो उस पत्थर को बहुत तेज दर्द होता होगा। अगर वह पत्थर बोल पाता, तो वह रोते हुए मूर्तिकार से जरूर पूछता कि "तुम मुझे इस तरह बार-बार क्यों तोड़ रहे हो और मुझे इतनी चोट क्यों दे रहे हो?" लेकिन वह मूर्तिकार अच्छी तरह जानता है कि वह उस पत्थर को बर्बाद नहीं कर रहा है, बल्कि वह तो उस पत्थर के अंदर छिपी हुई एक बेहद खूबसूरत भगवान की मूरत को बाहर निकाल रहा है।

हमारा जीवन भी बिल्कुल उसी मूर्तिकार की तरह है। कई बार जिंदगी हमारे छोटे-छोटे सपनों को बेरहमी से तोड़ देती है ताकि वह हमारे भीतर एक मजबूत और शानदार व्यक्तित्व को गढ़ सके। वह हमारी बनाई योजनाओं को बदल देती है ताकि दुनिया को देखने का हमारा नजरिया बदल सके। वह हमें कई बार बिल्कुल अकेला कर देती है ताकि हम दुनिया की भीड़ से हटकर खुद अपनी आत्मा से मिल सकें।

खोना भी असल में एक नया सृजन ही है
प्रकृति का यह शाश्वत नियम है कि अगर पतझड़ का मौसम न आए, तो पेड़ों पर हरी-भरी नई पत्तियां कभी नहीं आ सकतीं। एक छोटा सा बीज जब तक मिट्टी के अंदर दबकर अपने पुराने वजूद को नहीं खो देता, तब तक वह एक विशाल और फलदार वृक्ष नहीं बन सकता। आसमान के बादल जब तक खुद को पूरी तरह मिटाकर बारिश में नहीं बदल लेते, तब तक सूखी धरती की प्यास कभी नहीं बुझ सकती। प्रकृति का हर एक बदलाव चीख-चीखकर हमें यही सिखाता है कि किसी चीज का खो जाना भी असल में एक नई और सुंदर चीज के बनने की शुरुआत होती है।

पर दिक्कत यह है कि हम इंसान सिर्फ कुछ पाने की खुशी मनाना जानते हैं, हम किसी भी तरह के नुकसान या हानि को गले नहीं लगा पाते। जबकि हकीकत तो यह है कि जिंदगी की सबसे बड़ी और सच्ची सीख हमें हमारी जीतों से नहीं, बल्कि हमारे नुकसान और हमारी हार से ही मिलती है।

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं
जिस इंसान ने अपने पूरे जीवन में कभी असफलता का कड़वा स्वाद नहीं चखा, वह कभी भी सफलता की असली कीमत और उसकी खुशी को नहीं समझ सकता। जिसने कभी किसी अपने से दूर होने का दर्द नहीं सहा, वह कभी भी सच्चे प्रेम की गहराई और उसकी अहमियत को महसूस नहीं कर सकता। ठीक इसी तरह, जिसने कभी अपनी जिंदगी में कड़ा संघर्ष नहीं किया, वह किसी बड़ी उपलब्धि के मिलने पर मिलने वाले असली आनंद को कभी नहीं जान सकता। इसलिए यह जिंदगी सिर्फ सुख की पाठशाला नहीं है, यह हमें दुख के कड़वे घूंट पिलाकर भी बहुत बड़ी-बड़ी शिक्षाएं देती है।

हमारी सबसे बड़ी गलती यह होती है कि हम हर बात को सिर्फ नफे और नुकसान के तराजू में तौलते हैं। हम पूछते हैं कि इसमें मेरा क्या फायदा हुआ, जबकि जिंदगी हमसे पूछती है कि इस परिस्थिति से गुजरने के बाद तुम अंदर से कितने मजबूत इंसान बने। घटना का महत्व उतना नहीं होता, जितना उस घटना के बाद हमारे भीतर आने वाले बदलाव का होता है।

शिकायत से कृतज्ञता का सफर
मान लीजिए कि किसी व्यक्ति ने सबके सामने आपका बहुत बड़ा अपमान कर दिया। अब आपके पास यहाँ से आगे बढ़ने के दो बिल्कुल अलग रास्ते हैं। पहला रास्ता तो यह है कि आप जिंदगी भर उस अपमान की आग में जलते रहें, उस इंसान से नफरत करते रहें और अपना आज बर्बाद करते रहें। और दूसरा रास्ता यह है कि आप उस अपमान को एक चुनौती की तरह लें और अपने व्यक्तित्व को इतना मजबूत और सफल बना लें कि सामने वाले का सिर खुद ब खुद झुक जाए।

घटना बिल्कुल एक ही है, लेकिन उसका परिणाम पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि आपने कौन सा रास्ता चुना। इसलिए जिंदगी बार-बार कहती है कि हालात को बदलने की जिद छोड़ने के बजाय अपनी देखने की नजर को बदलो। जब आपकी दृष्टि बदलती है, तो आपके सामने यह पूरी दुनिया अपने आप बदली हुई नजर आने लगती है।


वक्त की यूनिवर्सिटी और उम्र का तजुर्बा
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, हम जिंदगी के एक ऐसे मोड़ पर आ जाते हैं जहाँ हमारे दिमाग में उठने वाले फालतू के सवाल कम होने लगते हैं और हमारे खुद के अनुभव ज्यादा बोलने लगते हैं। अपनी जवानी के दिनों में हम हर एक छोटी बात का कारण ढूंढना चाहते हैं, हमें हर सवाल का जवाब तुरंत चाहिए होता है और हम अपनी हर एक पीड़ा का हिसाब मांगते हैं। लेकिन समय की जो यूनिवर्सिटी है, वह बहुत ही अनोखी है। यहाँ पढ़ाई पूरी होने पर कोई कागजी डिग्री नहीं मिलती, बल्कि जिंदगी को देखने की एक साफ और सच्ची नजर मिलती है।


वक्त हमें सिखाता है कि जीने के लिए हर एक सवाल का जवाब मिलना जरूरी नहीं है, कुछ उलझनों के जवाब तो सिर्फ समय के साथ जीते-जीते अपने आप मिल जाते हैं। यही वजह है कि घर का कोई बुजुर्ग व्यक्ति बहुत कम बोलता है। उसने जिंदगी को किताबों के पन्नों से कम और जिंदगी के उतार-चढ़ाव वाले थपेड़ों से ज्यादा सीखा होता है। वह जानता है कि चाहे कितना भी बड़ा तूफान क्यों न हो, वह हमेशा नहीं रुकने वाला और वसंत की बहार भी हमेशा नहीं रहने वाली।

स्वीकार करने का मतलब हार मान लेना नहीं है
बहुत से लोग सोचते हैं कि परिस्थितियों को स्वीकार कर लेने का मतलब है कि हम जिंदगी से हार गए। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। स्वीकार करने का असली मतलब यह होता है कि जो चीज अब किसी भी कीमत पर बदली नहीं जा सकती, उसके पीछे सिर पटककर और रो-रोकर अपनी कीमती ऊर्जा और समय को बर्बाद न किया जाए। और जो चीज हमारे कर्म से बदल सकती है, उसे बदलने के लिए अपनी पूरी हिम्मत और ताकत के साथ मैदान में उतर कर काम किया जाए।

यही तो गीता का भी असली सार है- अपने कर्म को करने में कोई ढिलाई मत बरतो, लेकिन उसके बाद जो भी नतीजा निकले, उसे समान भाव से स्वीकार करो। अपनी कोशिशों में कोई कमी मत रखो, लेकिन परिणाम को लेकर अपने मन में कोई फालतू की जिद भी मत पालो। हम अक्सर रोते हैं कि सब कुछ मेरी मर्जी के मुताबिक क्यों नहीं हो रहा है, लेकिन अगर जिंदगी हमारी हर जिद पूरी कर देती, तो हम कभी अंदर से मजबूत और समझदार इंसान बन ही नहीं पाते।

जब मन शांत होकर मुस्कुरा उठता है
एक समय ऐसा जरूर आता है जब इंसान फुर्सत के पलों में बैठकर अपने पूरे सफर को पीछे मुड़कर देखता है। उसका बचपन, जवानी के संघर्ष, उसकी पुरानी नाकामियां, बड़ी सफलताएं, किसी का मिलना और किसी प्यारे का हमेशा के लिए बिछड़ जाना- यह सब उसकी आंखों के सामने एक फिल्म की तरह चलने लगता है। तब वह इंसान बीते कल की उन सभी खट्टी-मीठी यादों को देखकर धीरे से मुस्कुराता है और सोचता है कि अगर मेरे अतीत की उन घटनाओं में से एक भी घटना इधर से उधर बदल जाती, तो आज मैं जो एक समझदार इंसान बनकर बैठा हूँ, वह कभी नहीं बन पाता। यहाँ आकर यह बात सिर्फ एक विचार नहीं रह जाती, बल्कि दिल की एक सच्ची अनुभूति बन जाती है कि "जो घट रहा था, वही घटित होना था"। यह विचार हमें निराशा से बाहर निकालकर धैर्यवान और परिपक्व बनाता है।


जीवन का सबसे सुंदर अध्याय अभी बाकी है
यह जिंदगी एक बहती हुई नदी की तरह है, जिसका एकमात्र धर्म बस चुपचाप आगे बहते जाना है। यह उस खुले आकाश की तरह है, जो बिना किसी भेदभाव के सबको अपने अंदर पनाह देता है। जब प्रकृति का एक-एक हिस्सा अपने नियम और धर्म से कभी पीछे नहीं हटता, तो फिर हम इंसान जरा सी परेशानी आने पर अपने कर्म के रास्ते से क्यों भटक जाते हैं? इसलिए जिंदगी जब भी आपकी प्लानिंग से अलग हटकर आपकी लाइफ की किताब में कोई नया पन्ना लिखे, तो उसे गुस्से में आकर फाड़िए मत।

पूरी उम्मीद रखिए कि शायद वही पन्ना आपकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत और शानदार अध्याय बनने वाला हो। क्योंकि यह जीवन कभी भी किसी को पूरी तरह खाली नहीं करता। वह अगर हमारे एक हाथ से कोई चीज लेता है, तो विश्वास रखिए कि वह चुपके से हमारे दूसरे हाथ में उससे बड़ी कोई चीज थमा भी रहा होता है। बस अपना भरोसा खुद पर, अपने कर्म पर और उस समय के पहिए पर बनाए रखिए। एक दिन आपका मन भी बिल्कुल शांत होकर कह उठेगा कि जो मिला वही अच्छा था, जो छूटा वही जरूरी था और जो घट रहा है, वही घटित होना था।

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